सूरदास के 11 पद अर्थ सहित – Surdas Ke Pad in Hindi With Meaning – दोहे Dohe

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  • चरन कमल बंदौ हरि राई ।
    जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै आंधर कों सब कछु दरसाई॥
    बहिरो सुनै मूक पुनि बोलै रंक चले सिर छत्र धराई ।
    सूरदास स्वामी करुनामय बार-बार बंदौं तेहि पाई ॥१॥
  • अर्थ- श्रीकृष्ण की कृपा होने पर लंगड़ा व्यक्ति भी पर्वत को लाँघ लेता है, अन्धे को सबकुछ दिखाई देने लगता है, बहरा व्यक्ति सुनने लगता है, गूंगा बोलने लगता है, और गरीब व्यक्ति भी अमीर हो जाता है. ऐसे दयालु श्रीकृष्ण की चरण वन्दना कौन नहीं करेगा.

 

  • अबिगत गति कछु कहति न आवै।
    ज्यों गूंगो मीठे फल की रस अन्तर्गत ही भावै॥
    परम स्वादु सबहीं जु निरन्तर अमित तोष उपजावै।
    मन बानी कों अगम अगोचर सो जाने जो पावै॥
    रूप रैख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धावै।
    सब बिधि अगम बिचारहिं तातों सूर सगुन लीला पद गावै॥२॥
  • अर्थ- यहाँ अव्यक्त उपासना को मनुष्य के लिए क्लिष्ट बताया है. निराकार ब्रह्म का चिंतन अनिर्वचनीय है. वह मन और वाणी का विषय नहीं है. ठीक उसी प्रकार जैसे किसी गूंगे को मिठाई खिला दी जाय और उससे उसका स्वाद पूछा जाए, तो वह मिठाई का स्वाद नहीं बता सकता है. उस मिठाई के रस का आनंद तो उसका अंतर्मन हीं जानता है. निराकार ब्रह्म का न रूप है, न गुण. इसलिए मन वहाँ स्थिर नहीं हो सकता है, सभी तरह से वह अगम्य है. इसलिए सूरदास सगुण ब्रह्म अर्थात श्रीकृष्ण की लीला का ही गायन करना उचित समझते हैं.
  • अब कै माधव मोहिं उधारि।
    मगन हौं भाव अम्बुनिधि में कृपासिन्धु मुरारि॥
    नीर अति गंभीर माया लोभ लहरि तरंग।
    लियें जात अगाध जल में गहे ग्राह अनंग॥
    मीन इन्द्रिय अतिहि काटति मोट अघ सिर भार।
    पग न इत उत धरन पावत उरझि मोह सिबार॥
    काम क्रोध समेत तृष्ना पवन अति झकझोर।
    नाहिं चितवत देत तियसुत नाम-नौका ओर॥
    थक्यौ बीच बेहाल बिह्वल सुनहु करुनामूल।
    स्याम भुज गहि काढ़ि डारहु सूर ब्रज के कूल॥५॥
  • अर्थ – संसार रूपी सागर में माया रूपी जल भरा हुआ है, लालच की लहरें हैं, काम वासना रूपी मगरमच्छ है, इन्द्रियाँ मछलियाँ हैं और इस जीवन के सिर पर पापों की गठरी रखी हुई है. इस समुद्र में मोह सवार है. काम-क्रोध आदि की वायु झकझोर रही है. तब एक हरि नाम की नाव हीं पार लगा सकती है. स्त्री और बेटों का माया-मोह इधर-उधर देखने हीं नहीं देता. भगवान हीं हाथ पकड़कर हमारा बेड़ा पार कर सकते हैं.
  • मोहिं प्रभु तुमसों होड़ परी।
    ना जानौं करिहौ जु कहा तुम नागर नवल हरी॥
    पतित समूहनि उद्धरिबै कों तुम अब जक पकरी।
    मैं तो राजिवनैननि दुरि गयो पाप पहार दरी॥
    एक अधार साधु संगति कौ रचि पचि के संचरी।
    भ न सोचि सोचि जिय राखी अपनी धरनि धरी॥
    मेरी मुकति बिचारत हौ प्रभु पूंछत पहर घरी।
    स्रम तैं तुम्हें पसीना ऐहैं कत यह जकनि करी॥
    सूरदास बिनती कहा बिनवै दोषहिं देह भरी।
    अपनो बिरद संभारहुगै तब यामें सब निनुरी॥६॥
  • अर्थ- हे प्रभु, मैंने तुमसे एक होड़ लगा ली है. तुम्हारा नाम पापियों का उद्धार करने वाला है, लेकिन मुझे इस पर विश्वास नहीं है. आज मैं यह देखने आया हूँ कि तुम कहाँ तक पापियों का उद्धार करते हो. तुमने उद्धार करने का हठ पकड़ रखा है तो मैंने पाप करने का सत्याग्रह कर रखा है. इस बाजी में देखना है कौन जीतता है. मैं तुम्हारे कमलदल जैसे नेत्रों से बचकर, पाप-पहाड़ की गुफा में छिपकर बैठ गया हूं.
  • मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ।
    मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति कब जायौ?
    कहा करौं इहि के मारें खेलन हौं नहि जात।
    पुनि-पुनि कहत कौन है माता, को है तेरौ तात?
    गोरे नन्द जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात।
    चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत हँसत-सबै मुसकात।
    तू मोहीं को मारन सीखी दाउहिं कबहुँ न खीझै।
    मोहन मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि-सुनि रीझै।
    सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई, जनमत ही कौ धूत।
    सूर स्याम मौहिं गोधन की सौं, हौं माता तो पूत॥
  • अर्थ – बालक श्रीकृष्ण मैया यशोदा से कहते हैं, कि बलराम भैया मुझे बहुत चिढ़ाते हैं. वे कहते हैं कि तुमने मुझे दाम देकर खरीदा है, तुमने मुझे जन्म नहीं दिया है. इसलिए मैं उनके साथ खेलने नहीं जाता हूँ, वे बार-बार मुझसे पूछते हैं कि तुम्हारे माता-पिता कौन हैं. नन्द बाबा और मैया यशोदा दोनों गोरे हैं, तो तुम काले कैसे हो गए. ऐसा बोल-बोल कर वे नाचते हैं, और उनके साथ सभी ग्वाल-बाल भी हँसते हैं. तुम केवल मुझे हीं मारती हो, दाऊ को कभी नहीं मारती हो. तुम शपथ पूर्वक बताओ कि मैं तेरा हीं पुत्र हूँ. कृष्ण कि ये बातें सुनकर यशोदा मोहित हो जाती है.

