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तुलसीदास के 11 दोहे अर्थ सहित – Tulsidas Ke Dohe in Hindi With Meaning Shloka

Tulsidas Ke Dohe in Hindi wikipedia with meaning – sant dohe of tulsidas in hindi tulsi ke dohe – tulsidas ji ke language tulsidas tulsi das me – tulsi ji ke dohe in hindi – तुलसीदास के पद  दोहे अर्थ सहित

 

  • तुलसीदास के दोहे

 

  • रामचरितमानस के रचयिता तुलसीदास जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. तुलसीदास के दोहों, चौपाइयों और छंदों में जीवन की गूढ़ बातों को बड़ी हीं सरलता से समझाया गया है. आज भी तुलसीदास की ये रचनाएँ जनमानस के मन को बहुत लुभाती है. तुलसीदास का जन्म 1532 ई. में उत्तर प्रदेश के राजापुर गांव में हुआ था.
    रामचरितमानस, दोहावली, कवितावली, गीतावली, विनय पत्रिका इत्यादि इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं.
    तुलसीदास के दोहे अर्थ सहित :
  • बिना तेज के पुरुष की अवशि अवज्ञा होय ।
    आगि बुझे ज्यों राख की आप छुवै सब कोय ।।
    अर्थात – तेजहीन व्यक्ति की बात को कोई भी व्यक्ति महत्व नहीं देता है, उसकी आज्ञा का पालन कोई नहीं करता है. ठीक वैसे हीं जैसे, जब राख की आग बुझ जाती है, तो उसे हर कोई छूने लगता है.
  • तुलसी साथी विपत्ति के विद्या विनय विवेक ।
    साहस सुकृति सुसत्यव्रत राम भरोसे एक ।।
    अर्थात – तुलसीदास जी कहते हैं कि विपत्ति में अर्थात मुश्किल वक्त में ये चीजें मनुष्य का साथ देती है.
    ज्ञान, विनम्रता पूर्वक व्यवहार, विवेक, साहस, अच्छे कर्म, आपका सत्य और राम ( भगवान ) का नाम.
  • काम क्रोध मद लोभ की जौ लौं मन में खान ।
    तौ लौं पण्डित मूरखौं तुलसी एक समान ।।
    अर्थात – जब तक व्यक्ति के मन में काम की भावना, गुस्सा, अहंकार, और लालच भरे हुए होते हैं.
    तबतक एक ज्ञानी व्यक्ति और मूर्ख व्यक्ति में कोई अंतर नहीं होता है, दोनों एक हीं जैसे होते हैं.
  • आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह ।
    तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह ।।
    अर्थात – जिस स्थान या जिस घर में आपके जाने से लोग खुश नहीं होते हों और उन लोगों की आँखों में आपके लिए न तो प्रेम और न हीं स्नेह हो. वहाँ हमें कभी नहीं जाना चाहिए, चाहे वहाँ धन की हीं वर्षा क्यों न होती हो.
  • मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर
    अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर ॥
    अर्थात –  हे रघुवीर, मेरे जैसा कोई दीनहीन नहीं है और तुम्हारे जैसा कोई दीनहीनों का भला करने वाला नहीं है. ऐसा विचार करके, हे रघुवंश मणि.. मेरे जन्म-मृत्यु के भयानक दुःख को दूर कर दीजिए.
  • कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम ।
    तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम ॥
    अर्थात – जैसे काम के अधीन व्यक्ति को नारी प्यारी लगती है और लालची व्यक्ति को जैसे धन प्यारा लगता है,
    वैसे हीं हे रघुनाथ, हे राम, आप मुझे हमेशा प्यारे लगिए.
  • सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत ।
    श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत ।।
    अर्थात – हे उमा, सुनो वह कुल धन्य है, दुनिया के लिए पूज्य है और बहुत पावन (पवित्र) है,
    जिसमें श्री राम (रघुवीर) की मन से भक्ति करने वाले विनम्र लोग जन्म लेते हैं.
  • मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन ।
    अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन ॥
    अर्थात – राम मच्छर को भी ब्रह्मा बना सकते हैं और ब्रह्मा को मच्छर से भी छोटा बना सकते हैं.
    ऐसा जानकर बुद्धिमान लोग सारे संदेहों को त्यागकर राम को हीं भजते हैं.

