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विद्या पर संस्कृत में श्लोक – Sanskrit Slokas On Vidya With Meaning in Hindi

Sanskrit Slokas On Vidya With Meaning in Hindi – विद्या पर संस्कृत में श्लोक

 

  • क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ।
    क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ॥
    अर्थ: एक-एक क्षण गँवाए बिना विद्या पानी चाहिए; और एक-एक कण बचाकर धन इकट्ठा करना चाहिए. क्षण गँवाने वाले को विद्या प्राप्त नहीं होती, और कण नष्ट करने वाले को धन नहीं मिलता.

 

  • विद्या नाम नरस्य कीर्तिरतुला भाग्यक्षये चाश्रयो
    धेनुः कामदुधा रतिश्च विरहे नेत्रं तृतीयं च सा ।
    सत्कारायतनं कुलस्य महिमा रत्नैर्विना भूषणम्
    तस्मादन्यमुपेक्ष्य सर्वविषयं विद्याधिकारं कुरु ॥
    अर्थ- विद्या अनुपम कीर्ति है; भाग्य का नाश होने पर वह आश्रय देती है, कामधेनु है, विरह में रति समान है, तीसरा नेत्र है, सत्कार का मंदिर है, कुल-महिमा है, बगैर रत्न का आभूषण है; इसलिए अन्य सब विषयों को छोडकर विद्या का अधिकारी बन.
  • श्रियः प्रदुग्धे विपदो रुणद्धि यशांसि सूते मलिनं प्रमार्ष्टि ।
    संस्कारशौचेन परं पुनीते शुद्धा हि वुद्धिः किल कामधेनुः ॥
    अर्थ: विद्या सचमुच कामधेनु है, क्योंकि वह संपत्ति को दोहती है, विपत्ति को रोकती है, यश दिलाती है, मलिनता धो देती है, और संस्काररुप पावित्र्य द्वारा अन्य को पावन करती है.
  • हर्तृ र्न गोचरं याति दत्ता भवति विस्तृता ।
    कल्पान्तेऽपि न या नश्येत् किमन्यद्विद्यया विना ॥
    अर्थ: जो चोरों के नजर नहीं आती, देने से जिसका विस्तार होता है, प्रलय काल में भी जिसका विनाश नहीं होता, वह विद्या के अलावा कौन सा धन हो सकता है ?
  • ज्ञातिभि र्वण्टयते नैव चोरेणापि न नीयते ।
    दाने नैव क्षयं याति विद्यारत्नं महाधनम् ॥
    अर्थ: विद्यारुपी रत्न महान धन है, जिसका बंटवारा नहीं हो सकता, जिसे चोर चोरी नहीं कर सकते, और दान करने से जिसमें कमी नहीं आती.
  • विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् ।
    पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥
    अर्थ- विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता आती है, पात्रता से धन आता है, धन से धर्म होता है, और धर्म से सुख प्राप्त होता है.
  • कुत्र विधेयो यत्नः विद्याभ्यासे सदौषधे दाने ।
    अवधीरणा क्व कार्या खलपरयोषित्परधनेषु ॥
    अर्थ- यत्न कहाँ करना ? विद्याभ्यास, सदौषध और परोपकार में. अनादर कहाँ करना ? दुर्जन, परायी स्त्री और परधन में.
  • विद्याविनयोपेतो हरति न चेतांसि कस्य मनुजस्य ।
    कांचनमणिसंयोगो नो जनयति कस्य लोचनानन्दम् ॥
    अर्थ- विद्यावान और विनयी पुरुष किस मनुष्य का चित्त हरण नहीं करता ? सुवर्ण और मणि का संयोग किसकी आँखों को सुख नहीं देता ?
  • विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम् ।
    कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम् ॥
    अर्थ- कुरुप का रुप विद्या है, तपस्वी का रुप क्षमा, कोयल का रुप स्वर, और स्त्री का रुप पातिव्रत्य है.
  • रूपयौवनसंपन्ना विशाल कुलसम्भवाः ।
    विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥
    अर्थ- कोई व्यक्ति यदि रुपवान है, जवान है, ऊँचे कुल में पैदा हुआ है, लेकिन यदि वह विद्याहीन है, तो वह सुगंधरहित केसुडे के फूल की तरह शोभा नहीं देता है.
  • माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः ।
    न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥
    अर्थ: जो माता-पिता अपने बालक को नहीं पढ़ाते हैं, वह माता शत्रु के समान है और पिता बैरी है; हँसों के बीच बगुले की तरह, ऐसा मनुष्य विद्वानों की सभा में शोभा नहीं देता.

