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अटल बिहारी वाजपेयी की Top 12 कविताएँ – Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi kavitayen

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Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi - अटल बिहारी वाजपेयी की कविता

 

  • दोस्तों आज हम आपके लिए अटल बिहारी वाजपेयी  12 कवितायें लाये हैं. (Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi). हमें विश्वास है कि आपको यह प्रस्तुति पसंद आएगी.

 

  • पन्द्रह अगस्त की पुकार
  • पंद्रह अगस्त का दिन कहता –
    आज़ादी अभी अधूरी है।
    सपने सच होने बाकी है,
    रावी की शपथ न पूरी है।।
    जिनकी लाशों पर पग धर कर
    आज़ादी भारत में आई।

    वे अब तक हैं खानाबदोश
    ग़म की काली बदली छाई।।
    कलकत्ते के फुटपाथों पर
    जो आँधी-पानी सहते हैं।
    उनसे पूछो, पंद्रह अगस्त के
    बारे में क्या कहते हैं।।
    हिंदू के नाते उनका दु:ख
    सुनते यदि तुम्हें लाज आती।
    तो सीमा के उस पार चलो
    सभ्यता जहाँ कुचली जाती।।
    इंसान जहाँ बेचा जाता,
    ईमान ख़रीदा जाता है।
    इस्लाम सिसकियाँ भरता है,
    डालर मन में मुस्काता है।।
    भूखों को गोली नंगों को
    हथियार पिन्हाए जाते हैं।
    सूखे कंठों से जेहादी
    नारे लगवाए जाते हैं।।
    लाहौर, कराची, ढाका पर
    मातम की है काली छाया।
    पख्तूनों पर, गिलगित पर है
    ग़मगीन गुलामी का साया।।
    बस इसीलिए तो कहता हूँ
    आज़ादी अभी अधूरी है।
    कैसे उल्लास मनाऊँ मैं?
    थोड़े दिन की मजबूरी है।।
    दिन दूर नहीं खंडित भारत को
    पुन: अखंड बनाएँगे।
    गिलगित से गारो पर्वत तक
    आज़ादी पर्व मनाएँगे।।
    उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से
    कमर कसें बलिदान करें।
    जो पाया उसमें खो न जाएँ,
    जो खोया उसका ध्यान करें।।
    – Atal Bihari Vajpayee Poems ( साभार- मेरी इक्यावन कविताएं )

 

  • दूध में दरार पड़ गई – Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi

    खून क्यों सफेद हो गया?
    भेद में अभेद खो गया।
    बंट गये शहीद, गीत कट गए,
    कलेजे में कटार दड़ गई।
    दूध में दरार पड़ गई।
    खेतों में बारूदी गंध,
    टूट गये नानक के छंद।
    सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है।
    वसंत से बहार झड़ गई।
    दूध में दरार पड़ गई।
    अपनी ही छाया से बैर,
    गले लगने लगे हैं ग़ैर,
    ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता।
    बात बनाएं, बिगड़ गई।
    दूध में दरार पड़ गई।
    – अटल बिहारी वाजपेयी – Atal Bihari Vajpayee Poems

 

  • गीत नहीं गाता हूँ – Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi

    बेनकाब चेहरे हैं,
    दाग बड़े गहरे हैं,
    टूटता तिलस्म, आज सच से भय खाता हूँ ।
    गीत नही गाता हूँ ।
    लगी कुछ ऐसी नज़र,
    बिखरा शीशे सा शहर,
    अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ ।
    गीत नहीं गाता हूँ ।
    पीठ मे छुरी सा चाँद,
    राहु गया रेखा फाँद,
    मुक्ति के क्षणों में बार-बार बँध जाता हूँ ।
    गीत नहीं गाता हूँ । – Atal Bihari Vajpayee

  • Haar Nahi Manunga poem in hindi

  • गीत  नया गाता हूँ
    टूटे हुए तारो से ,फूटे बासंती स्वर 
    पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर 
    झरे सब पीले पात, कोयल की कुहुक रात 
    प्राची में अरूढ़िमा की रेत देख पाता हूँ
    गीत नया गाता हूँ
    टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी,
    अन्तः को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी,
    हार नहीं मानूँगा,
    रार नयी ठानूंगा,
    काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ 
    गीत नया गाता हूँ

 

  • आओ फिर से दीया जलाएं – Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi

    आओ फिर से दिया जलाएं
    भरी दूपहरी में अधियारा
    सूरज परछाई से हारा
    अंतरतम का नेह निचोड़े
    बुझी हुई बाती सुलगाएं
    आओ कि से दीया जलाएं।
    हम पड़ाव को समझे मंजिल
    लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल
    वर्तमान के मोहजाल में
    आने वाला कल न भुलाएँ
    आओ कि से दीया जलाएं।
    आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
    अपनों के विघ्नों ने घेरा
    अंतिम जय का वज्र बनाने
    नव दधीचि हड्डियां गलाए
    आओ कि से दीया जलाएं। – अटल बिहारी वाजपेयी

 

  • कदम मिलाकर चलना होगा – Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi

    बाधाएं आती हैं आएं
    घिरें प्रलय की घोर घटाएं,
    पावों के नीचे अंगारे,
    सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,
    निज हाथों में हंसते-हंसते,
    आग लगाकर जलना होगा।
    कदम मिलाकर चलना होगा।
    हास्य-रूदन में, तूफानों में,
    अगर असंख्यक बलिदानों में,
    उद्यानों में, वीरानों में,
    अपमानों में, सम्मानों में,
    उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
    पीड़ाओं में पलना होगा।
    कदम मिलाकर चलना होगा।
    उजियारे में, अंधकार में,
    कल कहार में, बीच धार में,
    घोर घृणा में, पूत प्यार में,
    क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
    जीवन के शत-शत आकर्षक,
    अरमानों को ढलना होगा।
    कदम मिलाकर चलना होगा।
    सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
    प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
    सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
    असफल, सफल समान मनोरथ,
    सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
    पावस बनकर ढलना होगा।
    कदम मिलाकर चलना होगा।
    कुछ कांटों से सज्जित जीवन,
    प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
    नीरवता से मुखरित मधुबन,
    परहित अर्पित अपना तन-मन,
    जीवन को शत-शत आहुति में,
    जलना होगा, गलना होगा।
    क़दम मिलाकर चलना होगा। – अटल बिहारी वाजपेयी

 

  • यक्ष प्रश्न – Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi

    जो कल थे,
    वे आज नहीं हैं।
    जो आज हैं,
    वे कल नहीं होंगे।
    होने, न होने का क्रम,
    इसी तरह चलता रहेगा,
    हम हैं, हम रहेंगे,
    यह भ्रम भी सदा पलता रहेगा।
    सत्य क्या है?
    होना या न होना?
    या दोनों ही सत्य हैं?
    जो है, उसका होना सत्य है,
    जो नहीं है, उसका न होना सत्य है।
    मुझे लगता है कि
    होना-न-होना एक ही सत्य के
    दो आयाम हैं,
    शेष सब समझ का फेर,
    बुद्धि के व्यायाम हैं।
    किन्तु न होने के बाद क्या होता है,
    यह प्रश्न अनुत्तरित है।
    प्रत्येक नया नचिकेता,
    इस प्रश्न की खोज में लगा है।
    सभी साधकों को इस प्रश्न ने ठगा है।
    शायद यह प्रश्न, प्रश्न ही रहेगा।
    यदि कुछ प्रश्न अनुत्तरित रहें
    तो इसमें बुराई क्या है?
    हाँ, खोज का सिलसिला न रुके,
    धर्म की अनुभूति,
    विज्ञान का अनुसंधान,
    एक दिन, अवश्य ही
    रुद्ध द्वार खोलेगा।
    प्रश्न पूछने के बजाय
    यक्ष स्वयं उत्तर बोलेगा। – अटल बिहारी वाजपेयी

 

  • भारत जमीन का टुकड़ा नहीं

    भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
    जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
    हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
    पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
    पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
    कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
    यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
    यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
    इसका कंकर-कंकर शंकर है,
    इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
    हम जियेंगे तो इसके लिये
    मरेंगे तो इसके लिये।
    – Atal Bihari Vajpayee Poems

 

  • पड़ोसी से – atal bihari vajpayee poem on kashmir – mastak nahi jhukega poem lyrics in hindi – poem against pakistan in hindi

    एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते,
    पर स्वतन्त्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा।
    अगणित बलिदानो से अर्जित यह स्वतन्त्रता,
    अश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता।
    त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतन्त्रता,
    दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता।
    इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो,
    चिनगारी का खेल बुरा होता है ।
    औरों के घर आग लगाने का जो सपना,
    वो अपने ही घर में सदा खरा होता है।
    अपने ही हाथों तुम अपनी कब्र ना खोदो,
    अपने पैरों आप कुल्हाडी नहीं चलाओ।
    ओ नादान पडोसी अपनी आँखे खोलो,
    आजादी अनमोल ना इसका मोल लगाओ।
    पर तुम क्या जानो आजादी क्या होती है?
    तुम्हे मुफ़्त में मिली न कीमत गयी चुकाई।
    अंग्रेजों के बल पर दो टुकडे पाये हैं,
    माँ को खंडित करते तुमको लाज ना आई?
    अमरीकी शस्त्रों से अपनी आजादी को
    दुनिया में कायम रख लोगे, यह मत समझो।
    दस बीस अरब डालर लेकर आने वाली बरबादी से
    तुम बच लोगे यह मत समझो।
    धमकी, जिहाद के नारों से, हथियारों से
    कश्मीर कभी हथिया लोगे यह मत समझो।
    हमलो से, अत्याचारों से, संहारों से
    भारत का शीष झुका लोगे यह मत समझो।
    जब तक गंगा मे धार, सिंधु मे ज्वार,
    अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष,
    स्वातन्त्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे
    अगणित जीवन यौवन अशेष।
    अमरीका क्या संसार भले ही हो विरुद्ध,
    काश्मीर पर भारत का सर नही झुकेगा
    एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते,
    पर स्वतन्त्र भारत का निश्चय नहीं रुकेगा ।
    – A Atal Bihari Vajpayee Poem

  • मैं अखिल विश्व का गुरू महान

    मैं अखिल विश्व का गुरू महान,
    देता विद्या का अमर दान,
    मैंने दिखलाया मुक्ति मार्ग
    मैंने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान।
    मेरे वेदों का ज्ञान अमर,
    मेरे वेदों की ज्योति प्रखर
    मानव के मन का अंधकार
    क्या कभी सामने सका ठहर?
    मेरा स्वर नभ में घहर-घहर,
    सागर के जल में छहर-छहर
    इस कोने से उस कोने तक
    कर सकता जगती सौरभ भय।
    – A Atal Bihari Vajpayee Poem

 

  • राह कौन सी जाऊँ मैं?

