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मजदूरी, एक लघु कहानी – A Short Story in Hindi Language

A Short Story in Hindi Language – A Short Story in Hindi Language – A Short Story in Hindi Language – एक लघु कहानी A Short Story in Hindi Language - एक लघु कहानी

 

  • मजदूरी, एक लघु कहानी

 

  • मुखिया जी ने भोला से गाय लेकर अपने साथ चलने को कहा. कुल दूरी 24 km की थी. पड़ाव 10 km पर था, उसी पड़ाव पर रुक कर गाय और भोला को थोड़ी देर आराम करना था. भोला तो चाहता था कि पहले गाय को 8 km पर थोड़ी देर आराम करने और कुछ खाना-पानी दिया जाये. और फिर 16 km की दूरी तय करने के बाद गाय को कुछ देर आराम करने दिया जाए. क्योंकि वह जानता था कि गाय 24 km की दूरी दो पड़ावों के बिना तय नहीं कर सकती है.
    भोला ने दो पड़ावों के लिए मुखिया जी से अनुरोध किया, लेकिन मुखिया जी को न तो भोला की फ़िक्र थी और न गाय क्या. उन्होंने पड़ाव की अनुमति नहीं दी. जिसका नतीजा हुआ कि गाय ने रास्ते में हीं थकान के कारण दम तोड़ दिया. मुखिया जी ने गाय के मरने के लिए भोला को दोषी ठहरा दिया. पंचायत बुलाकर भोला पर 20,000 रुपए का जुर्माना लगाया गया.
    भोला के पास तो फूटी कौड़ी तक नहीं थी, वो इतनी बड़ी रकम कैसे चुकाता. इसलिए तय हुआ कि भोला के मकान पर अब मुखिया का अधिकार हो जाएगा और भोला और उसकी पत्नी मुखिया के लिए 1 साल तक मुफ्त में काम करेंगे. और वे अपने भोजन की व्यवस्था भी खुद करेंगे.
    गाय को उसके गन्तव्य तक पहुँचाने की ऐसी मजदूरी उसे मिलेगी, इस बात की कल्पना तो भोला ने कभी नहीं की थी.
    A Story by – Dr. Narayan Mishra
  • mukhiya jee ne bhola se gaay lekar apane saath chalane ko kaha. kul dooree 24 km kee thee. padaav 10 km par tha, usee padaav par ruk kar gaay aur bhola ko thodee der aaraam karana tha. bhola to chaahata tha ki pahale gaay ko 8 km par thodee der aaraam karane aur kuchh khaana-paanee diya jaaye. aur phir 16 km kee dooree tay karane ke baad gaay ko kuchh der aaraam karane diya jae. kyonki vah jaanata tha ki gaay 24 km kee dooree do padaavon ke bina tay nahin kar sakatee hai.
    bhola ne do padaavon ke lie mukhiya jee se anurodh kiya, lekin mukhiya jee ko na to bhola kee fikr thee aur na gaay kya. unhonne padaav kee anumati nahin dee. jisaka nateeja hua ki gaay ne raaste mein heen thakaan ke kaaran dam tod diya. mukhiya jee ne gaay ke marane ke lie bhola ko doshee thahara diya. panchaayat bulaakar bhola par 20,000 rupe ka jurmaana lagaaya gaya.
    bhola ke paas to phootee kaudee tak nahin thee, vo itanee badee rakam kaise chukaata. isalie tay hua ki bhola ke makaan par ab mukhiya ka adhikaar ho jaega aur bhola aur usakee patnee mukhiya ke lie 1 saal tak mupht mein kaam karenge. aur ve apane bhojan kee vyavastha bhee khud karenge.
    gaay ko usake gantavy tak pahunchaane kee aisee majadooree use milegee, is baat kee kalpana to bhola

 

