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दहेज प्रथा पर कविता – Poem On Dahej Pratha in Hindi Poem on Dowry in Hindi

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दहेज प्रथा पर कविता - Poem On Dahej Pratha in Hindi

 

  • # -; दहेज – पिशाचिनी :- # – Poem On Dahej Pratha in Hindi – Poem on Dowry in Hindi

    दहेज- पिशाचिनी नाच रही है
    खूनी- खप्पर भर – भर कर !
    असली पूतना मरी नहीं
    सोने नहीं देती रात भर !
    बस यही सपना है मेरा
    मिल जाये सुंदर सा वर !
    झट बेटी का व्याह रचाता
    चैन से सोता रात भर !
    गया मंडी में बोली सुनने
    भौंचक रह गया सुनकर !
    दहेज -पिशाचिनी नाच रही है
    खूनी – खप्पर भर – भर कर !
    बस यही सपना है मेरा
    घर पर आये रिश्ते -नाते !
    धूम – धड़ाके , गाजे – बाजे
    नन्हें , युवा , बुड् ढें नाचे !
    स्वागत में न कोई कोर – कसर हो
    करूँ खातिरदारी बढ़ – चढ़ कर !
    दहेज – पिशाचिनी नाच रही है
    खूनी – खप्पर भर – भर कर !
    मुझमें इतना चातुर्य नहीं
    न मिला लूटने का अवसर !
    बेटी का व्याह रचाना है
    पर लाऊँ कहाँ से ज़ेवर !
    बेच दिया जो था पुस्तैनी
    न रह जाये कोई कोर – कसर !
    दहेज – पिशाचिनी नाच रही है
    खूनी – खप्पर भर – भर कर !
    कौडी – कौडी जोड रखा था
    मुँह पर पट्टी बाँध कर !
    गाढी कमाई स्वाहा हो गई
    कुरीतियों की होली पर !
    मेरी नाक तो कटा नहीं
    क्यों हँस रहे मुझे देखकर ?
    दहेज – पिशाचिनी नाच रही है
    खूनी – खप्पर भर – भर कर !
    चन्दन कुमार
    प्रधानाध्यापक
    स्तरोन्नत उच्च विध्यालय लठेया
    छत्तरपुर ,पलामू

 