    चौराहे पर लुटता चीर
    प्यादे से पिट गया वजीर
    चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ?
    राह कौन सी जाऊँ मैं?
    सपना जन्मा और मर गया
    मधु ऋतु में ही बाग झर गया
    तिनके टूटे हुये बटोरूँ या नवसृष्टि सजाऊँ मैं?
    राह कौन सी जाऊँ मैं?
    दो दिन मिले उधार में
    घाटों के व्यापार में
    क्षण-क्षण का हिसाब लूँ या निधि शेष लुटाऊँ मैं?
    राह कौन सी जाऊँ मैं ?
    – A Atal Bihari Vajpayee Poem

  • जीवन की ढलने लगी सांझ

    जीवन की ढलने लगी सांझ
    उमर घट गई
    डगर कट गई
    जीवन की ढलने लगी सांझ।
    बदले हैं अर्थ
    शब्द हुए व्यर्थ
    शान्ति बिना खुशियाँ हैं बांझ।
    सपनों में मीत
    बिखरा संगीत
    ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ।
    जीवन की ढलने लगी सांझ।

  • ऐ अटल!
    तू सरल भी था, तू प्रबल भी था,
    तूने सफलता का अद्भुत आकाश रचा है
    ऐ अटल! तूने इतिहास रचा है।
    शत्रु भूमि में भी निडर निहत्था गया,
    तेरे बोल के प्रहार से सब थर्रा गया,
    तेरा आलोचक जन्मा नहीं है धरती में,
    तूने मित्रता का ऐसा प्रयास रचा है,
    ऐ अटल! तूने इतिहास रचा है।
    मृत्यु में इतना साहस कहाँ,
    जो ले जाए तुझको काल तक,
    तू अमर लोकप्रिय नेता रहेगा,
    तेरा प्रभाव रहेगा चिरकाल तक,
    ऐ भारत रत्न! तूने भारत का विकास रचा है
    ऐ अटल! तूने इतिहास रचा है।
    – Jaya Pandey

  • अमर अटल पर कविता

    असीम साहस का परिचय दिया था जिसने
    कारगिल को दुश्मन के पंजे से छीनकर
    चला गया आज ,हम सबको छोड़कर l
    मन दुखी जुबान लड़खड़ाई सी है
    आज हर हिन्दुस्तानी ग़मगीन है
    क्यों चले गए तुम मुँह मोढ़कर l
    कोई नाम का रिश्ता नहीं तुमसे
    फिर भी दिल आज ग़मगीन है
    चले गए मेरी आँखों में आँसू देकर l
    बजा दिया था विदेश में हिंदी का डंका
    जिसकी नीति का लोहा माना संसार ने
    आज चले गए वह हमसे रूठकर l
    देश के नहीं जन -जन के नेता बने
    पहुंचाया वतन को जमी से फलक पर
    फिर आज क्यों चले गए हमें छोड़कर l
    – राशि सिंह

  • प्रेरणादायक कविता – Inspirational Poems in Hindi About Life

 

सुभाषचंद्र बोस पर छोटी लेकिन अद्भुत कविता | Subhash Chandra Bose par Kavita

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Subhash Chandra Bose par Kavita | सुभाषचंद्र बोस पर छोटी लेकिन अद्भुत कविता

 

  • नेताजी सुभाषचंद्र बोस पर छोटी लेकिन अद्भुत कविता

 

  • जब भी पराधीनता का हो सामना,

    जब विदेशी स्वदेश पर करे प्रताड़ना,
    हे सुभाष! तब फिर तुम जन्म लेना,
    फिर हमको ‘आज़ाद हिंद फौज’ देना,
    फिर तुम खून के बदले आज़ादी देना,
    फिर विजय उद्घोष करे वो बोस की सेना,
    भ्रष्ट शासन को जो मार्ग दिखाए,
    काश के फिर कोई नेता तुझ सा आए।
    फिर कभी जो टूटे तेरा हिन्द!
    फिर तुम संगठन के प्रण लेना,
    हे सुभाष! तब फिर तुम जन्म लेना ।
    -Jaya Pandey

  • Subhash Chandra Bose par Kavita

    jab bhee paraadhita ka ho saamana,
    jab videshee svadesh par kare prataadana,
    he subhaash! tab phir tum janm lena,
    phir hamako aajaad hind fauj de,
    phir tum khoon ke badale aazaadee dena,
    phir vijay ughosh kar vo bos ka sena,
    bhrasht shaashan ko jo maarg dikhae,
    kaash ke phir koee neta tum sa aae
    phir kabhee jo toote tera hind!
    phir tum sangathan ke pran lena,
    he subhaash! tab phir tum janm lena
    -jaya paandey

  • নেতাজী সুভাষচন্দ্র বোসের ওপর সংক্ষিপ্ত কিন্তু আশ্চর্যজনক কবিতা

    যখনই হিন্দুস্তান দাসত্বের শৃঙ্খলে আবদ্ধ হয়ে পড়ে,
    যখন একজন বিদেশী ভারতকে আধিপত্য করার চিন্তা শুরু করে,
    হে সুভাষ! তারপর আপনি জন্ম হয়,
    তারপর আপনি ‘আজাদ হিন্দ ফৌজ’ গঠন করেন
    তারপর রক্ত ​​গ্রহণ করে রক্ত ​​গ্রহণ করে স্বাধীনতা দান করুন,
    তারপর স্বাধীনতা ঘোষণা, বোসের সেনাবাহিনী,
    দুর্নীতিবাজ নেতাদের যে দুর্নীতিবাজ কর্মকর্তারা দেখিয়েছেন,
    আশা করি আপনার মত কোনও নেতা আসবেন।
    যদি কখনও আপনার দেশ ভাঙ্গেন!
    তারপর আপনি আযাদ হিন্দ বাহিনী করার প্রতিশ্রুতি নিন,
    হে সুভাষ! তারপর আপনি জন্ম হয় তারপর আপনি জন্ম হয়

  • Poem on Subhash Chandra Bose in Hindi – सुभाषचंद्र बोस पर हिंदी कविता

 

सुभाषचंद्र बोस पर 3 हिंदी कविता Poem on Subhash Chandra Bose in Hindi font

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  • Poem on Subhash Chandra Bose in Hindi – 1 सुभाषचंद्र बोस पर हिंदी कविता

 

  • सुभाष की मृत्यु पर

    दूर देश में किसी विदेशी गगन खंड के नीचे
    सोये होगे तुम किरनों के तीरों की शैय्या पर
    मानवता के तरुण रक्त से लिखा संदेशा पाकर
    मृत्यु देवताओं ने होंगे प्राण तुम्हारे खींचे
    प्राण तुम्हारे धूमकेतु से चीर गगन पट झीना
    जिस दिन पहुंचे होंगे देवलोक की सीमाओं पर
    अमर हो गई होगी आसन से मौत मूर्च्छिता होकर
    और फट गया होगा ईश्वर के मरघट का सीना
    और देवताओं ने ले कर ध्रुव तारों की टेक –
    छिड़के होंगे तुम पर तरुनाई के खूनी फूल
    खुद ईश्वर ने चीर अंगूठा अपनी सत्ता भूल
    उठ कर स्वयं किया होगा विद्रोही का अभिषेक
    किंतु स्वर्ग से असंतुष्ट तुम, यह स्वागत का शोर
    धीमे-धीमे जबकि पड़ गया होगा बिलकुल शांत
    और रह गया होगा जब वह स्वर्ग देश
    खोल कफ़न ताका होगा तुमने भारत का भोर।
    – धर्मवीर भारती

  • Poem on Subhash Chandra Bose in Hindi – 2

    नेताजी सुभाषचंद्र बोस

    है समय नदी की बाढ़ कि जिसमें सब बह जाया करते हैं।
    है समय बड़ा तूफ़ान प्रबल पर्वत झुक जाया करते हैं ।।
    अक्सर दुनियाँ के लोग समय में चक्कर खाया करते हैं।
    लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, इतिहास बनाया करते हैं ।।
    यह उसी वीर इतिहास-पुरुष की अनुपम अमर कहानी है।
    जो रक्त कणों से लिखी गई,जिसकी जयहिन्द निशानी है।।
    प्यारा सुभाष, नेता सुभाष, भारत भू का उजियारा था ।
    पैदा होते ही गणिकों ने जिसका भविष्य लिख डाला था।।
    यह वीर चक्रवर्ती होगा , या त्यागी होगा सन्यासी।
    जिसके गौरव को याद रखेंगे, युग-युग तक भारतवासी।।
    सो वही वीर नौकरशाही ने,पकड़ जेल में डाला था ।
    पर क्रुद्ध केहरी कभी नहीं फंदे में टिकने वाला था।।
    बाँधे जाते इंसान,कभी तूफ़ान न बाँधे जाते हैं।
    काया ज़रूर बाँधी जाती,बाँधे न इरादे जाते हैं।।
    वह दृढ़-प्रतिज्ञ सेनानी था,जो मौका पाकर निकल गया।
    वह पारा था अंग्रेज़ों की मुट्ठी में आकर फिसल गया।।
    जिस तरह धूर्त दुर्योधन से,बचकर यदुनन्दन आए थे।
    जिस तरह शिवाजी ने मुग़लों के,पहरेदार छकाए थे ।।
    बस उसी तरह यह तोड़ पींजरा , तोते-सा बेदाग़ गया।
    जनवरी माह सन् इकतालिस,मच गया शोर वह भाग गया।।
    वे कहाँ गए, वे कहाँ रहे,ये धूमिल अभी कहानी है।
    हमने तो उसकी नयी कथा,आज़ाद फ़ौज से जानी है।।
    – गोपाल प्रसाद व्यास

 