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One comment

  1. sukhmangal singh

    कहानी अच्छी !-
    “सर्वांगीण विकास और उत्पत्ति में महिलाओं की भूमिका”
    महिला समाज की वह जीवन देनी रेखा है जिससे समाज का सर्वांगीण विकास और उत्पत्ति में महत्व पूर्ण भूमिका निभाती हैं | समाज का दिशानिर्देशन करती हैं और उसे पल्लवित पुष्पवित करती हैं | समाज के आर्थिक विकास में भागीदार होकर जिम्मेदारी के साथ उसे निभाती है | वह अपने समय की जो आध्यात्मिक और धार्मिक प्रवृत्तिया राजकीय और राष्ट्रीय भावों को जन्म देती हैं |बिना उन्हें अच्छी तरह समझे कोई किसी राजनीतिक सुधार अथवा रूपांतर का स्वरुप ठीक तरह से नहीं जान समझ सकता अतएव सभी बैटन को ठीक ठीक रूप में जान लेना आवश्यक है |महिलाओं के ज्ञान मान सम्मान के लिए सामाजिक चेतना और पुनर्जागरण में नवचेतना का समावेश पुस्तकालय के माध्यम से भी हो सकता है | कारण यह है कि नारियां संगठन के लिए घर -घर न जा सकती हैं और घर-घर जाकर शंख बजा सकें ,यदि वह जाती हैं तो जिन घरों में जायेंगी वहा उन्हें स्वागत सहयोग मिलेगा मिल सकता है यह कहना कठिन सा प्रतीत होने वाला दिखता है | वह कष्ट में कात्यायनी देवी सदृश्य जिनका दिन नो रात्री में नौरात्रि के छठे दिन आता है कापूजन अर्चन से मानव का कष्ट काटती है परन्तु नारी अपने सच्चे सेवा भाव से प्रतिदिन अपने परिवार और समाज को कष्ट से उबारती है |
    महिलायें प्रायः संतुलन को साधकर चलती हैं | कुछ एक अपवाद को छोडकर क़ानून का निर्माण उसका पालन संविधान का सम्मान मौलिक अधिकार के प्रति सचेत खेलकूद में अपनी भागीदारियां शासन -प्रशासन में हिस्सेदारी में बराबरी की भूमिका में अपने को स्थापित करने कराने में अग्रणी भूमिका में वर्तमान में दिखती है |
    महिलाओं को काव्यरस से फ़िल्म जगत तक अब मात्र प्रेम कहानी आदि की पटकथा से निकलकर सामाजिक सरोकार को दर्शन तक ले जाने और समृद्ध हिन्दी फिल्मों में लेखन प्रदर्शन करने हेतु माध्यम बनकर मंच मुहैया कराने का कार्य महिलायें करने कराने के लिए आगे आने का संकल्प बखूवी निभा सकती हैं जिसे निभाना चाहिए |
    प्राचीन काल से चाहे राजतंत्र -प्रजातंत्र अथवा लोकतंत्र रहा है ग्रामीण जीवन में सुख -सुविधा और सर्वा ० विकास पर बल दिया जाता रहा है |किसी भी देश व्यक्ति अथवा समाज काविकास में महिलाओं की भूमिका अहम रही है | समाज में आने हेतु प्रतेक व्यक्ति को उत्पत्ति से गुजरना होता है और वह उत्पत्ति महिलाओं के बिना मात्र पुरुष से संभव नहीं है |
    महिला पुनरुत्थान जैसी कुल आवादी की आधी जनसंख्या को उठाकर प्रगति के उच्च शिखर पर पहुंचाने का कार्य पुरुष कब तक करता रहेगा यद्यपि इस कार्य में पुरुषों के सहयोग से ही हो सकता है | कारण स्पस्ट है कि संघ , संघशक्ति का सृजन और उसे ठीक ढंग से संचालित करने का कार्य पुरुष के ही हाथ वर्तमान में है | यदि ऐसा न होता नारी सही रूप में संचालित कर लेतीं तोआज भी समाज में जो कुरीतिया व्याप्त हैं कभी की मिट चुकी होतीं |
    महिला संघ को बड़े पैमाने पर स्थापित करने के लिए आवश्यक तो है परन्तु यह कार्य बड़ा है कठिन है इसलिए इसे संघठित करने के लिए सही स्वरुप देने के लिए एक सुसंगठित प्रयास किये जाने की आवश्यकता है |
    संगठित प्रयास के लिए राम ने लंका पर विजय के लिए रीछ -वानरों की सेना संगठित की थी | महात्मा गांधी ने लोक शक्ति को संगठित किया था | श्री कृष्ण ने गोवर्धन को उठाने हेतु ग्वालों को संगठित किया |
    कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि घरों से बाहर आकर नारीओं को नव -जागरण की भूमिका निभाने के लिए महिलाओं को भी योगदान करने में अपनी अहम भूमिका नि भाने के लिए प्रोत्साहित करें प्रशिक्षण देकर प्रशिक्षित करें |

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