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वीर रस की 4 कविता Veer Ras Ki Kavita in Hindi desh bhakti poetry collection

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  • Veer Ras Ki Kavita in Hindi
    – हाँ इस देश का वासी हूँ, इस माटी का क़र्ज़ चुकाऊंगा ।

  • हाँ इस देश का वासी हूँ, इस माटी का क़र्ज़ चुकाऊंगा
    जीने का दम रखता हूँ, तो मरकर भी दिखलाऊंगा ।।
    नज़र उठा कर न देखना, ऐ दुश्मन मेरे देश को
    मरूँगा मैं जरूर पर… तुझे मार कर हीं जाऊंगा ।।
    कसम मुझे इस माटी की, कुछ ऐसा मैं कर जाऊंगा
    हाँ इस देश का वासी हूँ, इस माटी का क़र्ज़ चुकाऊंगा ।।
    आशिक़ तुझे मिले होंगे बहुत, पर मैं ऐसा कहलाऊंगा
    सनम होगा मेरा वतन और मैं दीवाना कहलाऊंगा ।।
    माया में फंसकर तो मरता हीं है हर कोई
    पर तिरंगे को कफ़न बना कर मैं शहीद कहलाऊंगा ।।
    हाँ इस देश का वासी हूँ, इस माटी का क़र्ज़ चुकाऊंगा ।
    मेरे हौसले न तोड़ पाओगे तुम, क्योंकि मेरी शहादत हीं अब मेरा धर्म है ।।
    सीमा पर डटकर खड़ा हूँ, क्योंकि ये मेरा वतन है
    ऐ मेरे देश के नौजवानों अब आंसू न बहाओ तुम ।।
    सेनानियों की शाहदत का अब कर्ज चुकाओ तुम
    हासिल करो विश्वास तुम, करो देश के दर्द का एहसास तुम ।।
    सपना हो हिन्द का सच, दुश्मनों का करो विनाश तुम
    उठो तुम भी और मेरे साथ कहो, कुछ ऐसा मैं भी कर जाऊंगा ।।
    हाँ इस देश का वासी हूँ, इस माटी का क़र्ज़ चुकाऊंगा
    ऐ देश के दुश्मनों ठहर जाओ…. संभल जाओ ।।
    मैं इस देश का वासी हूँ, अब चुप नहीं रह जाऊंगा
    आंच आई मेरे देश पर तो खून मैं बहा दूंगा ।।
    क्योंकि अब बहुत हुआ, अब मैं चुप नहीं रह जाऊंगा
    हाँ इस देश का वासी हूँ, इस माटी का क़र्ज़ चुकाऊंगा ।।
    खून खौलता है मेरा, जब वतन पर कोई आंच आती है
    कतरा कतरा बहा दूंगा, फिर दिल से आवाज आती है ।।
    इस माटी का बेटा हूँ मैं, इस माटी में ही मिल जाऊंगा
    आँख उठा के देखे कोई, सबको मार गिराऊंगा ।।
    भारत का मैं वासी हूँ, अब चुप नहीं रह पाउँगा
    अब चुप नहीं रह पाउँगा, अब चुप नहीं रह पाउँगा ।।
    – आँचल वर्मा

 


  • Veer Ras Poem in Hindi
    – मेरे देश के लाल

    पराधीनता को जहाँ समझा श्राप महान
    कण-कण के खातिर जहाँ हुए कोटि बलिदान
    मरना पर झुकना नहीं, मिला जिसे वरदान
    सुनो-सुनो उस देश की शूर-वीर संतान
    आन-मान अभिमान की धरती पैदा करती दीवाने
    मेरे देश के लाल हठीले शीश झुकाना क्या जाने।
    दूध-दही की नदियां जिसके आँचल में कलकल करतीं
    हीरा, पन्ना, माणिक से है पटी जहां की शुभ धरती
    हल की नोंकें जिस धरती की मोती से मांगें भरतीं
    उच्च हिमालय के शिखरों पर जिसकी ऊँची ध्वजा फहरती
    रखवाले ऐसी धरती के हाथ बढ़ाना क्या जाने
    मेरे देश के लाल हठीले शीश झुकाना क्या जाने।
    आज़ादी अधिकार सभी का जहाँ बोलते सेनानी
    विश्व शांति के गीत सुनाती जहाँ चुनरिया ये धानी
    मेघ साँवले बरसाते हैं जहाँ अहिंसा का पानी
    अपनी मांगें पोंछ डालती हंसते-हंसते कल्याणी
    ऐसी भारत माँ के बेटे मान गँवाना क्या जाने
    मेरे देश के लाल हठीले शीश झुकाना क्या जाने।
    जहाँ पढाया जाता केवल माँ की ख़ातिर मर जाना
    जहाँ सिखाया जाता केवल करके अपना वचन निभाना
    जियो शान से मरो शान से जहाँ का है कौमी गाना
    बच्चा-बच्चा पहने रहता जहाँ शहीदों का बाना
    उस धरती के अमर सिपाही पीठ दिखाना क्या जाने
    मेरे देश के लाल हठीले शीश झुकाना क्या जाने।
    – बालकवि वैरागी

 


  • Veer Ras Ki Kavita Desh Bhakti
    – विजयी के सदृश जियो रे

    वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो
    चट्टानों की छाती से दूध निकालो
    है रुकी जहाँ भी धार शिलाएं तोड़ो
    पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो
    चढ़ तुंग शैल शिखरों पर सोम पियो रे
    योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे!
    जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है
    चिनगी बन फूलों का पराग जलता है
    सौन्दर्य बोध बन नयी आग जलता है
    ऊँचा उठकर कामार्त्त राग जलता है
    अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे
    गरजे कृशानु तब कंचन शुद्ध करो रे!
    जिनकी बाँहें बलमयी ललाट अरुण है
    भामिनी वही तरुणी नर वही तरुण है
    है वही प्रेम जिसकी तरंग उच्छल है
    वारुणी धार में मिश्रित जहाँ गरल है
    उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है
    तलवार प्रेम से और तेज होती है!
    छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाये
    मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाये
    दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है
    मरता है जो एक ही बार मरता है
    तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे
    जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे!
    स्वातंत्र्य जाति की लगन व्यक्ति की धुन है
    बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है
    वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे
    जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे!
    जब कभी अहम पर नियति चोट देती है
    कुछ चीज़ अहम से बड़ी जन्म लेती है
    नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है
    वह उसे और दुर्धुर्ष बना जाती है
    चोटें खाकर बिफरो, कुछ अधिक तनो रे
    धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे!
    उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है
    सुख नहीं धर्म भी नहीं, न तो दर्शन है
    विज्ञान ज्ञान बल नहीं, न तो चिंतन है
    जीवन का अंतिम ध्येय स्वयं जीवन है
    सबसे स्वतंत्र रस जो भी अनघ पियेगा
    पूरा जीवन केवल वह वीर जियेगा!
    – रामधारी सिंह दिनकर

 

 

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4 comments

  1. Anshul

    Good poems

  2. Pradeep yadav

    Veer ras most important ras in hindi subject

  3. Aman negi

    Nice poems

  4. Abhi

    वीर रस की कविता – Veer Ras Ki Kavita for children vir poem poems famous poets sammelan

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