  • नेताजी का तुलादान – Poem on Subhash Chandra Bose in Hindi – 3

    देखा पूरब में आज सुबह,
    एक नई रोशनी फूटी थी।
    एक नई किरन, ले नया संदेशा,
    अग्निबान-सी छूटी थी॥
    एक नई हवा ले नया राग,
    कुछ गुन-गुन करती आती थी।
    आज़ाद परिन्दों की टोली,
    एक नई दिशा में जाती थी॥
    एक नई कली चटकी इस दिन,
    रौनक उपवन में आई थी।
    एक नया जोश, एक नई ताज़गी,
    हर चेहरे पर छाई थी॥
    नेताजी का था जन्मदिवस,
    उल्लास न आज समाता था।
    सिंगापुर का कोना-कोना,
    मस्ती में भीगा जाता था।
    हर गली, हाट, चौराहे पर,
    जनता ने द्वार सजाए थे।
    हर घर में मंगलाचार खुशी के,
    बांटे गए बधाए थे॥
    पंजाबी वीर रमणियों ने,
    बदले सलवार पुराने थे।
    थे नए दुपट्टे, नई खुशी में,
    गये नये तराने थे॥
    वे गोल बांधकर बैठ गईं,
    ढोलक-मंजीर बजाती थीं।
    हीर-रांझा को छोड़ आज,
    वे गीत पठानी गाती थीं।
    गुजराती बहनें खड़ी हुईं,
    गरबा की नई तैयारी में।
    मानो वसन्त ही आया हो,
    सिंगापुर की फुलवारी में॥
    महाराष्ट्र-नन्दिनी बहनों ने,
    इकतारा आज बजाया था।
    स्वामी समर्थ के शब्दों को,
    गीतों में गति से गाया था॥
    वे बंगवासिनी, वीर-बहूटी,
    फूली नहीं समाती थीं।
    अंचल गर्दन में डाल,
    इष्ट के सम्मुख शीश झुकाती थीं-
    “प्यारा सुभाष चिरंजीवी हो,
    हो जन्मभूमि, जननी स्वतंत्र!
    मां कात्यायिनि ऐसा वर दो,
    भारत में फैले प्रजातंत्र!!”
    हर कण्ठ-कण्ठ से शब्द यही,
    सर्वत्र सुनाई देते थे।
    सिंगापुर के नर-नारि आज,
    उल्लसित दिखाई देते थे॥
    उस दिन सुभाष सेनापति ने,
    कौमी झण्डा फहराया था।
    उस दिन परेड में सेना ने,
    फौजी सैल्यूट बजाया था॥
    उस दिन सारे सिंगापुर में,
    स्वागत की नई तैयारी थी।
    था तुलादान नेताजी का,
    लोगों में चर्चा भारी थी ॥
    उस रोज तिरंगे फूलों की,
    एक तुला सामने आई थी॥
    उस रोज तुला ने सचमुच ही,
    एक ऐसी शक्ति उठाई थी-
    जो अतुल, नहीं तुल सकती थी,
    दुनिया की किसी तराजू से!
    जो ठोस, सिर्फ बस ठोस,
    जिसे देखो चाहे जिस बाजू से!!
    वह महाशक्ति सीमित होकर,
    पलड़े में आन विराजी थी।
    दूसरी ओर सोना-चांदी,
    रत्नों की लगती बाजी थी॥
    उस मन्त्रपूत मुद मंडप में,
    सुमधुर शंख-ध्वनि छाई थी।
    जब कुन्दन-सी काया सुभाष की,
    पलड़े में मुस्काई थी॥
    एक वृद्धा का धन सर्वप्रथम,
    उस धर्म-तुला पर आया था।
    सोने की ईटों में जिसने,
    अपना सर्वस्व चढ़ाया था॥
    गुजराती मां की पांच ईंट,
    मानो पलड़े में आईं थीं।
    या पंचयज्ञ से हो प्रसन्न,
    कमला ही वहां समाई थीं!!
    फिर क्या था, एक-एक करके,
    आभूषण उतरे आते थे।
    वे आत्मदान के साथ-साथ,
    पलड़े पर चढ़ते जाते थे॥
    मुंदरी आई, छल्ले आए,
    जो पी की प्रेम-निशानी थे।
    कंगन आए, बाजू आए,
    जो रस की स्वयं कहानी थे॥
    आ गया हार, ले जीत स्वयं,
    माला ने बन्धन छोड़ा था।
    ललनाओं ने परवशता की,
    जंजीरों को धर तोड़ा था॥
    आ गईं मूर्तियां मन्दिर की,
    कुछ फूलदान, टिक्के आए।
    तलवारों की मूठें आईं,
    कुछ सोने के सिक्के आए॥
    कुछ तुलादान के लिए,
    युवतियों ने आभूषण छोड़े थे।
    जर्जर वृद्धाओं ने भेजे,
    अपने सोने के तोड़े थे॥
    छोटी-छोटी कन्याओं ने भी,
    करणफूल दे डाले थे।
    ताबीज गले से उतरे थे,
    कानों से उतरे बाले थे॥
    प्रति आभूषण के साथ-साथ,
    एक नई कहानी आती थी।
    रोमांच नया, उदगार नया,
    पलड़े में भरती जाती थी॥
    नस-नस में हिन्दुस्तानी की,
    बलिदान आज बल खाता था।
    सोना-चांदी, हीरा-पन्ना,
    सब उसको तुच्छ दिखाता था॥
    अब चीर गुलामी का कोहरा,
    एक नई किरण जो आई थी।
    उसने भारत की युग-युग से,
    यह सोई जाति जगाई थी॥
    लोगों ने अपना धन-सरबस,
    पलड़े पर आज चढ़ाया था।
    पर वजन अभी पूरा नहीं हुआ,
    कांटा न बीच में आया था॥
    तो पास खड़ी सुन्दरियों ने,
    कानों के कुण्डल खोल दिए।
    हाथों के कंगन खोल दिए,
    जूड़ों के पिन अनमोल दिए॥
    एक सुन्दर सुघड़ कलाई की,
    खुल ‘रिस्टवाच’ भी आई थी।
    पर नहीं तराजू की डण्डी,
    कांटे को सम पर लाई थी॥
    कोने में तभी सिसकियों की,
    देखा आवाज़ सुनाई दी।
    कप्तान लक्ष्मी लिए एक,
    तरुणी को साथ दिखाई दी॥
    उसका जूड़ा था खुला हुआ,
    आंखें सूजी थीं लाल-लाल!
    इसके पति को युद्ध-स्थल में,
    कल निगल गया था कठिन काल!!
    नेताजी ने टोपी उतार,
    उस महिला का सम्मान किया।
    जिसने अपने प्यारे पति को,
    आज़ादी पर कुर्बान किया॥
    महिला के कम्पित हाथों से,
    पलड़े में शीशफूल आया!
    सौभाग्य चिह्‌न के आते ही,
    कांटा सहमा, कुछ थर्राया!
    दर्शक जनता की आंखों में,
    आंसू छल-छल कर आए थे।
    बाबू सुभाष ने रुद्ध कण्ठ से,
    यूं कुछ बोल सुनाए थे-
    “हे बहन, देवता तरसेंगे,
    तेरे पुनीत पद-वन्दन को।
    हम भारतवासी याद रखेंगे,
    तेरे करुणा-क्रन्दन को!!
    पर पलड़ा अभी अधूरा था,
    सौभाग्य-चिह्‌न को पाकर भी।
    थी स्वर्ण-राशि में अभी कमी,
    इतना बेहद ग़म खाकर भी॥
    पर, वृद्धा एक तभी आई,
    जर्जर तन में अकुलाती-सी।
    अपनी छाती से लगा एक,
    सुन्दर-चित्र छिपाती-सी॥
    बोली, “अपने इकलौते का,
    मैं चित्र साथ में लाई हूं।
    नेताजी, लो सर्वस्व मेरा,
    मैं बहुत दूर से आई हूं॥ “
    वृद्धा ने दी तस्वीर पटक,
    शीशा चरमर कर चूर हुआ!
    वह स्वर्ण-चौखटा निकल आप,
    उसमें से खुद ही दूर हुआ!!
    वह क्रुद्ध सिंहनी-सी बोली,
    “बेटे ने फांसी खाई थी!
    उसने माता के दूध-कोख को,
    कालिख नहीं लगाई थी!!
    हां, इतना गम है, अगर कहीं,
    यदि एक पुत्र भी पाती मैं!
    तो उसको भी अपनी भारत-
    माता की भेंट चढ़ाती मैं!!”
    इन शब्दों के ही साथ-साथ,
    चौखटा तुला पर आया था!
    हो गई तुला समतल, कांटा,
    झुक गया, नहीं टिक पाया था!!
    बाबू सुभाष उठ खड़े हुए,
    वृद्धा के चरणों को छूते!
    बोले, “मां, मैं कृतकृत्य हुआ,
    तुझ-सी माताओं के बूते!!
    है कौन आज जो कहता है,
    दुश्मन बरबाद नहीं होगा!
    है कौन आज जो कहता है,
    भारत आज़ाद नहीं होगा!!”
    – गोपाल प्रसाद व्यास

  • बसंत ऋतु पर निबन्ध – Essay On Basant Ritu in Hindi Nibandh

 

7 देशभक्ति कविता || Short Patriotic Poems in Hindi A Poem By Famous Poets

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  • 1st Poem: हिंदुस्तान बसा दे

    अंतर के तिमिर मिटा दो माता।
    ज्ञान की नवज्योति जला दो माँ।।
    सद्बुद्धि दे सबको माँ तू भारती।
    भवसागर से हम सबको तार दे।।
    निर्मल मन में आकर माता तू।
    हुम् सब के सोये भाग जगा दे।।
    गीत के नव शब्द देकर माँ हमें।
    नव सृजन की लेखनी थमा दे।।
    संगीत की झनकार गुंजा दे माँ।
    टूटे फूटे इन शब्दों को सजा दे।।
    देश उन्नति की ओर हो अग्रसर।
    सबके मन मे हिंदुस्तान बसा दे।।
    कवि राजेश पुरोहित
    98,पुरोहित कुटी ,श्री राम कॉलोनी
    भवानीमंडी
    जिला झालावाड़
    राजस्थान
    मौलिकता का प्रमाण पत्र:-
    उक्त रचना
    मौलिक स्वरचित अप्रकाशित रचना है।
    कवि राजेश पुरोहित

 