 

  • मुख दधि लेप किए सोभित कर नवनीत लिए।
    घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित मुख दधि लेप किए॥
    चारु कपोल लोल लोचन गोरोचन तिलक दिए।
    लट लटकनि मनु मत्त मधुप गन मादक मधुहिं पिए॥
    कठुला कंठ वज्र केहरि नख राजत रुचिर हिए।
    धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख का सत कल्प जिए॥
  • अर्थ- भगवान श्रीकृष्ण अभी बहुत छोटे हैं और यशोदा के आंगन में घुटनों के बल चलते हैं. उनके छोटे से हाथ में ताजा मक्खन है और वे उस मक्खन को लेकर घुटनों के बल चल रहे हैं. उनके शरीर पर मिट्टी लगी हुई है. मुँह पर दही लिपटा है, उनके गाल सुंदर हैं और आँखें चपल हैं. ललाट पर गोरोचन का तिलक लगा हुआ है. बालकृष्ण के बाल घुंघराले हैं. जब वे घुटनों के बल माखन लिए हुए चलते हैं तब घुंघराले बालों की लटें उनके कपोल पर झूमने लगती है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो भौंरा मधुर रस पीकर मतवाले हो गए हैं. उनका सौंदर्य उनके गले में पड़े कंठहार और सिंह नख से और बढ़ जाती है. सूरदास जी कहते हैं कि श्रीकृष्ण के इस बालरूप का दर्शन यदि एक पल के लिए भी हो जाता तो जीवन सार्थक हो जाए. अन्यथा सौ कल्पों तक भी यदि जीवन हो तो निरर्थक हीं है.

