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हरिवंश राय बच्चन पोयम्स इन हिंदी – Harivansh Rai Bachchan Poems in Hindi

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हरिवंश राय बच्चन पोयम्स इन हिंदी - Harivansh Rai Bachchan Poems in Hindi

 

  • क्षण भर को क्यों प्यार किया था? Harivansh Rai Bachchan Poems in Hindi – 1

 

  • क्षण भर को क्यों प्यार किया था?
    अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
    पलक संपुटों में मदिरा भर
    तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था?
    क्षण भर को क्यों प्यार किया था?
    यह अधिकार कहाँ से लाया?’
    और न कुछ मैं कहने पाया –
    मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था!
    क्षण भर को क्यों प्यार किया था?
    वह क्षण अमर हुआ जीवन में,
    आज राग जो उठता मन में –
    यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था!
    क्षण भर को क्यों प्यार किया था? – हरिवंशराय बच्चन
  • आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।

    आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।
    है कंहा वह आग जो मुझको जलाए,
    है कंहा वह ज्वाल पास मेरे आए,
    रागिनी, तुम आज दीपक राग गाओ;
    आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।
    तुम नई आभा नहीं मुझमें भरोगी,
    नव विभा में स्नान तुम भी तो करोगी,
    आज तुम मुझको जगाकर जगमगाओ;
    आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।
    मैं तपोमय ज्योती की, पर, प्यास मुझको,
    है प्रणय की शक्ति पर विश्वास मुझको,
    स्नेह की दो बूंदे भी तो तुम गिराओ;
    आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।
    कल तिमिर को भेद मैं आगे बढूंगा,
    कल प्रलय की आंधियों से मैं लडूंगा,
    किन्तु आज मुझको आंचल से बचाओ;
    आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ । – हरिवंशराय बच्चन

 

  • Harivansh Rai Bachchan Poems in Hindi – 2 जो बीत गई सो बात गई

    जो बीत गई सो बात गई
    जीवन में एक सितारा था
    माना वह बेहद प्यारा था
    वह डूब गया तो डूब गया
    अम्बर के आनन को देखो
    कितने इसके तारे टूटे
    कितने इसके प्यारे छूटे
    जो छूट गए फिर कहाँ मिले
    पर बोलो टूटे तारों पर
    कब अम्बर शोक मनाता है
    जो बीत गई सो बात गई
    जीवन में वह था एक कुसुम
    थे उसपर नित्य निछावर तुम
    वह सूख गया तो सूख गया
    मधुवन की छाती को देखो
    सूखी कितनी इसकी कलियाँ
    मुर्झाई कितनी वल्लरियाँ
    जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली
    पर बोलो सूखे फूलों पर
    कब मधुवन शोर मचाता है
    जो बीत गई सो बात गई
    जीवन में मधु का प्याला था
    तुमने तन मन दे डाला था
    वह टूट गया तो टूट गया
    मदिरालय का आँगन देखो
    कितने प्याले हिल जाते हैं
    गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
    जो गिरते हैं कब उठतें हैं
    पर बोलो टूटे प्यालों पर
    कब मदिरालय पछताता है
    जो बीत गई सो बात गई
    मृदु मिटटी के हैं बने हुए
    मधु घट फूटा ही करते हैं
    लघु जीवन लेकर आए हैं
    प्याले टूटा ही करते हैं
    फिर भी मदिरालय के अन्दर
    मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
    जो मादकता के मारे हैं
    वे मधु लूटा ही करते हैं
    वह कच्चा पीने वाला है
    जिसकी ममता घट प्यालों पर
    जो सच्चे मधु से जला हुआ
    कब रोता है चिल्लाता है
    जो बीत गई सो बात गई – हरिवंशराय बच्चन

 

  • राष्ट्रिय ध्वज – Harivansh Rai Bachchan Poems in Hindi – 3

    नागाधिराज श्रृंग पर खडी हु‌ई,
    समुद्र की तरंग पर अडी हु‌ई,
    स्वदेश में जगह-जगह गडी हु‌ई,
    अटल ध्वजा हरी,सफेद केसरी!
    न साम-दाम के समक्ष यह रुकी,
    न द्वन्द-भेद के समक्ष यह झुकी,
    सगर्व आस शत्रु-शीश पर ठुकी,
    निडर ध्वजा हरी, सफेद केसरी!
    चलो उसे सलाम आज सब करें,
    चलो उसे प्रणाम आज सब करें,
    अजर सदा इसे लिये हुये जियें,
    अमर सदा इसे लिये हुये मरें,
    अजय ध्वजा हरी, सफेद केसरी! – हरिवंशराय बच्चन