  • 2nd Poem: भारत माता की शान

  • भारत माता की शान हूँ मैं, ए पी जे अब्दुल कलाम हूँ मैं
    जो वन्देमातरम कहकर, गर्व से फूल जाए वो मुसलमान हूँ मैं
    मैंने देखा था अजब नजारा, जब मैं मौत की नींद में सोया था…..
    तो हिंदु या मुसलमान नहीं, पूरा हिन्दुस्तान रोया था……………..
    जो कर सकता था, वो सब कुछ किया मैंने अपने देश के लिए
    अपने जीवन का एक-एक पल जीया अपने देश के लिए
    अब मेरे हिन्दुस्तान को संवारो और सम्भालो तुम…….
    देश के दुश्मनों से मेरे देश को बचा लो तुम……………….
    मेरे भारत को फिर विश्व गुरु बनाना है तुम्हें
    भारत को फिर दुनिया का सिरमौर बनाना है तुम्हें
    जो सपने मैंने अपने भारत के लिए देखे हैं………….
    उन सपनों को सच कर दिखाना है तुम्हें………………
    याद रखो, जो देशभक्त हो वही हिंदु या मुसलमान होता है
    जो गद्दार हो, वो तो बस गद्दार होता है… इस धरती पर भार होता है
    हर गली-मुहल्ले में देशभक्ति की अलख जगा दो तुम…..
    हर देशभक्त को अब्दुल कलाम बना दो तुम………………..
    → अभिषेक मिश्र
  • 3rd Poem: आजादी की मध्यरात्रि

    आजादी के छह दशक बीते, पर अब तक सूरज उगा नहीं
    कहने को हम आजाद हो गए, पर पूर्ण स्वराज मिला नहीं
    लक्ष्मीबाई की धरती में, माँ-बेटियाँ अब भी सुरक्षित नहीं
    ऋषियों की इस तपोभूमि में, हर कोई अब भी शिक्षित नहीं
    शास्त्री-सुभाष की मृत्यु का सत्य देश से छुपाया गया है
    और मुगलों का इतिहास, बच्चों को रटाया गया है
    हिन्दुओं को जाति, भाषा और रोटी के नाम पर लड़ाया जा रहा है
    और अहिंसा के नाम पर जनता को कायर बनाया जा रहा है
    सैनिक देश की आजादी बचा रहे हैं, और अहिंसा का गुण गाया जा रहा है
    अर्धसत्य बेचा जा रहा है, और लोगों से सच को छुपाया जा रहा है
    देश के कर्णधार खो गए हैं कहीं, जागने से पहले सो गए हैं कहीं
    क्रांति की मशाल बुझ गई है, और अब तारणहार कोई भी नहीं
    क्रांतिकारियों को भुला दिया गया है, एक व्यक्ति को आजादी का जनक बना दिया गया है
    लाखों परिवारों के त्याग को भुला दिया गया है, एक परिवार को सबसे बड़ा बना दिया गया है
    हिंदुत्व की जन्मभूमि में हिंदु धर्म को साम्प्रदायिक बताया जा रहा है
    धर्मनिर्पेक्षता के नाम पर हिन्दुओं को धर्म विमुख बनाया जा रहा है
    यही सही वक्त है देशभक्तों के जगने का
    देश के लिए इसके बेटों के जीने-मरने का
    यही सही वक्त है, सोए देश को नींद से जगाने का
    यही सही वक्त है, आजादी को सच्चे अर्थों में पाने का
    yahi यही सही वक्त है, विश्व गुरु बन जाने का
    यही सही वक्त है, दुनिया को फिर से राह दिखाने का
    yahi यही सही वक्त है, एक साधारण मानव से कर्मवीर बन जाने का
    यही सही वक्त है, क्रांति की मशाल को फिर से जलाने का
    – अभिषेक मिश्र ( Abhi )

 

  • 4th poem: मुक्ति पर्व

    आज राष्ट्र का मुक्ति-पर्व है जागो कवि की वाणी;
    फूंको शंख विजय का, जय हो भारत-भूमि भवानी !
    फूलो फूल, लताओ झूमो, अम्बर बरसो पानी;
    मन-मयूर नाचो रे आई प्रिय स्वतन्त्रता रानी !!
    वह स्वतन्त्रता जिसकी खातिर जूझी लक्ष्मी रानी;
    वीर पेशवा नाना ने कर दिया खून का पानी।
    तांत्या टोपे ने जिसकी असली कीमत पहिचानी;
    लड़ा गया संग्राम गदर का जिसकी अमर कहानी ॥
    वह स्वतन्त्रता जिसकी खातिर बिस्मिल थे शैदाई;
    जूझ गए आज़ाद पार्क में डटकर लड़ी लड़ाई।
    फाके किए यतीन्द्रनाथ ने, मारे गए कन्हाई;
    भगतसिंह ने हंसते-हंसते खुलकर फांसी खाई॥
    वह स्वतन्त्रता जिसकी खातिर बापू जग में आए;
    मुक्ति-युद्ध के लिए जिन्होंने नये शास्त्र अपनाए।
    राष्ट्रपिता के इंगित पर दी भारत ने कुर्बानी;
    साठ वर्ष तक लड़े सिपाही दिन और रात न जानी॥
    वह स्वतन्त्रता जो कि हमें प्राणों से भी प्यारी थी;
    vah वह स्वतन्त्रता जिसके हित डांडी की तैयारी थी।
    वह स्वतन्त्रता जिसकी खातिर असहयोग अपनाया;
    मिट्टी में मिल गए किन्तु झण्डे को नहीं झुकाया॥
    बयालीस के वीर बागियो, जान खपाने वालो;
    ‘करो-मरो’ के महायज्ञ में गोली खाने वालो !
    जेल-यातना सहने वालो सत्त्व गंवाने वालो;
    विजय तुम्हारे घर आई है आओ इसे सम्हालो॥
    उन्हें राष्ट्र का नमस्कार जो काम देश के आए;
    सेवक बनकर रहे चने तसलों में रखकर खाए।
    भारत उनका ऋणी जिन्होंने हंसकर कष्ट उठाए;
    सदा कर्मरत रहे नाम अखबारों में न छपाए॥
    नेताजी तुम कहां छिपे हो ? याद तुम्हारी आती;
    भारत के बच्चे-बच्चे की भर-भर आती छाती।
    ‘दिल्ली चलो’ तुम्हारा नारा देखो पूर्ण हुआ है;
    परदेशी का भाग्य-सितारा पिसकर चूर्ण हुआ है॥
    उठो बहादुरशाह कब्र से किला लौट आया है;
    हटा यूनियन जैक, तिरंगा उस पर लहराया है।
    औंधे तम्बू अंग्रेजों के, पड़ी बैरकें खाली;
    तेरी दिल्ली आज मनाती घर-घर खुशी दिवाली॥
    सुनो तिलक महाराज ! स्वर्ग में भारत के जयकारे;
    तुम्हें जेल में रखनेवाले खुद लग गए किनारे।
    जन्मसिद्ध अधिकार हमारा हमने छीन लिया है;
    ब्रिटिश सल्तनत के तख्ते को तेरह-तीन किया है॥
    सदियों पीछे आज जमाना ऐसा शुभ आया है;
    जब अशोक का चक्र पुनः भारत में फहराया है;
    जबकि हिमालय का सिर ऊंचा गंगा गौरव गाती;
    जब भारत की जनता जय नेहरू, पटेल की गाती ॥
    मुक्त पवन में सांस ले रहे हैं अब भारतवासी;
    पूरब में प्रकाश फैला है स्वर्णिम उषा प्रकाशी।
    भारतवर्ष स्वतन्त्र हुआ है गाओ नया तराना;
    नया एशिया जागा है अब बदला नया ज़माना॥
    – गोपाल प्रसाद व्यास

 

  • 5th Poem: उठो जवान देश की वसुंधरा पुकारती.

    उठो जवान देश की वसुंधरा पुकारती
    देश है पुकारता पुकारती माँ भारती
    रगों में तेरे बह रहा है खून राम श्याम का
    जगदगुरु गोविंद और राजपूती शान का
    तू चल पड़ा तो चल पड़ेगी साथ तेरे भारती
    देश है पुकारता पुकारती माँ भारती ||
    उठा खडग बढा कदम कदम कदम बढाए जा
    कदम कदम पे दुश्मनो के धड़ से सर उड़ाए जा
    उठेगा विश्व हांथ जोड़ करने तेरी आरती
    देश है पुकारता पुकारती माँ भारती ||
    तोड़कर ध्ररा को फोड़ आसमाँ की कालिमा
    जगा दे सुप्रभात को फैला दे अपनी लालिमा
    तेरी शुभ कीर्ति विश्व संकटों को तारती
    देश है पुकारता पुकारती माँ भारती ||
    है शत्रु दनदना रहा चहूँ दिशा में देश की
    पता बता रही हमें किरण किरण दिनेश की
    ओ चक्रवती विश्वविजयी मात्र-भू निहारती
    देश है पुकारता पुकरती माँ भारती ||

 

  • 6th Poem: सच्चा वीर बना दे माँ

    सच्चा वीर बना दे माँ-सच्चा वीर बना दे माँ
    ध्रुव जैसी मुझे भक्ति दे दे-अर्जुन जैसी शक्ति दे दे
    गीता ज्ञान सुना दे माँ -सच्चा वीर बना दे माँ ||
    वीर हक़ीकत मैं बन जाऊँ- धर्म पे अपना शीश कटाऊँ
    ऐसी लगन लगा दे माँ-सच्चा वीर बना दे माँ ||
    गूऱू गोविन्द सा त्यागी बना दे-शिवाजी जैसी आग लगा दे
    हाँथ तलवार थमा दे माँ -सच्चा वीर बना दे माँ ||
    केशव सा ध्येयनिष्‍ठ बना दे-माधव सा मुझे ज्ञान करा दे
    जीवन देश पे चढ़ा दे माँ-सच्चा वीर बना दे माँ ||
  • 7th Poem:

    मातृ भू के पुत्र वीर हम, दुश्मनो को दें खदेढ़ हम
    देश रक्षा करें,धर्म रक्षा करें, युद्ध में न पीछे हटें ||
    राष्ट्र को ही देव मानकर चले हैं हम,यही एक राष्ट्र धर्म जानते है हम
    स्वतंत्र देश की महान यह परम्परा, रक्त सींच कर पवित्र हो गयी धरा
    सिंधु को पार कर, हाथ संगीन ले, ध्येय मार्ग पर हैं हम बढ़े ||
    मातृ भू के पुत्र वीर हम, दुश्मनो को दें…………………….
    बढ़ रहे आज हम तूफान ले चले, वीर शिवाजी के रणबांकुरे चले
    वीर पुत्र युद्ध भूमि से कभी हटे, शत्रुओं को मारकर फिर स्वय कटे
    विघ्न मे कूद कर, सिंह से हम बढ़े, मौत दर के पीछे हटे ||
    मातृ भू के पुत्र वीर हम, दुश्मनो को दें…………………….
    बढ़े कदम रुके न हम वीर मंत्र लें, कार्य की ध्वजा अखण्ड साथ ले चले
    विजय घोष गर्जना दिशा हिला गयी, अजेय हम सदा हमें विजय ही मिल गयी
    मातृ भू के लिए, प्राण जाएँ भले, अब कदम न पीछे हटें
    मातृ भू के पुत्र वीर हम, दुश्मनो को दें खदेढ़ हम
    देश रक्षा करें,धर्म रक्षा करें, युद्ध में न पीछे हटें ||
  • Patriotic poems in Hindi by famous poets देशभक्ति कविताएँ desh bhakti kavit