 

  • बूझत स्याम कौन तू गोरी।
    कहां रहति काकी है बेटी देखी नहीं कहूं ब्रज खोरी॥
    काहे कों हम ब्रजतन आवतिं खेलति रहहिं आपनी पौरी।
    सुनत रहति स्त्रवननि नंद ढोटा करत फिरत माखन दधि चोरी॥
    तुम्हरो कहा चोरि हम लैहैं खेलन चलौ संग मिलि जोरी।
    सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि बातनि भुरइ राधिका भोरी॥
  • अर्थ- श्रीकृष्ण जब पहली बार राधा से मिले, तो उन्होंने राधा से पूछा कि हे गोरी! तुम कौन हो? कहाँ रहती हो? किसकी पुत्री हो? मैंने तुम्हें पहले कभी ब्रज की गलियों में नहीं देखा है. तुम हमारे इस ब्रज में क्यों चली आई? अपने ही घर के आंगन में खेलती रहती. इतना सुनकर राधा बोली, मैं सुना करती थी कि नंदजी का लड़का माखन चोरी करता फिरता है. तब कृष्ण बात बदलते हुए बोले, लेकिन तुम्हारा हम क्या चुरा लेंगे. अच्छा चलो, हम दोनों मिलजुलकर खेलते हैं. सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार कृष्ण ने बातों ही बातों में भोली-भाली राधा को भरमा दिया.

 

  • मुखहिं बजावत बेनु धनि यह बृंदावन की रेनु।
    नंदकिसोर चरावत गैयां मुखहिं बजावत बेनु॥
    मनमोहन को ध्यान धरै जिय अति सुख पावत चैन।
    चलत कहां मन बस पुरातन जहां कछु लेन न देनु॥
    इहां रहहु जहं जूठन पावहु ब्रज बासिनि के ऐनु।
    सूरदास ह्यां की सरवरि नहिं कल्पबृच्छ सुरधेनु॥
  • अर्थ- यह ब्रज की मिट्टी धन्य है जहाँ श्रीकृष्ण गायों को चराते हैं तथा अधरों पर रखकर बांसुरी बजाते हैं. उस भूमि पर कृष्ण का ध्यान करने से मन को बहुत शांति मिलती है. सूरदास मन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि अरे मन! तुम क्यों इधर-उधर भटकते हो. ब्रज में हीं रहो, यहाँ न किसी से कुछ लेना है, और न किसी को कुछ देना है. ब्रज में रहते हुए ब्रजवासियों के जूठे बरतनों से जो कुछ मिले उसी को ग्रहण करने से ब्रह्मत्व की प्राप्ति होती है. सूरदास कहते हैं कि ब्रजभूमि की समानता कामधेनु गाय भी नहीं कर सकती है.

 

