Generic selectors
Exact matches only
Search in title
Search in content

अटल बिहारी वाजपेयी की 12 कविताएँ | Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi kavitayen :-

Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi - अटल बिहारी वाजपेयी की कविता

Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi

  • दोस्तों आज हम आपके लिए अटल बिहारी वाजपेयी की 12 कवितायें लाये हैं. (Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi). हमें विश्वास है कि आपको यह प्रस्तुति पसंद आएगी.
  • पन्द्रह अगस्त की पुकार
  • पंद्रह अगस्त का दिन कहता –
    आज़ादी अभी अधूरी है।
    सपने सच होने बाकी है,
    रावी की शपथ न पूरी है।।
    जिनकी लाशों पर पग धर कर
    आज़ादी भारत में आई।

    वे अब तक हैं खानाबदोश
    ग़म की काली बदली छाई।।
    कलकत्ते के फुटपाथों पर
    जो आँधी-पानी सहते हैं।
    उनसे पूछो, पंद्रह अगस्त के
    बारे में क्या कहते हैं।।
    हिंदू के नाते उनका दु:ख
    सुनते यदि तुम्हें लाज आती।
    तो सीमा के उस पार चलो
    सभ्यता जहाँ कुचली जाती।।
    इंसान जहाँ बेचा जाता,
    ईमान ख़रीदा जाता है।
    इस्लाम सिसकियाँ भरता है,
    डालर मन में मुस्काता है।।
    भूखों को गोली नंगों को
    हथियार पिन्हाए जाते हैं।
    सूखे कंठों से जेहादी
    नारे लगवाए जाते हैं।।
    लाहौर, कराची, ढाका पर
    मातम की है काली छाया।
    पख्तूनों पर, गिलगित पर है
    ग़मगीन गुलामी का साया।।
    बस इसीलिए तो कहता हूँ
    आज़ादी अभी अधूरी है।
    कैसे उल्लास मनाऊँ मैं?
    थोड़े दिन की मजबूरी है।।
    दिन दूर नहीं खंडित भारत को
    पुन: अखंड बनाएँगे।
    गिलगित से गारो पर्वत तक
    आज़ादी पर्व मनाएँगे।।
    उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से
    कमर कसें बलिदान करें।
    जो पाया उसमें खो न जाएँ,
    जो खोया उसका ध्यान करें।।
    – Atal Bihari Vajpayee
    Atal Bihari Vajpayee Ki Kavita

.

  • दूध में दरार पड़ गई
  • खून क्यों सफेद हो गया?
    भेद में अभेद खो गया।
    बंट गये शहीद, गीत कट गए,
    कलेजे में कटार दड़ गई।
    दूध में दरार पड़ गई।
    खेतों में बारूदी गंध,
    टूट गये नानक के छंद।
    सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है।
    वसंत से बहार झड़ गई।
    दूध में दरार पड़ गई।
    अपनी ही छाया से बैर,
    गले लगने लगे हैं ग़ैर,
    ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता।
    बात बनाएं, बिगड़ गई।
    दूध में दरार पड़ गई।
    – Atal Bihari Vajpayee
    Poems by Atal Bihari Vajpayee

.

  • गीत नहीं गाता हूँ
  • बेनकाब चेहरे हैं,
    दाग बड़े गहरे हैं,
    टूटता तिलस्म, आज सच से भय खाता हूँ ।
    गीत नही गाता हूँ ।
    लगी कुछ ऐसी नज़र,
    बिखरा शीशे सा शहर,
    अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ ।
    गीत नहीं गाता हूँ ।
    पीठ मे छुरी सा चाँद,
    राहु गया रेखा फाँद,
    मुक्ति के क्षणों में बार-बार बँध जाता हूँ ।
    गीत नहीं गाता हूँ । – Atal Bihari Vajpayee
    Atal Bihari Vajpayee poetry

.

  • Haar Nahi Manunga
  • गीत  नया गाता हूँ
    टूटे हुए तारो से ,फूटे बासंती स्वर 
    पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर 
    झरे सब पीले पात, कोयल की कुहुक रात 
    प्राची में अरूढ़िमा की रेत देख पाता हूँ
    गीत नया गाता हूँ
    टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी,
    अन्तः को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी,
    हार नहीं मानूँगा,
    रार नयी ठानूंगा,
    काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ 
    गीत नया गाता हूँ

.

  • आओ फिर से दीया जलाएं
  • आओ फिर से दिया जलाएं
    भरी दूपहरी में अधियारा
    सूरज परछाई से हारा
    अंतरतम का नेह निचोड़े
    बुझी हुई बाती सुलगाएं
    आओ कि से दीया जलाएं।
    हम पड़ाव को समझे मंजिल
    लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल
    वर्तमान के मोहजाल में
    आने वाला कल न भुलाएँ
    आओ कि से दीया जलाएं।
    आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
    अपनों के विघ्नों ने घेरा
    अंतिम जय का वज्र बनाने
    नव दधीचि हड्डियां गलाए
    आओ कि से दीया जलाएं। – अटल बिहारी वाजपेयी
    Atal Bihari Vajpayee Poem in Hindi

.