  • साथी, साँझ लगी अब होने Harivansh Rai Bachchan Poems in Hindi – 4
    फैलाया था जिन्हें गगन में,
    विस्तृत वसुधा के कण-कण में,
    उन किरणों के अस्ताचल पर पहुँच लगा है सूर्य सँजोने!
    साथी, साँझ लगी अब होने!
    खेल रही थी धूलि कणों में,
    लोट-लिपट गृह-तरु-चरणों में,
    वह छाया, देखो जाती है प्राची में अपने को खोने!
    साथी, साँझ लगी अब होने!
    मिट्टी से था जिन्हें बनाया,
    फूलों से था जिन्हें सजाया,
    खेल-घरौंदे छोड़ पथों पर चले गए हैं बच्चे सोने!
    साथी, साँझ लगी अब होने! – हरिवंशराय बच्चन

 

  • अग्निपथ – Harivansh Rai Bachchan Poems in Hindi – 5

    वृक्ष हों भले खड़े,
    हों घने हों बड़े,
    एक पत्र छाँह भी,
    माँग मत, माँग मत, माँग मत,
    अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
    तू न थकेगा कभी,
    तू न रुकेगा कभी,
    तू न मुड़ेगा कभी,
    कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
    अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
    यह महान दृश्य है,
    चल रहा मनुष्य है,
    अश्रु श्वेत रक्त से,
    लथपथ लथपथ लथपथ,
    अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ। – हरिवंशराय बच्चन

  • ऐसे मैं मन बहलाता हूँ – Harivansh Rai Bachchan Poems in Hindi – 6
    सोचा करता बैठ अकेले,
    गत जीवन के सुख-दुख झेले,
    दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!
    ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
    नहीं खोजने जाता मरहम,
    होकर अपने प्रति अति निर्मम,
    उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!
    ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
    आह निकल मुख से जाती है,
    मानव की ही तो छाती है,
    लाज नहीं मुझको देवों में यदि मैं दुर्बल कहलाता हूँ!
    ऐसे मैं मन बहलाता हूँ! – हरिवंशराय बच्चन

  • मैं कल रात नहीं रोया था – Harivansh Rai Bachchan Poems in Hindi – 7

    मैं कल रात नहीं रोया था
    दुख सब जीवन के विस्मृत कर,
    तेरे वक्षस्थल पर सिर धर,
    तेरी गोदी में चिड़िया के बच्चे-सा छिपकर सोया था!
    मैं कल रात नहीं रोया था!
    प्यार-भरे उपवन में घूमा,
    फल खाए, फूलों को चूमा,
    कल दुर्दिन का भार न अपने पंखो पर मैंने ढोया था!
    मैं कल रात नहीं रोया था!
    आँसू के दाने बरसाकर
    किन आँखो ने तेरे उर पर
    ऐसे सपनों के मधुवन का मधुमय बीज, बता, बोया था?
    मैं कल रात नहीं रोया था – हरिवंशराय बच्चन

 

  • रात आधी, खींच कर मेरी हथेली – Harivansh Rai Bachchan Poems in Hindi – 9 

    रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।
    फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में
    और चारों ओर दुनिया सो रही थी,
    तारिकाएँ ही गगन की जानती हैं
    जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी,
    मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे
    अधजगा-सा और अधसोया हुआ सा,
    रात आधी खींच कर मेरी हथेली
    रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।
    एक बिजली छू गई, सहसा जगा मैं,
    कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में,
    इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू
    बह रहे थे इस नयन से उस नयन में,
    मैं लगा दूँ आग इस संसार में है
    प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर,
    जानती हो, उस समय क्या कर गुज़रने
    के लिए था कर दिया तैयार तुमने!
    रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।
    प्रात ही की ओर को है रात चलती
    औ’ उजाले में अंधेरा डूब जाता,
    मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी,
    खूबियों के साथ परदे को उठाता,
    एक चेहरा-सा लगा तुमने लिया था,
    और मैंने था उतारा एक चेहरा,
    वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने पर
    ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने।
    रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।
    और उतने फ़ासले पर आज तक सौ
    यत्न करके भी न आये फिर कभी हम,
    फिर न आया वक्त वैसा, फिर न मौका
    उस तरह का, फिर न लौटा चाँद निर्मम,
    और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ,
    क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं–
    बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो
    रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने।
    रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने। – हरिवंशराय बच्चन

 

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