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  • Sanskrit Slokas with meaning in hindi

 

  • स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा ।
    सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् ॥
    अर्थ- किसी भी व्यक्ति का मूल स्वभाव कभी नहीं बदलता है. चाहे आप उसे कितनी भी सलाह दे दो. ठीक उसी तरह जैसे पानी तभी गर्म होता है, जब उसे उबाला जाता है. लेकिन कुछ देर के बाद वह फिर ठंडा हो जाता है.
  • अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते ।
    अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः ॥
    अर्थ- बिना बुलाए स्थानों पर जाना, बिना पूछे बहुत बोलना, विश्वास नहीं करने लायक व्यक्ति/चीजों पर विश्वास करना…. ये सभी मूर्ख और बुरे लोगों के लक्षण हैं.
  • यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः ।
    चित्ते वाचि क्रियायांच साधुनामेक्रूपता ॥
    अर्थ- अच्छे लोगों के मन में जो बात होती है, वे वही वो बोलते हैं और ऐसे लोग जो बोलते हैं, वही करते हैं. सज्जन पुरुषों के मन, वचन और कर्म में एकरूपता होती है.
  • षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।

    निद्रा तद्रा भयं क्रोधः आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥

    अर्थ- छः अवगुण व्यक्ति के पतन का कारण बनते हैं : नींद, तन्द्रा, डर, गुस्सा, आलस्य और काम को टालने की आदत.

  • द्वौ अम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम् ।
    धनवन्तम् अदातारम् दरिद्रं च अतपस्विनम् ॥
    अर्थ- दो प्रकार के लोग होते हैं, जिनके गले में पत्थर बांधकर उन्हें समुद्र में फेंक देना चाहिए. पहला, वह व्यक्ति जो अमीर होते हुए दान न करता हो. दूसरा, वह व्यक्ति जो गरीब होते हुए कठिन परिश्रम नहीं करता हो.
  • त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं पुत्राश्च दाराश्च सहृज्जनाश्च ।
    तमर्थवन्तं पुनराश्रयन्ति अर्थो हि लोके मनुष्यस्य बन्धुः ॥
    अर्थ- मित्र, बच्चे, पत्नी और सभी सगे-सम्बन्धी उस व्यक्ति को छोड़ देते हैं जिस व्यक्ति के पास धन नहीं होता है. फिर वही सभी लोग उसी व्यक्ति के पास वापस आ जाते हैं, जब वह व्यक्ति धनवान हो जाता है. धन हीं इस संसार में व्यक्ति का मित्र होता है.
  • यस्तु सञ्चरते देशान् सेवते यस्तु पण्डितान् ।
    तस्य विस्तारिता बुद्धिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसि ॥
    अर्थ- वह व्यक्ति जो विभिन्न देशों में घूमता है और विद्वानों की सेवा करता है. उस व्यक्ति की बुद्धि का विस्तार उसी तरह होता है, जैसे तेल का बून्द पानी में गिरने के बाद फैल जाता है.
  • परो अपि हितवान् बन्धुः बन्धुः अपि अहितः परः ।
    अहितः देहजः व्याधिः हितम् आरण्यं औषधम् ॥
    अर्थ- कोई अपरिचित व्यक्ति भी अगर आपकी मदद करे, तो उसे परिवार के सदस्य की तरह महत्व देना चाहिए.
    और अगर परिवार का कोई अपना सदस्य भी आपको नुकसान पहुंचाए, तो उसे महत्व देना बंद कर देना चाहिए.
    ठीक उसी तरह जैसे शरीर के किसी अंग में कोई बीमारी हो जाए, तो वह हमें तकलीफ पहुँचाने लगती है.
    जबकि जंगल में उगी हुई औषधी हमारे लिए लाभकारी होती है.
  • येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।
    ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥
    अर्थ- जिन लोगों के पास न तो विद्या है, न तप, न दान, न शील, न गुण और न धर्म. वे लोग इस पृथ्वी पर भार हैं और मनुष्य के रूप में जानवर की तरह से घूमते रहते हैं.

 

  • अधमाः धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः ।
    उत्तमाः मानमिच्छन्ति मानो हि महताम् धनम् ॥
    अर्थ- निम्न कोटि के लोग केवल धन की इच्छा रखते हैं, उन्हें सम्मान से कोई मतलब नहीं होता है.
    जबकि एक मध्यम कोटि का व्यक्ति धन और मान दोनों की इच्छा रखता है. और उत्तम कोटि के लोगों
    के लिए सम्मान हीं सर्वोपरी होता है. सम्मान, धन से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है.
  • कार्यार्थी भजते लोकं यावत्कार्य न सिद्धति ।
    उत्तीर्णे च परे पारे नौकायां किं प्रयोजनम् ॥
    अर्थ- जबतक काम पूरे नहीं होते हैं, तबतक लोग दूसरों की प्रशंसा करते हैं. काम पूरा होने के बाद लोग दूसरे व्यक्ति को भूल जाते हैं. ठीक उसी तरह जैसे, नदी पार करने के बाद नाव का कोई उपयोग नहीं रह जाता है.

 

  • मूर्खा यत्र न पूज्यते धान्यं यत्र सुसंचितम् ।

    दंपत्यो कलहं नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागतः ॥

    अर्थ- जहाँ मूर्ख को सम्मान नहीं मिलता हो, जहाँ अनाज अच्छे तरीके से रखा जाता हो और जहाँ पति-पत्नी के बीच में लड़ाई नहीं होती हो. वहाँ लक्ष्मी खुद आ जाती है.

  • न चोरहार्य न राजहार्य न भ्रतृभाज्यं न च भारकारि ।
    व्यये कृते वर्धति एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् ॥
    अर्थ- न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न इसका भाइयों के बीच बंटवारा होता है, और न हीं सम्भालना कोई भार है. इसलिए खर्च करने से बढ़ने वाला विद्या रूपी धन, सभी धनों से श्रेष्ठ है.

 

  • शतेषु जायते शूरः सहस्रेषु च पण्डितः ।
    वक्ता दशसहस्रेषु दाता भवति वा न वा ॥
    अर्थ- सैकड़ों में कोई एक शूर-वीर होता है, हजारों में कोई एक विद्वान होता है, दस हजार में कोई एक वक्ता होता है और दानी लाखों में कोई विरला हीं होता है.
  • विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन ।
    स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ॥
    अर्थ- विद्वान और राजा की कोई तुलना नहीं हो सकती है. क्योंकि राजा तो केवल अपने राज्य में सम्मान पाता है, जबकि विद्वान जहाँ-जहाँ भी जाता है….. वह हर जगह सम्मान पाता है.
  • भोजन मंत्र हिंदी अर्थ सहित – Bhojan Mantra in Sanskrit With Meaning in Hindi

 

अगर आप कविता, शायरी, Article इत्यादि लिखने में सक्षम हैं, तो हमें अपनी रचनाएँ 25suvicharhindi@gmail.com पर भेजें. आपकी रचनाएँ मौलिक और अप्रकाशित होनी चाहिए.

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10 comments

  1. Nakshatra

    Good slokas

  2. Kartick

    Very good for the students who like sanskrit.

  3. Anonymous

    I am just said about shlok…

  4. Anonymous

    nice and teachful slokas

  5. Swastika

    These were very good shrikes but can you provide me with some Sanskrit shlokes related to prioritize sondarya. Please I will be pleased………

  6. Anonymous

    Nice

  7. Anonymous

    It’s really a good article in Sanskrit … Thank you.

  8. arnab

    Some more shlokas needed

  9. Mahesh Tiwari

    This artical very good

  10. Abhi

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