  • कदम मिलाकर चलना होगा
  • बाधाएं आती हैं आएं
    घिरें प्रलय की घोर घटाएं,
    पावों के नीचे अंगारे,
    सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,
    निज हाथों में हंसते-हंसते,
    आग लगाकर जलना होगा।
    कदम मिलाकर चलना होगा।
    हास्य-रूदन में, तूफानों में,
    अगर असंख्यक बलिदानों में,
    उद्यानों में, वीरानों में,
    अपमानों में, सम्मानों में,
    उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
    पीड़ाओं में पलना होगा।
    कदम मिलाकर चलना होगा।
    उजियारे में, अंधकार में,
    कल कहार में, बीच धार में,
    घोर घृणा में, पूत प्यार में,
    क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
    जीवन के शत-शत आकर्षक,
    अरमानों को ढलना होगा।
    कदम मिलाकर चलना होगा।
    सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
    प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
    सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
    असफल, सफल समान मनोरथ,
    सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
    पावस बनकर ढलना होगा।
    कदम मिलाकर चलना होगा।
    कुछ कांटों से सज्जित जीवन,
    प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
    नीरवता से मुखरित मधुबन,
    परहित अर्पित अपना तन-मन,
    जीवन को शत-शत आहुति में,
    जलना होगा, गलना होगा।
    क़दम मिलाकर चलना होगा।
    – Atal Bihari Vajpayee
    Atal Bihari Vajpayee Ki Kavitayein

.

  • यक्ष प्रश्न
  • जो कल थे,
    वे आज नहीं हैं।
    जो आज हैं,
    वे कल नहीं होंगे।
    होने, न होने का क्रम,
    इसी तरह चलता रहेगा,
    हम हैं, हम रहेंगे,
    यह भ्रम भी सदा पलता रहेगा।
    सत्य क्या है?
    होना या न होना?
    या दोनों ही सत्य हैं?
    जो है, उसका होना सत्य है,
    जो नहीं है, उसका न होना सत्य है।
    मुझे लगता है कि
    होना-न-होना एक ही सत्य के
    दो आयाम हैं,
    शेष सब समझ का फेर,
    बुद्धि के व्यायाम हैं।
    किन्तु न होने के बाद क्या होता है,
    यह प्रश्न अनुत्तरित है।
    प्रत्येक नया नचिकेता,
    इस प्रश्न की खोज में लगा है।
    सभी साधकों को इस प्रश्न ने ठगा है।
    शायद यह प्रश्न, प्रश्न ही रहेगा।
    यदि कुछ प्रश्न अनुत्तरित रहें
    तो इसमें बुराई क्या है?
    हाँ, खोज का सिलसिला न रुके,
    धर्म की अनुभूति,
    विज्ञान का अनुसंधान,
    एक दिन, अवश्य ही
    रुद्ध द्वार खोलेगा।
    प्रश्न पूछने के बजाय
    यक्ष स्वयं उत्तर बोलेगा। – अटल बिहारी वाजपेयी
    Poetry of Atal Bihari Vajpayee

.

  • भारत जमीन का टुकड़ा नहीं
  • भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
    जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
    हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
    पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
    पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
    कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
    यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
    यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
    इसका कंकर-कंकर शंकर है,
    इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
    हम जियेंगे तो इसके लिये
    मरेंगे तो इसके लिये।
    – Atal Bihari Vajpayee
    Atal Bihari Vajpayee Poems

.

  • पड़ोसी से
  • एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते,
    पर स्वतन्त्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा।
    अगणित बलिदानो से अर्जित यह स्वतन्त्रता,
    अश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता।
    त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतन्त्रता,
    दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता।
    इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो,
    चिनगारी का खेल बुरा होता है ।
    औरों के घर आग लगाने का जो सपना,
    वो अपने ही घर में सदा खरा होता है।
    अपने ही हाथों तुम अपनी कब्र ना खोदो,
    अपने पैरों आप कुल्हाडी नहीं चलाओ।
    ओ नादान पडोसी अपनी आँखे खोलो,
    आजादी अनमोल ना इसका मोल लगाओ।
    पर तुम क्या जानो आजादी क्या होती है?
    तुम्हे मुफ़्त में मिली न कीमत गयी चुकाई।
    अंग्रेजों के बल पर दो टुकडे पाये हैं,
    माँ को खंडित करते तुमको लाज ना आई?
    अमरीकी शस्त्रों से अपनी आजादी को
    दुनिया में कायम रख लोगे, यह मत समझो।
    दस बीस अरब डालर लेकर आने वाली बरबादी से
    तुम बच लोगे यह मत समझो।
    धमकी, जिहाद के नारों से, हथियारों से
    कश्मीर कभी हथिया लोगे यह मत समझो।
    हमलो से, अत्याचारों से, संहारों से
    भारत का शीष झुका लोगे यह मत समझो।
    जब तक गंगा मे धार, सिंधु मे ज्वार,
    अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष,
    स्वातन्त्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे
    अगणित जीवन यौवन अशेष।
    अमरीका क्या संसार भले ही हो विरुद्ध,
    काश्मीर पर भारत का सर नही झुकेगा
    एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते,
    पर स्वतन्त्र भारत का निश्चय नहीं रुकेगा ।
    – Atal Bihari Vajpayee
    Atal Bihari Vajpayee Kavita