 

 

11 देशभक्ति कविताएँ || Patriotic poems in Hindi by famous poets desh bhakti

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  • हिमाद्रि तुंग शृंग से – Patriotic poems in Hindi by famous poets – desh bhakti kavita

    हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
    स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती
    ‘अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
    प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!’
    असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी
    सपूत मातृभूमि के- रुको न शूर साहसी!
    अराति सैन्य सिंधु में, सुवाड़वाग्नि से जलो,
    प्रवीर हो जयी बनो – बढ़े चलो, बढ़े चलो!
    – जयशंकर प्रसाद

 

  • पुष्प की अभिलाषा – Patriotic poems in Hindi by famous poets – desh bhakti kavita

    चाह नहीं, मैं सुरबाला के
    गहनों में गूँथा जाऊँ,
    चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध
    प्यारी को ललचाऊँ,
    चाह नहीं सम्राटों के शव पर
    हे हरि डाला जाऊँ,
    चाह नहीं देवों के सिर पर
    चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
    मुझे तोड़ लेना बनमाली,
    उस पथ पर देना तुम फेंक!
    मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने,
    जिस पथ पर जावें वीर अनेक!
    – माखनलाल चतुर्वेदी

  • मैं अखिल विश्व का गुरू महान – Patriotic poems in Hindi by famous poets – desh bhakti kavita

    मैं अखिल विश्व का गुरू महान,
    देता विद्या का अमर दान,
    मैंने दिखलाया मुक्ति मार्ग
    मैंने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान।
    मेरे वेदों का ज्ञान अमर,
    मेरे वेदों की ज्योति प्रखर
    मानव के मन का अंधकार
    क्या कभी सामने सका ठहर?
    मेरा स्वर नभ में घहर-घहर,
    सागर के जल में छहर-छहर
    इस कोने से उस कोने तक
    कर सकता जगती सौरभ भय।
    – अटल बिहारी वाजपेयी

  • भारत जमीन का टुकड़ा नहीं – Patriotic poems in Hindi by famous poets देशभक्ति कविताएँ desh bhakti kavita

    भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
    जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
    हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
    पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
    पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
    कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
    यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
    यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
    इसका कंकर-कंकर शंकर है,
    इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
    हम जियेंगे तो इसके लिये
    मरेंगे तो इसके लिये।
    – अटल बिहारी वाजपेयी

 

  • शहीदों में तू नाम लिखा ले रे – Patriotic poems in Hindi by famous poets देशभक्ति कविताएँ desh bhakti kavita

    वह देश, देश क्या है, जिसमें
    लेते हों जन्म शहीद नहीं।
    वह खाक जवानी है जिसमें
    मर मिटने की उम्मीद नहीं।
    वह मां बेकार सपूती है,
    जिसने कायर सुत जाया है।
    वह पूत, पूत क्या है जिसने
    माता का दूध लजाया है।
    सुख पाया तो इतरा जाना,
    दुःख पाया तो कुम्हला जाना।
    यह भी क्या कोई जीवन है:
    पैदा होना, फिर मर जाना!
    पैदा हो तो फिर ऐसा हो,
    जैसे तांत्या बलवान हुआ।
    मरना हो तो फिर ऐसे मर,
    ज्यों भगतसिंह कुर्बान हुआ।
    जीना हो तो वह ठान ठान,
    जो कुंवरसिंह ने ठानी थी।
    या जीवन पाकर अमर हुई
    जैसे झांसी की रानी थी।
    यदि कुछ भी तुझ में जीवन है,
    तो बात याद कर राणा की।
    दिल्ली के शाह बहादुर की
    औ कानपूर के नाना की।
    तू बात याद कर मेरठ की,
    मत भूल अवध की घातों को।
    कर सत्तावन के दिवस याद,
    मत भूल गदर की बातों को।
    आज़ादी के परवानों ने जब
    खूं से होली खेली थी।
    माता के मुक्त कराने को
    सीने पर गोली झेली थी।
    तोपों पर पीठ बंधाई थी,
    पेड़ों पर फांसी खाई थी।
    पर उन दीवानों के मुख पर
    रत्ती-भर शिकन न आई थी।
    वे भी घर के उजियारे थे
    अपनी माता के बारे थे।
    बहनों के बंधु दुलारे थे,
    अपनी पत्नी के प्यारे थे।
    पर आदर्शों की खातिर जो
    भर अपने जी में जोम गए।
    भारतमाता की मुक्ति हेतु,
    अपने शरीर को होम गए।
    कर याद कि तू भी उनका ही
    वंशज है, भारतवासी है।
    यह जननी, जन्म-भूमि अब भी,
    कुछ बलिदानों की प्यासी है।
    अंग्रेज गए जैसे-तैसे,
    लेकिन अंग्रेजी बाकी है।
    उनके बुत छाती पर बैठे,
    ज़हनियत अभी वह बाकी है।
    कर याद कि जो भी शोषक है
    उसको ही तुझे मिटाना है।
    ले समझ कि जो अन्यायी है
    आसन से उसे हटाना है।
    ऐसा करने में भले प्राण
    जाते हों तेरे, जाने दे।
    अपने अंगों की रक्त-माल
    मानवता पर चढ़ जाने दे।
    तू जिन्दा हो और जन्म-भूमि
    बन्दी हो तो धिक्कार तुझे।
    भोजन जलते अंगार तुझे,
    पानी है विष की धार तुझे।
    जीवन-यौवन की गंगा में
    तू भी कुछ पुण्य कमा ले रे!
    मिल जाए अगर सौभाग्य
    शहीदों में तू नाम लिखा ले रे!
    – गोपाल प्रसाद व्यास

 

  • प्रयाण-गीत – Patriotic poems in Hindi by famous poets देशभक्ति कविताएँ desh bhakti kavita

    प्रयाण-गीत गाए जा!
    तू स्वर में स्वर मिलाए जा!
    ये जिन्दगी का राग है–जवान जोश खाए जा!
    प्रयाण-गीत …
    तू कौम का सपूत है!
    स्वतन्त्रता का दूत है!
    निशान अपने देश का उठाए जा, उठाए जा !
    प्रयाण-गीत…
    ये आंधियां पहाड़ क्या?
    ये मुश्किलों की बाढ़ क्या?
    दहाड़ शेरे हिन्द! आसमान को हिलाए जा !
    प्रयाण-गीत…
    तू बाजुओं में प्राण भर!
    सगर्व वक्ष तान कर!
    गुमान मां के दुश्मनों का धूल में मिलाए जा।
    प्रयाण-गीत गाए जा!
    तू स्वर में स्वर मिलाए जा!
    ये जिन्दगी का राग है–जवान जोश खाए जा।
    – गोपाल प्रसाद व्यास

 

  • नमामि मातु भारती – Patriotic poems in Hindi by famous poets देशभक्ति कविताएँ desh bhakti kavita

    नमामि मातु भारती !
    हिमाद्रि-तुंग, श्रींगिनी
    त्रिरंग- अंश- रंगिनी
    नमामि मातु भारती
    सहस्र दीप आरती !
    समुद्र- पाद- पल्लवे
    विराट विश्व –वल्लभे
    प्रबुद्ध बुद्ध की धरा
    प्रणम्य हे वसुंधरा !
    स्वराज्य – स्वावलंबिनी
    सदैव सत्य – संगिनी
    अजेय ,श्रेय – मंडिता
    समाज-शास्त्र-पण्डिता !
    अशोक -चक्र –संयुते
    समुज्ज्वले समुन्नते
    मनोग्य मुक्ति –मंत्रिणी
    विशाल लोकतंत्रिनी !
    अपार शस्य – सम्पदे
    अजस्र श्री पड़े-पड़े
    शुभन्करे – प्रियंवदे
    दया – क्षमा वंशवदे !
    मनस्विनी – तपस्विनी
    रणस्थली – यशस्विनी
    कराल- काल- कलिका
    प्रचंड मुंड- मालिका
    अमोघ शक्ति – धारिणी
    कुराज कष्ट – वारिणी
    अदैन्य मंत्र – दायिका
    नमामि राष्ट्र – नायिका !
    – गोपाल प्रसाद व्यास

 

  • कदम कदम बढ़ाये जा

    कदम कदम बढ़ाये जा, खुशी के गीत गाये जा
    ये जिन्दगी है क़ौम की, तू क़ौम पे लुटाये जा
    शेर-ए-हिन्द आगे बढ़, मरने से फिर कभी ना डर
    उड़ाके दुश्मनों का सर, जोशे-वतन बढ़ाये जा
    कदम कदम बढ़ाये जा …
    हिम्मत तेरी बढ़ती रहे, खुदा तेरी सुनता रहे
    जो सामने तेरे खड़े, तू ख़ाक मे मिलाये जा
    कदम कदम बढ़ाये जा …
    चलो दिल्ली पुकार के, क़ौमी निशां सम्भाल के
    लाल किले पे गाड़ के, लहराये जा लहराये जा
    कदम कदम बढ़ाये जा…
    – राम सिंह ठाकुर

 

  • जियो जियो अय हिन्दुस्तान – Patriotic poems in Hindi by famous poets देशभक्ति कविताएँ desh bhakti kavita