 

  • अजरामरवत् प्राज्ञः विद्यामर्थं च साधयेत् ।
    गृहीत एव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥
    अर्थ- बुढापा और मृत्यु नहीं आनेवाले है, ऐसा समझकर मनुष्य को विद्या और धन प्राप्त करना चाहिए; पर मृत्यु ने हमारे बाल पकड़े हैं, यह समझकर धर्माचरण करना चाहिए.
  • विद्या शस्त्रं च शास्त्रं च द्वे विद्ये प्रतिपत्तये ।
    आद्या हास्याय वृद्धत्वे द्वितीयाद्रियते सदा ॥
    अर्थ: शस्त्रविद्या और शास्त्रविद्या – ये दो प्राप्त करने योग्य विद्या हैं. इनमें से पहली वृद्धावस्था में हास्यास्पद बनाती है, और दूसरी सदा आदर दिलाती है.
  • सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम् ।
    अहार्यत्वादनर्ध्यत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा ॥
    अर्थ: सब धनों में विद्यारुपी धन सर्वोत्तम है, क्योंकि इसे न तो छीना जा सकता है और न यह चोरी की जा सकती है. इसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती है और उसका न इसका कभी नाश होता है.
  • विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्
    विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः ।
    विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवतम्
    विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः ॥
    अर्थ: विद्या इन्सान का विशिष्ट रुप है, विद्या गुप्त धन है. वह भोग देनेवाली, यशदेने वाली, और सुखकारी है. विद्या गुरुओं की गुरु है, विदेश में विद्या बंधु है. विद्या बड़ी देवता है; राजाओं में विद्या की पूजा होती है, धन की नहीं. विद्याविहीन व्यक्ति पशु हीं है.

 

  • मातेव रक्षति पितेव हिते नियुंक्ते
    कान्तेव चापि रमयत्यपनीय खेदम् ।
    लक्ष्मीं तनोति वितनोति च दिक्षु कीर्तिम्
    किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या ॥
    अर्थ: विद्या माता की तरह रक्षा करती है, पिता की तरह हित करती है, पत्नी की तरह थकान दूर करके मन को रिझाती है, शोभा प्राप्त कराती है, और चारों दिशाओं में कीर्ति फैलाती है. सचमुच, कल्पवृक्ष की तरह यह विद्या क्या-क्या नहीं करती है.
  • सद्विद्या यदि का चिन्ता वराकोदर पूरणे ।
    शुकोऽप्यशनमाप्नोति रामरामेति च ब्रुवन् ॥
    अर्थ: सद्विद्या हो तो पेट भरने की चिंता करने का कारण नहीं. तोता भी “राम राम” बोलने से खुराक पा हीं लेता है.
  • न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी ।
    व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्याधनं सर्वधन प्रधानम् ॥
    अर्थ: विद्यारुपी धन को कोई चुरा नहीं सकता, राजा ले नहीं सकता, भाईयों के बीच उसका बंटवारा नहीं होता, न उसका कोई वजन होता है और यह विद्यारुपी धन खर्च करने से बढ़ता है. सचमुच, विद्यारुपी धन सर्वश्रेष्ठ है.
  • अपूर्वः कोऽपि कोशोड्यं विद्यते तव भारति ।
    व्ययतो वृद्धि मायाति क्षयमायाति सञ्चयात् ॥
    अर्थ: हे सरस्वती ! तेरा खज़ाना सचमुच अद्भुत है; जो खर्च करने से बढ़ता है, और जमा करने से कम होता है.
  • नास्ति विद्यासमो बन्धुर्नास्ति विद्यासमः सुहृत् ।
    नास्ति विद्यासमं वित्तं नास्ति विद्यासमं सुखम् ॥
    अर्थ: विद्या जैसा बंधु नहीं है, विद्या जैसा कोई मित्र नहीं है, (और) विद्या के जैसा कोई धन नहीं है और विद्या के जैसा कोई सुख नहीं है.