.

  • मैं अखिल विश्व का गुरू महान
  • मैं अखिल विश्व का गुरू महान,
    देता विद्या का अमर दान,
    मैंने दिखलाया मुक्ति मार्ग
    मैंने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान।
    मेरे वेदों का ज्ञान अमर,
    मेरे वेदों की ज्योति प्रखर
    मानव के मन का अंधकार
    क्या कभी सामने सका ठहर?
    मेरा स्वर नभ में घहर-घहर,
    सागर के जल में छहर-छहर
    इस कोने से उस कोने तक
    कर सकता जगती सौरभ भय।
    – Atal Bihari Vajpayee.
    Atal Bihari Vajpayee Poetry

.

  • राह कौन सी जाऊँ मैं?
  • चौराहे पर लुटता चीर
    प्यादे से पिट गया वजीर
    चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ?
    राह कौन सी जाऊँ मैं?
    सपना जन्मा और मर गया
    मधु ऋतु में ही बाग झर गया
    तिनके टूटे हुये बटोरूँ या नवसृष्टि सजाऊँ मैं?
    राह कौन सी जाऊँ मैं?
    दो दिन मिले उधार में
    घाटों के व्यापार में
    क्षण-क्षण का हिसाब लूँ या निधि शेष लुटाऊँ मैं?
    राह कौन सी जाऊँ मैं ?
    – Atal Bihari Vajpayee
    Poem by Atal Bihari Vajpayee

.

  • जीवन की ढलने लगी सांझ
  • जीवन की ढलने लगी सांझ
    उमर घट गई
    डगर कट गई
    जीवन की ढलने लगी सांझ।
    बदले हैं अर्थ
    शब्द हुए व्यर्थ
    शान्ति बिना खुशियाँ हैं बांझ।
    सपनों में मीत
    बिखरा संगीत
    ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ।
    जीवन की ढलने लगी सांझ।

.

  • ऐ अटल!
  • तू सरल भी था, तू प्रबल भी था,
    तूने सफलता का अद्भुत आकाश रचा है
    ऐ अटल! तूने इतिहास रचा है।
    शत्रु भूमि में भी निडर निहत्था गया,
    तेरे बोल के प्रहार से सब थर्रा गया,
    तेरा आलोचक जन्मा नहीं है धरती में,
    तूने मित्रता का ऐसा प्रयास रचा है,
    ऐ अटल! तूने इतिहास रचा है।
    मृत्यु में इतना साहस कहाँ,
    जो ले जाए तुझको काल तक,
    तू अमर लोकप्रिय नेता रहेगा,
    तेरा प्रभाव रहेगा चिरकाल तक,
    ऐ भारत रत्न! तूने भारत का विकास रचा है
    ऐ अटल! तूने इतिहास रचा है।
    – Jaya Pandey
    Poem on Atal Bihari Vajpayee

.

  • अमर अटल पर कविता
  • असीम साहस का परिचय दिया था जिसने
    कारगिल को दुश्मन के पंजे से छीनकर
    चला गया आज ,हम सबको छोड़कर l
    मन दुखी जुबान लड़खड़ाई सी है
    आज हर हिन्दुस्तानी ग़मगीन है
    क्यों चले गए तुम मुँह मोढ़कर l
    कोई नाम का रिश्ता नहीं तुमसे
    फिर भी दिल आज ग़मगीन है
    चले गए मेरी आँखों में आँसू देकर l
    बजा दिया था विदेश में हिंदी का डंका
    जिसकी नीति का लोहा माना संसार ने
    आज चले गए वह हमसे रूठकर l
    देश के नहीं जन -जन के नेता बने
    पहुंचाया वतन को जमी से फलक पर
    फिर आज क्यों चले गए हमें छोड़कर l
    – राशि सिंह
    Poem on Atal Bihari Vajpayee – 2

.

Previous Jeevan Me Khelo Ka Mahatva in Hindi Essay Quotes Importance of Sports in Life :
Next अटल बिहारी वाजपेयी के प्रेरणादायक विचार – Atal Bihari Vajpayee Quotes in Hindi Vichar

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.