    जाग रहे हम वीर जवान,
    जियो जियो अय हिन्दुस्तान !
    हम प्रभात की नई किरण हैं, हम दिन के आलोक नवल,
    हम नवीन भारत के सैनिक, धीर,वीर,गंभीर, अचल ।
    हम प्रहरी उँचे हिमाद्रि के, सुरभि स्वर्ग की लेते हैं ।
    हम हैं शान्तिदूत धरणी के, छाँह सभी को देते हैं।
    वीर-प्रसू माँ की आँखों के हम नवीन उजियाले हैं
    गंगा, यमुना, हिन्द महासागर के हम रखवाले हैं।
    तन मन धन तुम पर कुर्बान,
    जियो जियो अय हिन्दुस्तान !
    हम सपूत उनके जो नर थे अनल और मधु मिश्रण,
    जिसमें नर का तेज प्रखर था, भीतर था नारी का मन !
    एक नयन संजीवन जिनका, एक नयन था हालाहल,
    जितना कठिन खड्ग था कर में उतना ही अंतर कोमल।
    थर-थर तीनों लोक काँपते थे जिनकी ललकारों पर,
    स्वर्ग नाचता था रण में जिनकी पवित्र तलवारों पर
    हम उन वीरों की सन्तान ,
    जियो जियो अय हिन्दुस्तान !
    हम शकारि विक्रमादित्य हैं अरिदल को दलनेवाले,
    रण में ज़मीं नहीं, दुश्मन की लाशों पर चलनेंवाले।
    हम अर्जुन, हम भीम, शान्ति के लिये जगत में जीते हैं
    मगर, शत्रु हठ करे अगर तो, लहू वक्ष का पीते हैं।
    हम हैं शिवा-प्रताप रोटियाँ भले घास की खाएंगे,
    मगर, किसी ज़ुल्मी के आगे मस्तक नहीं झुकायेंगे।
    देंगे जान , नहीं ईमान,
    जियो जियो अय हिन्दुस्तान।
    जियो, जियो अय देश! कि पहरे पर ही जगे हुए हैं हम।
    वन, पर्वत, हर तरफ़ चौकसी में ही लगे हुए हैं हम।
    हिन्द-सिन्धु की कसम, कौन इस पर जहाज ला सकता ।
    सरहद के भीतर कोई दुश्मन कैसे आ सकता है ?
    पर की हम कुछ नहीं चाहते, अपनी किन्तु बचायेंगे,
    जिसकी उँगली उठी उसे हम यमपुर को पहुँचायेंगे।
    हम प्रहरी यमराज समान
    जियो जियो अय हिन्दुस्तान!
    – रामधारी सिंह दिनकर

 

  • वह देश कौन-सा है? – Patriotic poems in Hindi by famous poets

    मन-मोहिनी प्रकृति की गोद में जो बसा है।
    सुख-स्वर्ग-सा जहाँ है वह देश कौन-सा है?
    जिसका चरण निरंतर रतनेश धो रहा है।
    जिसका मुकुट हिमालय वह देश कौन-सा है?
    नदियाँ जहाँ सुधा की धारा बहा रही हैं।
    सींचा हुआ सलोना वह देश कौन-सा है?
    जिसके बड़े रसीले फल, कंद, नाज, मेवे।
    सब अंग में सजे हैं, वह देश कौन-सा है?
    जिसमें सुगंध वाले सुंदर प्रसून प्यारे।
    दिन रात हँस रहे है वह देश कौन-सा है?
    मैदान, गिरि, वनों में हरियालियाँ लहकती।
    आनंदमय जहाँ है वह देश कौन-सा है?
    जिसकी अनंत धन से धरती भरी पड़ी है।
    संसार का शिरोमणि वह देश कौन-सा है?
    सब से प्रथम जगत में जो सभ्य था यशस्वी।
    जगदीश का दुलारा वह देश कौन-सा है?
    पृथ्वी-निवासियों को जिसने प्रथम जगाया।
    शिक्षित किया सुधारा वह देश कौन-सा है?
    जिसमें हुए अलौकिक तत्वज्ञ ब्रह्मज्ञानी।
    गौतम, कपिल, पतंजलि, वह देश कौन-सा है?
    छोड़ा स्वराज तृणवत आदेश से पिता के।
    वह राम थे जहाँ पर वह देश कौन-सा है?
    निस्वार्थ शुद्ध प्रेमी भाई भले जहाँ थे।
    लक्ष्मण-भरत सरीखे वह देश कौन-सा है?
    देवी पतिव्रता श्री सीता जहाँ हुईं थीं।
    माता पिता जगत का वह देश कौन-सा है?
    आदर्श नर जहाँ पर थे बालब्रह्मचारी।
    हनुमान, भीष्म, शंकर, वह देश कौन-सा है?
    विद्वान, वीर, योगी, गुरु राजनीतिकों के।
    कृष्ण थे जहाँ पर वह देश कौन-सा है?
    विजयी, बली जहाँ के बेजोड़ शूरमा थे।
    गुरु द्रोण, भीम, अर्जुन वह देश कौन-सा है?
    जिसमें दधीचि दानी हरिचंद कर्ण से थे।
    सब लोक का हितैषी वह देश कौन-सा है?
    बाल्मीकि, व्यास ऐसे जिसमें महान कवि थे।
    श्रीकालिदास वाला वह देश कौन-सा है?
    निष्पक्ष न्यायकारी जन जो पढ़े लिखे हैं।
    वे सब बता सकेंगे वह देश कौन-सा है?
    छत्तीस कोटि भाई सेवक सपूत जिसके।
    भारत सिवाय दूजा वह देश कौन-सा है?
    – रामनरेश त्रिपाठी

 

  • जय राष्ट्रीय निशान!  – Patriotic poems in Hindi by famous poets

    जय राष्ट्रीय निशान!!!
    लहर लहर तू मलय पवन में,
    फहर फहर तू नील गगन में,
    छहर छहर जग के आंगन में,
    सबसे उच्च महान!
    सबसे उच्च महान!
    जय राष्ट्रीय निशान!!
    जब तक एक रक्त कण तन में,
    डिगे न तिल भर अपने प्रण में,हाहाकार मचावें रण में,
    जननी की संतान
    जय राष्ट्रीय निशान!
    मस्तक पर शोभित हो रोली,
    बढे शुरवीरों की टोली,
    खेलें आज मरण की होली,
    बूढे और जवान
    बूढे और जवान!
    जय राष्ट्रीय निशान!
    मन में दीन-दुःखी की ममता,
    हममें हो मरने की क्षमता,
    मानव मानव में हो समता,
    धनी गरीब समान
    गूंजे नभ में तान
    जय राष्ट्रीय निशान!
    तेरा मेरा मेरुदंड हो कर में,
    स्वतन्त्रता के महासमर में,
    वज्र शक्ति बन व्यापे उस में,
    दे दें जीवन-प्राण!
    दे दें जीवन प्राण!
    जय राष्ट्रीय निशान!!
    – सोहनलाल द्विवेदी
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भारत पर 4 कविता || Poem On India in Hindi India par Hindi Kavita poetries

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  • देशभक्तों की निद्रा

 

  • जब-जब लोकतंत्र से जयचन्दों को अभयदान मिलेगा
    तब-तब भारत माता असहनीय दुःख पायेगी………….
    जब-जब न्याय अमीरों की जागीर बनेगा
    तब-तब गरीब मुजरिम ठहराया जायेगा………….
    जब-जब मिडिया टीआरपी की भूखी होगी
    तब-तब अर्धसत्य दिखाया जाएगा………….
    जब-जब फिल्में अश्लीलता परोसेंगी
    तब-तब कई ज़िंदगियाँ तबाह होंगी………….
    जब-जब इतिहासकार मुगलों की जयकार करेंगे
    तब-तब युवा दिग्भ्रमित होगा………….
    जब-जब साहित्य समाज में विष घोलेगा
    तब-तब भारत का पतन होगा………….
    जब-जब शिक्षा से नैतिकता गायब होगी
    तब-तब अगली पीढ़ी नालायक होगी………….
    जब-जब किसान खून की आँसू रोयेंगे
    तब-तब महंगाई सबको रुलाएगी………….
    जब-जब तथाकथित बुद्धिजीवी समाज को भटकाना चाहेंगे
    तब-तब राष्ट्रभक्त उन्हें धूल चटाएंगे………….
    जब-जब लोग अपने कर्तव्यों को भूलेंगे
    तब-तब अधिकार राष्ट्र के लिए घातक होगा………….
    जब-जब योग्य, लेकिन चरित्रहीन लोग, युवाओं के आदर्श बनेंगे
    तब-तब नई पीढ़ी के चरित्र का भी घोर पतन होगा………….
    देशभक्तों, घोर निंद्रा अब तो त्यागो
    इससे पहले की राष्ट्र खंडित-खंडित हो जाए………….
    खड़े सैनिक सीमा पर, देश के लिए मरने को
    जरा भी गैरत बची हो तुममें, तो तुम देश के लिए जियो तो सही………….
    – अभिषेक मिश्र ( Abhi )
  • एक नया इतिहास लिखो
    मोह निंद्रा में सोने वालों, अब भी वक्त है जाग जाओ
    इससे पहले कि तुम्हारी यह नींद राष्ट्र को ले डूबे………….
    जाति-पाती में बंटकर देश का बन्टाधार करने वालों
    अपना हित चाहते हो, तो अब भी एक हो जाओ………….
    भाषा के नाम पर लड़ने वालों…….
    हिंदी को जग का सिरमौर बनाओ………….
    राष्ट्र हित में कुछ तो बलिदान करो तुम

    इससे पहले कि राष्ट्र फिर गुलाम बन जाए………….
    आधुनिकता केवल पहनावे से नहीं होती है
    ये बात अब भी समझ जाओ तुम………….
    फिर कभी कहीं कोई भूखा न सोए
    कोई ऐसी क्रांति ले आओ तुम………….
    भारत में हर कोई साक्षर हो…….
    देश को ऐसे पढ़ाओ तुम…………

 

  • भारत महिमा

    हिमालय के आँगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार
    उषा ने हँस अभिनंदन किया और पहनाया हीरक-हार
    जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक
    व्योम-तम पुँज हुआ तब नष्ट, अखिल संसृति हो उठी अशोक
    विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत 
    सप्तस्वर सप्तसिंधु में उठे, छिड़ा तब मधुर साम-संगीत 
    बचाकर बीज रूप से सृष्टि, नाव पर झेल प्रलय का शीत 
    अरुण-केतन लेकर निज हाथ, वरुण-पथ पर हम बढ़े अभीत
    सुना है वह दधीचि का त्याग, हमारी जातीयता विकास
    पुरंदर ने पवि से है लिखा, अस्थि-युग का मेरा इतिहास
    सिंधु-सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह
    दे रही अभी दिखाई भग्न, मग्न रत्नाकर में वह राह
    धर्म का ले लेकर जो नाम, हुआ करती बलि कर दी बंद 
    हमीं ने दिया शांति-संदेश, सुखी होते देकर आनंद 
    विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम 
    भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम
    यवन को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टि
    मिला था स्वर्ण-भूमि को रत्न, शील की सिंहल को भी सृष्टि
    किसी का हमने छीना नहीं, प्रकृति का रहा पालना यहीं
    हमारी जन्मभूमि थी यहीं, कहीं से हम आए थे नहीं
    जातियों का उत्थान-पतन, आँधियाँ, झड़ी, प्रचंड समीर 
    खड़े देखा, झेला हँसते, प्रलय में पले हुए हम वीर 
    चरित थे पूत, भुजा में शक्ति, नम्रता रही सदा संपन्न 
    हृदय के गौरव में था गर्व, किसी को देख न सके विपन्न
    हमारे संचय में था दान, अतिथि थे सदा हमारे देव
    वचन में सत्य, हृदय में तेज, प्रतिज्ञा मे रहती थी टेव
    वही है रक्त, वही है देश, वही साहस है, वैसा ज्ञान
    वही है शांति, वही है शक्ति, वही हम दिव्य आर्य-संतान
    जियें तो सदा इसी के लिए, यही अभिमान रहे यह हर्ष
    निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष
    – जयशंकर प्रसाद