  • दहेज प्रथा – Poem On Dahej Pratha in Hindi – Poem on Dowry in Hindi

    कहते हैं भगवान की अतुलनीय देन है बेटियाँ
    होता है जब जन्म उसका, तो माँ-बाप के घर-आंगन में आ जाती है बहार
    खिलखिलाहट से उसकी चहक उठता है उनका संसार
    रखा जाने लगता है उसकी हर खुशी का ध्यान
    माना जाने लगता है लक्ष्मी का रुप उसे
    माता-पिता उसके भविष्य की सोच,
    उसकी शादी को ही अपना लक्ष्य मान
    सब संजोना शुरू कर देते हैं उसके लिए
    कहने को तो कहते हैं हमेशा यही कि बेटियाँ होती हैं पराया-धन…
    पर भूल बैठते हैं कि वो रहेगी हमेशा उनका अंग
    पाल-पोष कर अपनी मासूम-सी कली को
    सिखाते हैं.. दुनियादारी की बातें सारी
    ताकि ना रह जाए कोई कमी, उसके बनने में आदर्श नारी
    हर गुर सिखाते हैं अपनी तरफ से उसे घर-संसार चलाने के….
    करके मजबूत खुद को हो जाते हैं तैयार
    सौंपने को अपने कलेजे का टुकड़ा किसी और को
    ये मानकर कि यही है रीत, इस कठोर समाज की
    पाई-पाई कमाई हुई पूँजी को लुटाने
    दहेज पर रहते हैं राजी हमेशा
    क्योंकि उन्हें निभानी होती है समाज की ये प्रथा
    कर बैठते हैं भूल ना समझकर
    कि उनकी बेटी नहीं, उसके साथ जा रहे
    पैसे और सामान से है दहेज वालों को प्यार…
    रिश्ता नहीं करते हैं दहेज लोभी, उनके लिए ये होता है सौदा
    अपनी लाडली की खुशी के लिए ही..
    मन मसोस कर, उसका भला सोचकर
    उसे प्यार से सजाकर दुल्हन बना कर देते हैं विदा
    पर क्या लालच की नींव पर किसी ने सुख पाया है??
    क्या लालचियों को कभी कोई संतुष्ट कर पाया है??
    उनके घर जाकर उन माँ-बाप की
    लाडली ने खुद को हमेशा सबसे अकेला पाया है
    जिस सम्मान की आस में
    उसने विश्वास के साथ जीवन भर
    का था रिश्ता जोडा़..
    जिसके लिए उसके पिता ने
    नहीं छोड़ा कसर थोड़ा..
    उसी दहेज की आग ने उसके
    आत्मसम्मान को तिल-तिल जलाया है..
    पर फिर भी दुनियादारी की सोच
    रिश्तो का मान रखने के लिए
    उस बेटी ने अपना फर्ज बहु बन निभाया है
    कभी उफ ना करते हुए उनकी लाडली ने
    हमेशा हँसते हुए अपना दर्द छुपाया है
    पर क्या माता-पिता से कभी कुछ छिप पाया है?
    उन्हें भी सब खबर है, पर विदा कर दी गई बेटी
    के आँसु को कौन माँ-बाप पोंछ पाया है?
    आज ये दुनियादारी पड़ी उन पर बड़ी भारी
    काश! समझा होता असली रिश्तेदारी
    काश! उन्होने अपनी लाडली का रिश्ता
    सही जगह करवाया होता..
    थोड़ा सा सब्र रखा होता..
    किसी होनहार-समझदार लड़के से
    अपनी बेटी का रिश्ता करवाया होता..
    तो इस तरह उन्हें अपनी लाडली के
    अरमान टूटता हुआ नजर ना आया होता
    पर भी आज यहाँ दहेज के नाम पर कुप्रथा है जारी
    आज भी बेटी की खुशियों का हवाला देकर
    उनमें ग्रहण लगाना है दुनियादारी
    दहेज को यहाँ मान-सम्मान की कसौटी पर है तौला जाता
    और अपने आत्मसम्मान को इस कुरिति तले खुद ही है रौंदा जाता
    अमीर हो या गरीब हर कोई, इस आँच में है झुलस रहा
    पर आज भी हर कोई इसके आँच को बढ़ावा देने आग में है घी झोंक रहा
    नहीं है हिम्मत किसी में यहाँ कि कर पाए इसे ना
    यहाँ तो हर लड़के के माँ-बाप अपने बेटे को हैं बेच रहें
    दहेज के बाजार में बढ़-चढ़ के लगाते हैं बोली…
    करते हैं तय कीमत अपने ही परवरिश की..
    और कहलाते हैं सम्मान के अधिकारी भी
    दूसरी ओर जिन माँ-बाप ने अपनी
    बेटी संग अपने जीवन भर की पूँजी
    भी सौंप दी उन्हें वही सिर झुकाए,
    नजरें गिराए, हाथ जोड़े, शर्मिंदा देखे जाते हैं यहाँ
    समाज का हवाला देनेवाले तालियाँ बजा तमाशा देखते हैं
    नहीं आती इनमें रत्ति मात्र भी समझदारी
    कि पैसे और सामान से नहीं बनते रिश्ते
    ये होती है सौदेबाजी…
    कुर्बान होती हैं जिनमें बेटियाँ सारी
    और ये समाज कहता है ये प्रथा परंपरा है हमारी..
    बिन दहेज नहीं होगी रिश्तेदारी
    प्रथा के नाम पर कुप्रथा है लगातार जारी
    और हर कोई इसमें देते हैं अपनी-अपनी भागेदारी
    – ज्योति सिंहदेव

 

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2 comments

  1. Sangeeta pandey

    I salute that person who wrote this

  2. Parth Bhavesh Shah

    very good

  3. HindIndia

    बहुत ही उम्दा …. sundar lekh …. Thanks for sharing this nice article!! 🙂 🙂

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