  • चोरि माखन खात चली ब्रज घर घरनि यह बात।
    नंद सुत संग सखा लीन्हें चोरि माखन खात॥
    कोउ कहति मेरे भवन भीतर अबहिं पैठे धाइ।
    कोउ कहति मोहिं देखि द्वारें उतहिं गए पराइ॥
    कोउ कहति किहि भांति हरि कों देखौं अपने धाम।
    हेरि माखन देउं आछो खाइ जितनो स्याम॥
    कोउ कहति मैं देखि पाऊं भरि धरौं अंकवारि।
    कोउ कहति मैं बांधि राखों को सकैं निरवारि॥
    सूर प्रभु के मिलन कारन करति बुद्धि विचार।
    जोरि कर बिधि को मनावतिं पुरुष नंदकुमार॥
  • अर्थ- ब्रज के घर-घर में यह बात फ़ैल गई है कि श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ चोरी करके माखन खाते हैं. एक स्थान पर कुछ ग्वालिनें आपस में चर्चा कर रही थी. उनमें से कोई ग्वालिन बोली कि अभी कुछ देर पहले हीं वो मेरे घर आए थे. कोई बोली कि मुझे दरवाजे पर खड़ी देखकर वे भाग गए. एक ग्वालिन बोली कि किस प्रकार कन्हैया को अपने घर में देखूं. मैं तो उन्हें इतना ज्यादा और बढ़िया माखन दूँ जितना वे खा सकें. लेकिन किसी तरह वे मेरे घर तो आएँ. तभी दूसरी ग्वालिन बोली कि यदि कन्हैया मुझे दिख जाएँ तो मैं उन्हें गोद में भर लूँ. एक और ग्वालिन बोली कि यदि मुझे वे मिल जाएँ तो मैं उन्हें ऐसा बांधकर रखूं कि कोई छुड़ा ही न सके. सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार ग्वालिनें प्रभु से मिलने की जुगत बिठा रही थी. कुछ ग्वालिनें यह भी कह कर रही थी कि यदि नंदपुत्र उन्हें मिल जाएँ तो वह हाथ जोड़कर उन्हें मना लें और पतिरूप में स्वीकार कर लें.

 

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15 COMMENTS

  1. Please tell me the meaning of this pad
    ” shobith kar navaneet liye l ………”

    • Pad ka meaning kisi bhi lelh Ko likh kr uska artha batana

  2. it’s extremely nice it is helpful for my study

  3. Please tell me meaning of this..ysoda bar bar yo bhake, he kou brj me hitu hmaro, chlt gopal hi rakhe, kaha kaj mere chhgn mgn ko, nirp mdhupuri bulayo. Suflk- sut mere pran hrn ko,kal- rup hve aayo. Bru ye godhn hro knsh sb,mohi bndi le melo.itnoe sukh, kml- nyn meri akhiyni aage khelo. Bashr bdn bilokt jiwo, nisi nij ankm Lau.tihi bichhurt jo jiyo krm- bs, to hsi kahi bulau. Kmlnyn gun tert tert, adhr bdn kumihlani.’sur’kaha lgi prgti jnau, dukhit nnd ju ki rani..

  4. That’s extremely nice
    Well satisfied

  5. surdas ji ke dohe padkar achha laga
    h b batham

  6. please tell me meaning of this मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।
    जैसे उड़ि जहाज की पंछी, फिरि जहाज पै आवै॥
    कमल-नैन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै।
    परम गंग को छाँड़ि पियासो, दुरमति कूप खनावै॥
    जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील-फल भावै।
    ‘सूरदास’ प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै॥

    • Deviram favrit kavi surdas

    • ARTH:mere man ko sukh aur kaha milega??jese panchhi (bird) hawa me udd kar fir se jahaj pe aata he tese hi aur sab jagah se bhatak ke mera man fir govind ke sharan me aapahucha.
      mere govind kese he?to aap kamal nain he..kamal ke jese nayann wale he so aise maha govind ko chhod ke aur konse devta ka dhyaan dharu??jo pyase ko param ganga miljae fir kon durmati adham kup(well) ko khodega.jis madhukar(honeybee) ne ambuj(lotus) ka ras mitha ras ka paan kiya ho wo kese karil(khatta) fhal khae??arthart govind ko bhajneke baad fir kese kisi aur ka dhyaan Dhare??surdasji kehte he kamdhenu roopi govind ko tyagi ke cheri kon duhawe??aisi gaaay jo dudh nahi deti ho usko kon duhawe??arthartmere to govind ki kamdhenu gaay he.

      iti shreegovindpadpallaw namaskrutwa

  7. I like surdas ke padh very much

  8. sukhmangal singh

    सूरदास जी द्वारा रचित दोहे अर्थ सहित सुविचार हिंदी डाट काम में प्रकाशित हुआ यह सुखद सन्देश है जिसे पढकर बहुत सुन्दर लगा |धन्यवाद सद्भावना सहित !

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