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दूसरी शादी ( कहानी ) Any Story in Hindi Language – नई कहानी

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  • दूसरी शादी ( कहानी ) Any Story in Hindi Language – नई कहानी

 

  • दूसरी शादी का फैसला कोई आसान नहीं था… पति को मरे अरसा बीत चुका था… जिस्म की हूक भी ढलान पर… बेटी भी दुपट्टे की दुनिया समझने लगी थी…  फिर ज़रूरत क्या थी… आख़िर क्यों रिदा ने चालीस बरस की उम्र में दूसरी शादी की हामी भरी… जिस उम्र में बेटी को बिदा करना था… उस उम्र में दूसरे निकाह का जोड़ा पहनना… या ख़ुदा… रिदा ने क्यों किया ऐसा… क्यों… आख़िर क्यों..!
    सारी रात रिदा का किरदार मुझे उलझाता रहा… क्या जरूरत पड़ गई थी… सुना है जिस मर्द से शादी हो रही है… वो भी राड़ है… कैंसर से ग़ुज़र चुकी बीवी से तीन बच्चे हैं… आदमी दीनी-नमाज़ी है… इलाहाबाद में सरकारी नौकर भी… रहने लायक ठीक-ठाक घर भी लिया है… नेक मां की जरूरत है तो शादी करना चाहता है… लेकिन, रिदा ने तो आज से पंद्रह साल पहले ही दूसरी शादी करने से मना कर दिया था… घरवालों ने समझाया भी… लेकिन, रिदा ने बेटी का वास्ता दिया…अब्बा अम्मी को बता दिया कि उसकी बाकी जिंदगी बेटी के नाम होगी…अब्बा भी अरबवाले थे…पैसे-कौड़ी की कमी ना थी…गोया, रिदा की ‘ना’ का ऐहतराम किया…
    जान…उठो,
    मरियम…
    नाश्ता नहीं बनाओगी अपने महबूब के लिए…
    ओह…पहले क्यों नहीं उठाया…नौ बज गए…
    अरे..जान कोई नहीं बस दरवाज़ा बंद कर लो…नींद आ ही रही है तो अच्छे से सो लो… मैं ऑफ़िस में ब्रेकफास्ट कर लूंगा… डोंट वरी…
    शमीम तो चले गए…मैं सोच में पड़ गई… कुछ रिदा, कुछ अपनी… रिदा की वजह से नींद नहीं आई… या अपनी हस्सासमिज़ाजी से… सोच गहराती गई…दिन का सारा काम निपटा कर बैठी तो फिर सोच में पड़ गई… रिदा को क्या लगा होगा..? क्यों..? तभी अम्मी का फोन आ गया…हाल-चाल पूछा…फिर पूछ बैठी अम्मी रिदा की शादी कब है…जवाब मुख्तसर सा…नौ जून… मैं भी दो पल ख़ामोश रही…फिर अचानक…
    अम्मी, रिदा ने हामी क्यों भरी…?
    उसकी बेटी, वो क्या सोच रही होगी…?
    रिदा ने अच्छा किया या बुरा..?
    हामी ना भरती तो क्या करती बेचारी… अब्बा सऊदी में थे तब उन्हें दिल का दौरा पड़ा…किसी तरह से जान बची…हिन्दुस्तान वापसी हुई…और इन सब के बदले इकलौते भाई को कमाने के लिए सऊदी जाना पड़ा…दो साल से पहले तो उसका आना मुमकिन नहीं…वहीं उसकी बीवी…अल्लाह बचाए ऐसी बदगुमान औरत से…ख़ुद को महारानी समझने लगी है…खुद तो किसी काम से मतलब नहीं…झाड़ूमारी सारा दिन रिदा के पीछे पड़ी रहती है…नौकरानी जैसा काम लेती रहती है…जीना हराम करके रख दिया है उस बेवा  का… बहू की ख़ुराफ़ात से रिदा के अम्मी अब्बा आजिज़ आ चुके हैं…बेटे से शिकायत की लेकिन वो तो ठहरा बीवी के ग़ुलाम…रोज़-रोज़ की बेइज़्ज़ती…ना सिर्फ़ रिदा बल्कि उसकी बेटी को कचोट रही थी…आखिरकार बेटी ने मां को मना ही लिया दूसरी शादी के लिए।
    बेटी के कहने पर मानी रिदा..? मैंने पूछा…

 

  • हां.. अब ये बताओ घर कब आओगी.. अम्मी के सवाल पर याद आया कल ही रात शमीम ने कहा था कुछ दिन घर घूम आओ…मैंने जवाब दिया शायद जून के पहले हफ्ते तक आऊंगी… बाकी की बातचीत में अम्मी ने शमीम का हाल पूछा और फोन रख दिया…
    रिसीवर तो रख दिया दिया लेकिन अम्मी की बात कानों में गूंजती रही… खुद को दूसरे कामों में उलझाया…शमीम के आने से पहले उनकी पंसदीदा बिरयानी बनाने में जुट गई…आज मेरी वजह से बेचारे भूखे गए… बिरयानी शमीम की पसंद का हिस्सा थी या मेरे उस रिग्रेट का…ख़ैर शमीम ने बड़े चाव से बिरयानी खाई.. मुझसे घर-बाहर की बातें की…और मैं किस सोच में मुब्तला हूं इसकी वजह पूछी…मैं ना कह कर रही गई…क्या बताती..रिदा क्यों मेरी सोच के दायरे में है…उसका किरदार क्यों मुझे उसकी बाकी बची जिंदगी जानने के लिए उकसा रहा है… क्यों मैं उस वक्त का वक्त देखने चाह रही हूं जो रिदा की बेटी ने बेहद कम उम्री में देख लिया..क्या रिदा डर गई अपने आने वाली उम्रदराज़ी से…जब बुढ़ापे की लाठी बिना किसी ठोस सहारे के जल्दी चटकती है…

 

  • क्या रिदा को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं कि जहां ब्याह कर जा रही है वहां के माहौल को अपनाने के लिए बिस्तर से बाहर तक ना सिर्फ़ उसे एक समझदार दूसरी पत्नी बनना पड़ेगा…बल्कि दूसरी मां के दुनियाबी खिताब को भी जीना पड़ेगा… और अपनी ममता को क्या मुंह दिखाएगी वो…बेटी को साथ ले जाएगी या फिर जिस माहौल में ख़ुद नहीं रह पा रही वहां कलेजे के टुकड़े को छोड़कर राहत की सांस ले पाएगी…
    रात गुज़रती रही…और मैं शमीम को अपनी हमज़ात के हवाले करके ख़ुद तमाम सवालों में खो गई.. इस बीच शमीम तो सो गए और मुझे जवाब तलाशते-तलाशते एक अक्स दिखा…वो अक्स जो मेरे अंदर की औरतज़ात थी…जो रिदा और आधी आबादी की दुखती रगों से मुझे जोड़ रही थी..
    – लेखिका- ज़ूबी मंसूर

 

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