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Swami Vivekananda Chicago Speech in Hindi स्वामी विवेकानंद शिकागो भाषण

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                                                            स्वामी विवेकानंद
  • स्वामी विवेकानंद, एक ऐसी शख्सियत जिन्हें किसी उपाधि या परिचय में बांधना संभव नहीं है. भारतीय जनमानस पर इनका जितना प्रभाव रहा,शायद ही पिछले कुछ सदियों में किसी और का रहा है. स्वामी विवेकानंद का वास्तविक नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था. लेकिन उनकी पहचान विवेकानंद के नाम से ही रही, उन्हें ये नाम अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस जी से मिला. स्वामी विवेकानंद भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अध्यात्मिक व्यक्तियों में से एक हैं. उन्होंने १९वीं सदी में आध्यात्मिकता को पुनर्जीवित करने में अहम भूमिका निभाई. योग और वेदांत को प्रचारित करने में उनका योगदान अतुलनीय है. स्वामी विवेकानंद ने विश्व भर में हिन्दू दर्शन का प्रसार किया तथा दुनिया को भारत की महानता से अवगत कराया. उन्होंने अपने जीवन काल में सैकड़ों सार्वजनिक सभाओं में व्याख्यान किया, परन्तु उनका १८९३ में अमेरिका स्थित शिकागो में सन् १८९३ में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए दिया गया भाषण अमर हो गया. स्वामी विवेकानंद ने इस भाषण की शुरुआत “भाइयों और बहनों” से कर वहां मौजूद तथा पूरे विश्व को एक परिवार के रूप में बता वसुधैव कुटुम्बकम का परिचय दिया था. आज १२५ साल बाद भी उनका ये भाषण उतना ही प्रासंगिक है जितना तब था. आइये आज उस भाषण को पढ़ हम अपनी सोच को बेहतर करें.

 

  • Swami Vivekananda Chicago Speech in Hindi स्वामी विवेकानंद शिकागो भाषण

    मेरे अमरीकी भाइयों और बहनों!
    आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है. उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा है। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ; धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ; और सभी सम्प्रदायों एवं मतों को कोटि कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ।
    मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बतलाया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृत- दोनों की ही शिक्षा दी हैं। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था। ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने महान जरथुष्ट जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है। भाइयों मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ जिसकी आवृति मैं बचपन से कर रहा हूँ और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं:

    रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥

    अर्थात जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।
    यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है स्वतः ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है:

    ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

    अर्थात जो कोई मेरी ओर आता है-चाहे किसी प्रकार से हो-मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।
    साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं व उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को ध्वस्त करती हुई पूरे के पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं। यदि ये वीभत्स दानवी शक्तियाँ न होतीं तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता। पर अब उनका समय आ गया हैं और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टा ध्वनि हुई है वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्पारिक कटुता का मृत्यु निनाद सिद्ध हो।

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