 

  • अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम् ।
    सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः ॥
    अर्थ: अनेक संशयों को दूर करनेवाला, परोक्ष वस्तु को दिखानेवाला, और सबका नेत्ररुप शास्त्र जिसने पढ़ा नहीं, वह व्यक्ति (आँख होने के बावजुद) अंधा है.
  • सुखार्थिनः कुतोविद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम् ।
    सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् ॥
    अर्थ: सुख चाहने वाले को विद्या प्राप्त नहीं हो सकती, और विद्यार्थी को सुख नहीं मिल सकता. सुख चाहने वाले को विद्या पाने की आशा छोड़ देनी चाहिए, और विद्या चाहने वाले को सुख छोड़ देना चाहिए.
  • ज्ञानवानेन सुखवान् ज्ञानवानेव जीवति ।
    ज्ञानवानेव बलवान् तस्मात् ज्ञानमयो भव ॥
    अर्थ: ज्ञानी व्यक्ति हीं सुखी है, और ज्ञानी हीं सही अर्थों में जीता है. जो ज्ञानी है वही बलवान है, इसलिए तू ज्ञानी बन.
  • विद्या राज्यं तपश्च एते चाष्टमदाः स्मृताः ॥
    अर्थ: कुल, छल, धन, रुप, यौवन, विद्या, अधिकार, और तपस्या – ये आठ मद हैं.

 

  • सालस्यो गर्वितो निद्रः परहस्तेन लेखकः ।
    अल्पविद्यो विवादी च षडेते आत्मघातकाः ॥
    अर्थ: आलसी होना, झूठा घमंड होना, बहुत ज्यादा सोना, पराये के पास लिखाना, अल्प विद्या, और वाद-विवाद ये छः आत्मघाती हैं.
  • स्वच्छन्दत्वं धनार्थित्वं प्रेमभावोऽथ भोगिता ।
    अविनीतत्वमालस्यं विद्याविघ्नकराणि षट् ॥
    अर्थ: स्वंच्छंदता, पैसे का मोह, प्रेमवश होना, भोगाधीन होना, उद्धत होना – ये छः विद्या पाने में बाधा उत्पन्न करते हैं.
  • गीती शीघ्री शिरः कम्पी तथा लिखित पाठकः ।
    अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः ॥
    अर्थ: गाकर पढ़ना, जल्दी-जल्दी पढ़ना, पढ़ते हुए सिर हिलाना, लिखा हुआ पढ़ जाना, अर्थ जाने बिना पढ़ना, और धीमा आवाज होना ये छः पाठक के दोष हैं.
  • माधुर्यं अक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः ।
    धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठके गुणाः ॥
    अर्थ: मधुरता, स्पष्ट उच्चारण, पदच्छेद, मधुर स्वर, धैर्य, और तन्मयता – ये पढ़ने वाले व्यक्ति के छः गुण हैं.

 

  • विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिः तत्परता क्रिया ।
    यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते ॥
    अर्थ: विद्या, तर्कशक्ति, विज्ञान, स्मृतिशक्ति, तत्परता, और कार्यशीलता, ये छः जिसके पास हैं, उसके लिए कुछ भी असाध्य नहीं है.
  • द्यूतं पुस्तकवाद्ये च नाटकेषु च सक्तिता ।
    स्त्रियस्तन्द्रा च निन्द्रा च विद्याविघ्नकराणि षट् ॥
    अर्थ: जुआ, वाद्य, नाट्य (फिल्म) में आसक्ति, स्त्री (या पुरुष), तंद्रा, और निंद्रा – ये छः विद्या पाने में विघ्न होते हैं.
  • आयुः कर्म च विद्या च वित्तं निधनमेव च ।
    पञ्चैतानि विलिख्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ॥
    अर्थ: आयु, कर्म, विद्या, वित्त, और मृत्यु, ये पाँच चीजें व्यक्ति के गर्भ में हीं निश्चित हो जाती है.
  • आरोग्य बुद्धि विनयोद्यम शास्त्ररागाः ।
    आभ्यन्तराः पठन सिद्धिकराः भवन्ति ॥
    अर्थ: आरोग्य, बुद्धि, विनय, उद्यम, और शास्त्र के प्रति अत्यधिक प्रेम – ये पाँच पढ़ने के लिए जरूरी आंतरिक गुण हैं.

 

  • आचार्य पुस्तक निवास सहाय वासो ।
    बाह्या इमे पठन पञ्चगुणा नराणाम् ॥
    अर्थ: आचार्य, पुस्तक, निवास, मित्र, और वस्त्र – ये पाँच पढ़ने के लिए आवश्यक बहरी गुण हैं.
  • दानानां च समस्तानां चत्वार्येतानि भूतले ।
    श्रेष्ठानि कन्यागोभूमिविद्या दानानि सर्वदा ॥
    अर्थ: सब दानों में कन्यादान, गोदान, भूमिदान, और विद्यादान सर्वश्रेष्ठ है.
  • तैलाद्रक्षेत् जलाद्रक्षेत् रक्षेत् शिथिल बंधनात् ।
    मूर्खहस्ते न दातव्यमेवं वदति पुस्तकम् ॥
    अर्थ: पुस्तक कहता है कि, तेल से मेरी रक्षा करो, जल से मेरी रक्षा करो, मेरा बंधन शिथिल न होने दो, और मूर्ख के हाथ में मुझे मत दो.

