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18 ऐतिहासिक गलतियाँ जिसकी महँगी कीमत भारत ने चुकाई Prachin bharat ka itihas

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  • प्राचीन भारत का इतिहास Prachin Bharat Ka Itihas in Hindi History of India Pdf

  • इस लेख में हम बात करेंगे भारत की आजादी के पहले और भारत की आजादी के बाद की 18 ऐतिहासिक
    भूलों के बारे में…… जिनकी महंगी कीमत पूरे भारत को चुकानी पड़ी. और इनमें से कुछ गलतियों की
    कीमत हम भारतीय आज भी चुका रहे हैं.

 

  • मोहम्मद गोरी को पहली हीं लड़ाई में नहीं मारना – पृथ्वीराज चौहान द्वारा मोहम्मद गोरी को पहली हीं
    लड़ाई में नहीं मारना एक ऐतिहासिक भूल थी. जिसका नतीजा यह हुआ कि मोहम्मद गोरी ने भारत को
    बहुत क्षति पहुंचाई.
  • झाँसी के धनाढ्य लोगों द्वारा रानी लक्ष्मीबाई को धन नहीं देना – झाँसी के स्थानी धनाढ्य लोगों ने महारानी लक्ष्मीबाई को युद्ध के समय धन देकर सहयोग नहीं किया. अगर उन लोगों ने सहयोग किया होता,
    तो शायद आज भारत की तस्वीर कुछ और हीं होती.
  • प्रथम स्वाधीनता संग्राम का एक साथ शुरू नहीं होना – प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम समय से

    पहले और अलग-अलग स्थानों पर शुरू हुआ. इससे अंग्रेजों को इसे दमन करने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई.

  • प्रथम स्वाधीनता संग्राम अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर के नेतृत्व में लड़ा जाना –
    बहादुरशाह जफर एक साधारण नेतृत्व कर्ता था, अगर यह लड़ाई किसी भारतीय के नेतृत्व में लड़ी गई होती….
    तो शायद परिणाम कुछ और होता.
  • गाँधी जी का अति अहिंसावादी होना – गाँधी जी और सुभाषचंद्र बोस के बीच के वैचारिक मतभेद कभी खत्म नहीं हुए. सुभाषचंद्र बोस ने गाँधी जी के साथ मतभेद के कारण हीं मजबूर होकर कांग्रेस छोड़ दिया. जिसके कारण आजादी के बाद के सारे फैसले तथाकथित उदारवादी नेताओं ने लिए. उग्र राष्ट्रवादी नेताओं की आजादी के फैसलों में कोई भूमिका नहीं रही.
  • प्राचीन भारतीय राजाओं के बीच की फूट और अदूरदर्शी सोच – भारतीय राजाओं ने मुगलों के पांव भारत में जमने से रोकने के लिए एकजुट होकर प्रयास नहीं किया. और इसका नतीजा हुआ कि मुगलों ने लगभग 350 वर्षों तक भारत को लूटा और भारत में भविष्य के लिए भी कई समस्याओं को जन्म दे दिया.

  • अंग्रेजों को भारत को गुलाम बनाने देना – भारतीय राजाओं ने मुगलों के साथ वाली गलती अंग्रेजों के साथ भी दोहराई. वे प्रारम्भ में अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होकर नहीं लड़े. और नतीजा हुआ कि लगभग 100 साल तक हम उनके गुलाम बने रहे.
  • भारत का बँटवारा – भारत के बँटवारे की कीमत आज भी हर भारतीय चुका रहा है. यह बँटवारा भारत के लिए
    किसी भी प्रकार से सही नहीं साबित हुआ है.
  • आजादी के बाद सुभाष, भगतसिंह आदि का नहीं होना – आजादी के बाद बड़े उग्र राष्ट्रवादी नेताओं का न
    होना भी भारत के लिए नुकसानदेह साबित हुआ. क्योंकि सत्तासीन एक विचारधारा ने कई गलत फैसले लिए.
  • 1965 की लड़ाई में जीते हुए भूभाग को पाकिस्तान को लौटाना – 1965 की लड़ाई में भारत ने लाहौर
    तक जीत हासिल कर ली थी, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय दबाव के कारण भारत ने वो भूभाग लौटा दिया.
  • कश्मीर मामले को सरदार पटेल को नहीं सुलझाने देना – पं. नेहरु ने कश्मीर मामले को खुद सुलझाने का प्रयास किया, उन्होंने सरदार पटेल को इसे नहीं सुलझाने दिया. इसी कारण से कश्मीर आज भारत के लिए एक
    बड़ी समस्या बना हुआ है.
  • गाँधी जी द्वारा असहयोग आन्दोलन वापस लेना- चौरा-चौरी पुलिस स्टेशन में हिंसा के कारण गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया. इस आन्दोलन को वापस लेना गाँधी जी के ऐतहासिक भूलों में से एक था.