 

  • मैं भारत का इक प्यादा हँू, हर ओर अमन मैं चाहता हूँ
    जो धर्मों को लड़वाता है, निर्दोषों को मरवाता है
    उस खल की निंदा करता हूँ
    मैं भारत का इक प्यादा हँू, हर ओर अमन मैं चाहता हूँ
    जो दया सभी पर करता है, जो भला सभी का करता है
    हर-क्षण उसके ही गुन गाता हूँ
    मैं भारत का इक प्यादा हँू, हर ओर अमन मैं चाहता हूँ
    जो दंगो को भड़काता है, मानव का रक्त बहाता है
    मैं उसके कल से डरता हूँ
    मैं भारत का इक प्यादा हँू, हर ओर अमन मैं चाहता हूँ
    जो ईद-दिवाली मनाता है, सबको मानवता सिखलाता है
    मैं आगे उसके नतमस्तक हूँ
    मैं भारत का इक प्यादा हँू, हर ओर अमन मैं चाहता हूँ
    – NAWAZ ANWER KHAN
  • Short Desh Bhakti Poem in Hindi देशभक्ति कविता हिन्दी में Desh Bhakti Kavita

 

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Short Desh Bhakti Poem in Hindi देशभक्ति कविता हिन्दी में Desh Bhakti Kavita

 

 


  • Short Desh Bhakti Poem in Hindi
    – तब विद्रोह जरुरी है

  • जब सूरज संग हो जाए अंधियार के, तब दीये का टिमटिमाना जरूरी है…
    जब प्यार की बोली लगने लगे बाजार में, तब प्रेमी का प्रेम को बचाना जरूरी है……
    जब देश को खतरा हो गद्दारों से, तो गद्दारों को धरती से मिटाना जरूरी है….
    जब गुमराह हो रहा हो युवा देश का, तो उसे सही राह दिखाना जरूरी है………..
    जब हर ओर फैल गई हो निराशा देश में, तो क्रांति का बिगुल बजाना जरूरी है…..
    जब नारी खुद को असहाय पाए, तो उसे लक्ष्मीबाई बनाना जरूरी है…………
    जब नेताओं के हाथ में सुरक्षित न रहे देश, तो फिर सुभाष का आना जरूरी है……
    जब सीधे तरीकों से देश न बदले, तब विद्रोह जरूरी है……………..
    – अभिषेक मिश्र

  • Bharat Mata Poem in Hindi
    – मैं भारत माता हूँ

    इतने व्यस्त हो गए तुम, कि तुम्हारा देशप्रेम साल में 2 बार जगता है
    उन सैनिकों के बारे में सोचो, जिनके जीवन का पल-पल देश के लिए लगता है
    कोई देश के लिए शान से मरता है………….
    और एक तुम हो, जिसे देश के लिए जीना भी मुश्किल लगता है ?
    On field Players और On Screen Heroes आदर्श बन गए हैं तुम्हारे
    उन लोगों को तुम याद तक नहीं करते, जो Real Life में Heroes हैं
    जरा सोचो इन खोखले Role Models ने तुम्हें क्या दिया है अबतक ?
    तुम अपने आदर्श बदल लो, इससे पहले कि औंधे मुँह गिरो तुमपार्टी विरोधियों के विरुद्ध डटकर खड़े हो जाते हो तुम

    राष्ट्र विरोधियों के विरुद्ध क्यों नहीं आवाज उठाते हो तुम ?
    राजनीति, सत्ता सुख पाने का जरिया है जिनके लिए उन्हें क्यों पूजते हो तुम ?
    इससे पहले कि देर हो जाए, राष्ट्रनीति को राजनीति का विकल्प बना लो तुम
    न एक शिक्षा नीति, न समान नागरिकता नीति
    ये तो है अंग्रेजों की बांटों और राज करो नीति
    क्यों किसी और से बदलाव किसी उम्मीद करते हो तुम……
    जब खुद देश के लिए……. कुछ नहीं करते हो तुम ? ? ?
    मैं भारत माता हूँ तुम्हारी…. मैं आज भी रो रही हूँ
    क्योंकि तुम आज भी मोह की नींद में सो रहे हो
    हो सके तो, अब भी जाग जाओ तुम……..
    इससे पहले कि सब कुछ खत्म हो जाए, खुद को पहचान जाओ तुम.
    – अभिषेक मिश्र ( Abhi )

 


  • Desh Bhakti Ki Kavita in Hindi –
    हिन्द हमारा है

  • हम हिन्द के हैं
    हिन्द हमारा है
    ना फौजी हैं ना नेता
    फिरभी हिन्द का दायित्व सम्भाला है
    क्योंकि हिन्द हमारा है
    किसी ने कहा मुसलमान होने पर गर्व करो
    कोई बोल गया गर्व से कहो तुम हिंदु हो
    ये नेता बोल बोल कर चले गए,
    मग़र उनके बोल जन जन में अंगारों जैसे फूट पड़े,
    दोनों विचारों का अभिमान वही टकराता है,
    दो सम्प्रदायों का अलगाव वही बहकाता है,
    फिर वही कहीं पर ‘अखण्ड भारत’ का अभिलेख
    छिन्न भिन्न पड़ जाता है,
    इसी अभिलेख को साकार करने में
    कितनों ने जीवन गंवाया है
    क्योंकि हिन्द हमारा है ।
    स्वयं को श्रेष्ठ कहो
    मगर क्या हक़ तेरा कि दूजे को नीच कहे,
    इस आज़ादी के लिए सबके हैं रक्त बहे,
    फिर तू क्यों धर्म का संरक्षक बनता है,
    जो है अनादि काल से संचित,
    उसको कौन मिटा सकता है?
    बनना है तो राष्ट्र का संरक्षक बन,
    धर्म तो युगों से कायम है सनातन है,
    मगर राष्ट्र ये जो टूट रहा है,
    उसकी रक्षा का दायित्व हमारा है ।
    क्योंकि हिन्द हमारा है ।
    नेताओं राजनेताओं के भाषण ही हमको तोड़ रहे हैं,
    धर्म से तो जोड़ रहे हैं, मग़र राष्ट्र से ही तोड़ रहे हैं,
    राम रहीम में भेद बताकर घृणा का विष घोल रहे हैं,
    राजनीती नहीं ये प्रत्यक्ष देशद्रोह है
    कप्टियो को पहचानो !
    जो जन गण मन के जयकारों को छोड़ रहे हैं,
    ना हिन्दू, ना मुसलमान,
    हमें भारतीयों के संगठन का संकल्प उठाना है
    क्योंकि हिन्द हमारा है ।
    एकेश्वरवादी यहां बोली से प्रहार करते हैं,
    नास्तिक हैं वो जो लोगो में घृणा का संचार करते हैं,
    धार्मिक इतिहास बताते फिरते हैं,
    और राष्टीय भविष्य को बाधित करते हैं,
    ये मानव भक्षी हैं जो पंथ काज से सबको छलते हैं।
    हर तरफ सामाजिक द्वेष का सृजन हो रहा है,
    ऐ हिन्द! अब तेरा पतन हो रहा है ।
    हिन्द का पतन है हम सबका अंत,
    क्योकि हिन्द हमारा है ।
    आज यहां संस्कृतियों में भेद बताये जाते हैं,
    कल हम सांस्कृतिक मेल से जाने जाते थे,
    पग पग में एकता को दर्शाते थे,
    ये धरम करम का बीड़ा उठाये कहाँ फंसे हैं?
    हम तो भारत के भाग्यविधाता थे ।
    चलो फिर शुभ नाम से जागे
    और फिर शुभ आशीष मांगे
    फिर जयगाथा दोहराएं
    क्योकि हिन्द हमारा है
    इसकी रक्षा का दायित्व हमारा है ।
    -Jaya Pandey

 


  • Patriotic Poem in Hindi
    – **बहुत बदल गया अपना देश **

    तबसे अब में खूब,मचा विकास का जनादेश !
    एसी तैसी हुआ ,बहुत बदल गया अपना देश !!
    बहुत बदल गया अपना देश !
    अंग्रेजी का भाव बढ़ गया ,देश हुआ परदेश !
    पगड़ी गमछा लाज लगे,भाए बिलायती भेष!!
    बहुत बदल गया अपना देश !
    दाल भात पचता नहीं,रोग बर्गर पिज्जा की तैस !
    शौखिनी में बड़ी गरीबी,भुगते लाग बाज की रेस !!
    बहुत बदल गया अपना देश !
    माँ बहन अफसोस हो गयी,बिटिया हुई कलेस!
    कलंकओढ़ बहू जल गयी,कलमुही है सन्देश!!
    बहुत बदल गया अपना देश !
    गवांर मरे मजदूरी बिन  ,पढे़-लिखे सब शेष !
    करता धरता आलस बांचे,बचा न कुछ उद्देश !!
    बहुत बदल गया अपना देश !
    साधू सन्त व्यापार करे ,चोर उचक्का आदेश !
    हुआ निकम्मा अभिेनेता ,जग बांटे सब उपदेश!!
    बहुत बदल गया अपना देश !
    शाकाहारी खेत खरीहान ,उजाड़ बसे सब ऐस!
    मांसाहारी भूख जीभ का, शमशान बना ए द्वेष!!
    बहुत बदल गया अपना देश !
    चारा सारा राजनीति खा गया,गाये खाए आवेश !
    किसान मरे बिन पानी के,न लगा किसीको ठेस !!
    बहुत बदल गया अपना देश !
    पत्थर खुद पर दे मारे ,कुछ उन्मादी तर्क अन्वेष !
    आम बात हुई सहादत ,क्या सरकारी अध्यादेश!!
    बहुत बदल गया अपना देश !
    बहुत बदल गया अपना देश !
    – अरविंद कुमार तिवारी
    बामपुर,इलाहाबाद