 

  • दानं प्रियवाक्सहितं ज्ञानमगर्वं क्षमान्वितं शौर्यम् ।
    वित्तं दानसमेतं दुर्लभमेतत् चतुष्टयम् ॥
    अर्थ: प्रिय वचन के साथ दिया हुआ दान, गर्वरहित ज्ञान, क्षमायुक्त शौर्य, और दान की इच्छावाला धन – ये चारों दुर्लभ हैं.
  • अव्याकरणमधीतं भिन्नद्रोण्या तरंगिणी तरणम् ।
    भेषजमपथ्यसहितं त्रयमिदमकृतं वरं न कृतम् ॥
    अर्थ: व्याकरण छोड़कर किया हुआ अध्ययन, टूटी हुई नव से नदी पार करना, और नहीं खाने लायक भोजन के साथ दवाई खाना – ये सब चीजें करने से बेहतर है इन्हें न करना.
  • गुरुशुश्रूषया विद्या पुष्कलेन धनेन वा ।
    अथवा विद्यया विद्या चतुर्थी नोपलभ्यते ॥
    अर्थ: गुरु की सेवा करके, अधिक धन देकर, या विद्या के बदले में  विद्या, इन तीन तरीकों से हीं विद्या पायी जा सकती है; विद्या पाने का कोई चौथा उपाय नहीं होता है.

 

  • विद्याभ्यास स्तपो ज्ञानमिन्द्रियाणां च संयमः ।
    अहिंसा गुरुसेवा च निःश्रेयसकरं परम् ॥
    अर्थ: विद्या का अभ्यास, तप, ज्ञान, इंद्रिय-संयम, अहिंसा और गुरुसेवा – ये सब बहुत कल्याण करने वाले हैं.
  • पठतो नास्ति मूर्खत्वं अपनो नास्ति पातकम् ।
    मौनिनः कलहो नास्ति न भयं चास्ति जाग्रतः ॥
    अर्थ: पढ़ने वाले व्यक्ति को मूर्खता नहीं आती, जप करने वाले को पाप नहीं लगता है, मौन रहने वाले का झगड़ा नहीं होता है और जागते रहने वाले को डर नहीं होता है.
  • अर्थातुराणां न सुखं न निद्रा कामातुराणां न भयं न लज्जा ।
    विद्यातुराणां न सुखं न निद्रा क्षुधातुराणां न रुचि न बेला ॥
    अर्थ: धन कमाने को आतुर व्यक्ति को सुख और नींद नहीं मिलते, जो व्यक्ति कामातुर होता है… उसे न डर होता है और न किसी से शर्म. विद्या के लिए आतुर व्यक्ति को सुख और नींद कहाँ, और भूखे व्यक्ति को रुचि या समय का ध्यान नहीं रहता है.

 

  • अनालस्यं ब्रह्मचर्यं शीलं गुरुजनादरः ।
    स्वावलम्बः दृढाभ्यासः षडेते छात्र सद्गुणाः ॥
    अर्थ: आलसी नहीं होना, ब्रह्मचर्य का पालन करना, शीलवान होना, गुरुजनों का आदर करना, आत्मनिर्भर होना, और कठिन अभ्यास करना – ये छः छात्र के सद्गुण हैं.
  • अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम् ।
    अधनस्य कुतो मित्रममित्रस्य कुतः सुखम् ॥
    अर्थ: आलसी व्यक्ति को विद्या नहीं मिल सकती है, और विद्या हीन व्यक्ति धन नहीं कमा सकता है, धनविहीन व्यक्ति  का  कोई मित्र नहीं होता है और मित्रविहीन व्यक्ति को सुख कहाँ ?
  • पुस्तकस्या तु या विद्या परहस्तगतं धनं ।
    कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम् ॥
    अर्थ: जो विद्या पुस्तक में है और जो धन किसी को दिया हुआ है.  जरूरत पड़ने पर न तो वह विद्या काम आती है और न वह धन.

 

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