 

  • तुलसी किएं कुंसग थिति, होहिं दाहिने बाम ।
    कहि सुनि सुकुचिअ सूम खल, रत हरि संकंर नाम ।।
    बसि कुसंग चाह सुजनता, ताकी आस निरास ।
    तीरथहू को नाम भो, गया मगह के पास ।।
    अर्थात – बुरे लोगों की संगती में रहने से अच्छे लोग भी बदनाम हो जाते हैं. वे अपनी प्रतिष्ठा गँवाकर छोटे हो जाते हैं. ठीक उसी तरह जैसे, किसी व्यक्ति का नाम भले हीं देवी-देवता के नाम पर रखा जाए, लेकिन बुरी संगती के कारण उन्हें मान-सम्मान नहीं मिलता है. जब कोई व्यक्ति बुरी संगती में रहने के बावजूद अपनी काम में सफलता पाना चाहता है और मान-सम्मान पाने की इच्छा करता है, तो उसकी इच्छा कभी पूरी नहीं होती है. ठीक वैसे हीं जैसे मगध के पास होने के कारण विष्णुपद तीर्थ का नाम “गया” पड़ गया.

 

  • सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर । होहिं बिषय रत मंद मंद तर ॥
    काँच किरिच बदलें ते लेहीं । कर ते डारि परस मनि देहीं ॥
    अर्थात – जो लोग मनुष्य का शरीर पाकर भी राम का भजन नहीं करते हैं और बुरे विषयों में खोए रहते हैं. वे लोग उसी व्यक्ति की तरह मूर्खतापूर्ण आचरण करते हैं, जो पारस मणि को हाथ से फेंक देता है और काँच के टुकड़े हाथ में उठा लेता है.
  • मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ।
    पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक ।।
    अर्थात – परिवार के मुखिया को मुँह के जैसा होना चाहिए, जो खाता-पीता मुख से है और शरीर के सभी अंगों का अपनी बुद्धि से पालन-पोषण करता है.
  • तुलसी जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।
    तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोइ।।
    अर्थात – जो लोग दूसरों की निन्दा करके खुद सम्मान पाना चाहते हैं. ऐसे लोगों के मुँह पर  ऐसी कालिख लग जाती है, जो लाखों बार धोने से भी नहीं हटती है.

 

  • बचन बेष क्या जानिए, मनमलीन नर नारि।
    सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारि।।
    अर्थात – किसी की मीठी बातों और किसी के सुंदर कपड़ों से, किसी पुरुष या स्त्री के मन की भावना कैसी है यह नहीं जाना जा सकता है. क्योंकि मन से मैले सूर्पनखा, मारीच, पूतना और रावण के कपड़े बहुत सुन्दर थे.
  • तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर |
    सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि ||
    अर्थात – किसी व्यक्ति के सुंदर कपड़े देखकर केवल मूर्ख व्यक्ति हीं नहीं बल्कि बुद्धिमान लोग भी धोखा खा जाते हैं . ठीक उसी प्रकार जैसे मोर के पंख और उसकी वाणी अमृत के जैसी लगती है, लेकिन उसका भोजन सांप होता है.
  • सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस |
    राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ||
    अर्थात – मंत्री ( सलाहकार ), चिकित्सक और शिक्षक यदि ये तीनों किसी डर या लालच से झूठ बोलते हैं, तो राज्य,शरीर और धर्म का जल्दी हीं नाश हो जाता है.

 

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5 comments

  1. sapan.

    Comment:sr. Apke vani bhut pyara hain.

  2. mayank kuchalia

    Very good sir

  3. sheetal

    सर आपने रहीम दास के दोहे को बहुत अच्छे से लिखा हैं

  4. sonu Kumar

    very nice post

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