 

  • गाँधी जी द्वारा सुभाषचंद्र बोस के खिलाफ असहयोग का माहौल खड़ा करना – गांधीजी ने पट्टाभि सीतारमैय्या को अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाया था, लेकिन सुभाष यह चुनाव जीत गए. गाँधी जी ने पट्टाभि सीतारमैय्या की हार को अपनी हार बताकर अपने साथियों से कह दिया कि अगर वें सुभाष के तरीकों से सहमत नहीं हैं तो वें कांग्रेस से हट सकतें हैं. इसके बाद कांग्रेस कार्यकारिणी के 14 में से 12 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया. केवल शरदबाबू सुभाष के साथ रहे. इस असहयोग के माहौल के कारण हीं गाँधी जी कांग्रेस से हट गए. और सशस्त्र आन्दोलन के लिए देश से बाहर चले गए और फिर कभी वापस नहीं आए. अगर गाँधी जी ने सुभाष बाबू का साथ दिया होता, तो आजादी के बाद भी सुभाष हमारे बीच रहते.
  • गाँधीजी द्वारा भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु की फाँसी रोकने के लिए विशेष प्रयास नहीं करना –
    भगत सिंह की फाँसी माफ कराने के लिये गाँधी जी ने अंग्रेजी सरकार से बात तो की परन्तु नरमी के साथ.
    सुभाष चाहते थे कि इस विषय पर गाँधीजी अंग्रेज सरकार के साथ किया गया समझौता तोड़ दें.
    लेकिन गांधीजी अपनी ओर से दिया गया वचन तोड़ने को राजी नहीं थे. अंग्रेज सरकार अपने स्थान पर अड़ी रही
    और भगत सिंह व उनके साथियों को फाँसी दे दी गयी. भगत सिंह को न बचा पाने पर सुभाष गाँधी
    और कांग्रेस के तरिकों से बहुत नाराज हो गये.
  • गाँधी जी द्वारा सुभाष की बात नहीं मानना – सुभाषचंद्र बोस, गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन से बहुत पहले हीं पूर्ण स्वराज के लिए आन्दोलन शुरू करना चाहते थे. लेकिन गाँधी जी ने उस समय सुभाष की बात नहीं मानी थी.
    अगर यह आन्दोलन शुरू होता तो शायद भारत को पहले हीं आजादी मिल जाती.

 

  • गाँधी जी का अति आदर्शवादी होना – 1938 में गान्धीजी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सुभाष को चुना तो
    था मगर उन्हें सुभाष की कार्यपद्धति पसन्द नहीं आयी. इसी दौरान यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध के बादल
    छा गए थे. सुभाष चाहते थे कि इंग्लैंड की इस कठिनाई का लाभ उठाकर भारत का स्वतन्त्रता संग्राम
    अधिक तीव्र किया जाये. उन्होंने अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में इस ओर कदम उठाना भी शुरू कर दिया था
    परन्तु गान्धीजी इससे सहमत नहीं थे। नतीजा यह हुआ कि आजादी में देर हुई और देश का बँटवारा भी हुआ,
    अगर आजादी पहले मिल गई होती तो देश का बँटवारा नहीं हुआ होता क्योंकि उस वक्त बँटवारे का माहौल नहीं था.
  • चीन पर अत्यधिक भरोसा करना – भारत-चीन की 1962 की लड़ाई में भारत की हार हुई.
    यह नेहरु जी की गलत नीतियों का नतीजा था.
  • धारा 370 – नेहरु जी ने कश्मीर को धारा 370 की विशेष सुविधा दी. लेकिन यही धारा 370
    आज कश्मीर समस्या की मूल जड़ बन गई है. क्योंकि भारत का कोई भी नागरिक वहां घर नहीं
    बना सकता है. और इसी धारा के कारण भारत में पास हुआ कोई भी कानून तबतक वहां लागू
    नहीं होता है, जबतक वहाँ की विधानसभा उसे पास नहीं कर देती है.
  • देशभक्तों की निंद्रा – Poem On India in Hindi

 

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