 


  • Hum Hain Hindustani Poetry
    – हम हैं हिन्दुस्तानी

  • Hum Hai Hindustani, Hindustan Hamara Hai
    Hum Hai jaha Ke sher,ye Abhiman Hamara है
    Lakh jamana chahe hame metane ki,
    par ye na bhule Ke sarhado par balidan Hamara है
    Kah do vatan Ke un gaddaro se,
    ham Hindustani hai ye iman Hamara है
    Are ye vaihsi daride kya ukhar lege,
    Ke unke aage tiraja shan Hamara hai
    Ham hai Hindustani Hindustan Hamara hai,
    ham hai jaha Ke sher ye abhiman Hamara है
    – md shamim

 


  • Desh Prem Kavita in Hindi
    – सारा देश हमारा

    केरल से कारगिल घाटी तक
    गोहाटी से चौपाटी तक
    सारा देश हमारा
    जीना हो तो मरना सीखो
    गूंज उठे यह नारा
    सारा देश हमारा
    केरल से कारगिल घाटी तक…
    लगता है ताजे कोल्हू पर जमी हुई है काई
    लगता है फिर भटक गई है भारत की तरुणाई
    कोई चीरो ओ रणधीरो !
    ओ जननी के भाग्य लकीरों !
    बलिदानों का पुण्य मुहूरत आता नहीं दुबारा
    जीना हो तो मरना सीखो गूंज उठे यह नारा
    सारा देश हमारा
    केरल से कारगिल घाटी तक…
    घायल अपना ताजमहल है ,घायल गंगा मैया
    टूट रहे हैं तूफानों में नैया और खेवैया
    तुम नैया के पाल बदल दो
    तूफानों की चाल बदल दो
    हर आंधी का उतार हो तुम,तुमने नहीं विचारा
    जीना हो तो मरना सीखो गूंज उठे यह नारा
    सारा देश हमारा
    केरल से कारगिल घाटी तक…
    कहीं तुम्हें परवत लड़वा दे ,कहीं लड़ा दे पानी
    भाषा के नारों में गम है ,मन की मीठी वाणी
    आग दो इन नारों में
    इज्ज़त आ गई बाजारों में
    कब जागेंगे सोये सूरज ! कब होगा उजियारा
    जीना हो तो मरना सीखो गूंज उठे यह नारा
    सारा देश हमारा
    केरल से कारगिल घाटी तक…
    संकट अपना बाल सखा है इसको कंठ लगाओ
    क्या बैठे हो न्यारे-न्यारे मिलकर बोझ उठाओ
    भाग्य भरोसा कायरता है
    कर्मठ देश कहाँ मरता है
    सोचो तुमने इतने दिन में कितनी बार हुंकारा
    जीना हो तो मरना सीखो गूंज उठे यह नारा
    सारा देश हमारा
    केरल से कारगिल घाटी तक…
    – बालकवि वैरागी balkavi bairagi ki desh bhakti kavita

 


  • Mathrubhumi Poem in Hindi
    – मातृभूमि

    ऊँचा खड़ा हिमालय
    आकाश चूमता है,
    नीचे चरण तले झुक,
    नित सिंधु झूमता है।
    गंगा यमुन त्रिवेणी
    नदियाँ लहर रही हैं,
    जगमग छटा निराली
    पग पग छहर रही है।
    वह पुण्य भूमि मेरी,
    वह स्वर्ण भूमि मेरी।
    वह जन्मभूमि मेरी
    वह मातृभूमि मेरी।
    झरने अनेक झरते
    जिसकी पहाड़ियों में,
    चिड़ियाँ चहक रही हैं,
    हो मस्त झाड़ियों में।
    अमराइयाँ घनी हैं
    कोयल पुकारती है,
    बहती मलय पवन है,
    तन मन सँवारती है।
    वह धर्मभूमि मेरी,
    वह कर्मभूमि मेरी।
    वह जन्मभूमि मेरी
    वह मातृभूमि मेरी।
    जन्मे जहाँ थे रघुपति,
    जन्मी जहाँ थी सीता,
    श्रीकृष्ण ने सुनाई,
    वंशी पुनीत गीता।
    गौतम ने जन्म लेकर,
    जिसका सुयश बढ़ाया,
    जग को दया सिखाई,
    जग को दिया दिखाया।
    वह युद्ध–भूमि मेरी,
    वह बुद्ध–भूमि मेरी।
    वह मातृभूमि मेरी,
    वह जन्मभूमि मेरी।
    – सोहनलाल द्विवेदी patriotic poem in hindi by sohanlal dwivedi

 

 

स्वतन्त्रता दिवस कविता Independence day Poems in Hindi Indian swatantrata

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  • स्वतन्त्रता की कीमत 

 

  • अगर आजादी को बचाना चाहते हो, तो देश के लिए लहू बहाना होगा
    जो देश की खातिर जीते-मरते हैं, उनके आगे अपना शीश झुकाना होगा
    जो चाहते हो, जय हिन्द का नारा बुलंद रहे, तो तुम्हें सुभाष बन जाना होगा…………
    अगर अकबर को उसकी औकात दिखानी है, तो खुद को प्रताप बनाना होगा………………
    मुगलों से लोहा लेना है, तो शिवाजी बनकर आना होगा
    गौरी को मौत की नींद सुलानी है, तो पृथ्वीराज सा बाण चलाना होगा
    अगर अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने हो, तो लक्ष्मीबाई बन जाना होगा…………………….
    कभी मंगल, कभी भगत, तो कभी आजाद बनकर धरती में आना होगा…………………..
    जाति धर्म देखे बिना, देशद्रोहियों को अपने हाथों से मिटाना होगा
    नई पीढ़ी को अभिमन्यु सा, गर्भ में देशभक्ति का पाठ पढ़ाना होगा
    तुम्हें व्यक्तिवाद छोड़कर राष्ट्रवाद अपनाना होगा………………………
    हर व्यक्ति में भारतीय होने का स्वाभिमान जगाना होगा………………………..
    लोकतंत्र को स्त्तालोलुपों से मुक्त कराना होगा
    देशभक्ति को भारत का सबसे बड़ा धर्म बनाना होगा
    वीरता की परम्परा को आगे बढ़ाना होगा……………………….
    हर भारतीय को देश के लिए जीना सिखाना होगा………………………………
    – अभिषेक मिश्र ( Abhi )
  • आजादी का दीप

    14 अगस्त की शाम लिखा मैने
    क्या आजादी का दीप जलेगा कभी
    जो जले थे कभी वो भी बुझ गए
    अगर सरकारें करती रहीं मक्कारी
    तो न सुधरेगी जनता की बदहाली
    ऐसे मे आजादी का दीप जलेगा कभी
    कब तक लुटेगी बेटी की आबरु
    क्या न मिलेंगी बेटी को आजादी
    ऐसे मे आजादी का दीप जलेगा कभी
    कब तक रहेगी अब बेरोजगारी
    क्या अब न मिटेगी गरीबी कभी
    ऐसे मे आजादी का दीप जलेगा कभी
    – राम राज कुशवाहा

 

  • नौजवान आओ रे
    नौजवान आओ रे, नौजवान गाओ रे ।।
    लो क़दम बढ़ाओ रे, लो क़दम मिलाओ रे ।।
    ऐ वतन के नौजवान, इक चमन के बागवान ।
    एक साथ बढ़ चलो, मुश्किलों से लड़ चलो ।
    इस महान देश को नया बनाओ रे ।।
    नौजवान…
    धर्म की दुहाइयाँ, प्रांत की जुदाइयाँ ।
    भाषा की लड़ाइयाँ, पाट दो ये खाइयाँ ।
    एक माँ के लाल, एक निशां उठाओ रे ।।
    नौजवान…
    एक बनो नेक बनो, ख़ुद की भाग्य रेखा बनो ।
    सर्वोदय के तुम हो लाल, तुमसे यह जग निहाल ।
    शांति के लिए जहाँ को तुम जगाओ रे ।।
    नौजवान…
    माँ निहारती तुम्हें, माँ पुकारती तुम्हें ।
    श्रम के गीत गाते जाओ, हँसते मुस्कराते जाओ ।
    कोटि कण्ठ एकता के गान गाओ रे ।।
    नौजवान…
    – बालकवि वैरागी

     

  • प्यारे भारत देश

    प्यारे भारत देश
    गगन-गगन तेरा यश फहरा
    पवन-पवन तेरा बल गहरा
    क्षिति-जल-नभ पर डाल हिंडोले
    चरण-चरण संचरण सुनहरा
    ओ ऋषियों के त्वेष
    प्यारे भारत देश।।
    वेदों से बलिदानों तक जो होड़ लगी
    प्रथम प्रभात किरण से हिम में जोत जागी
    उतर पड़ी गंगा खेतों खलिहानों तक
    मानो आँसू आये बलि-महमानों तक
    सुख कर जग के क्लेश
    प्यारे भारत देश।।
    तेरे पर्वत शिखर कि नभ को भू के मौन इशारे
    तेरे वन जग उठे पवन से हरित इरादे प्यारे!
    राम-कृष्ण के लीलालय में उठे बुद्ध की वाणी
    काबा से कैलाश तलक उमड़ी कविता कल्याणी
    बातें करे दिनेश
    प्यारे भारत देश।।
    जपी-तपी, संन्यासी, कर्षक कृष्ण रंग में डूबे
    हम सब एक, अनेक रूप में, क्या उभरे क्या ऊबे
    सजग एशिया की सीमा में रहता केद नहीं
    काले गोरे रंग-बिरंगे हममें भेद नहीं
    श्रम के भाग्य निवेश
    प्यारे भारत देश।।
    वह बज उठी बासुँरी यमुना तट से धीरे-धीरे
    उठ आई यह भरत-मेदिनी, शीतल मन्द समीरे
    बोल रहा इतिहास, देश सोये रहस्य है खोल रहा
    जय प्रयत्न, जिन पर आन्दोलित-जग हँस-हँस जय बोल रहा,
    जय-जय अमित अशेष
    प्यारे भारत देश।।
    – माखनलाल चतुर्वेदी makhanlal chaturvedi ki desh bhakti rachnaye

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