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Biography Jivani in Hindi

अटलजी की जीवनी – Atal Bihari Vajpayee ka jeevan Parichay jeevani biography hindi

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अटलजी की जीवनी - Atal Bihari Vajpayee ka jeevan Parichay jeevani biography hindi

 

  • अटल बिहारी वाजपेयी

 

  • “अटल नहीं रहे…” यह वाक्य खुद ही में एक अंतर्विरोध लिए हैं…
  • आज जब पूरा देश भारत के सबसे लोकप्रिय और चहेते प्रधानमंत्री की मृत्यु के गम में डूबा हैं… सोशल मीडिया उनकी तस्वीरों और श्रद्धांजलियों से भरा है, लोग इसे यकीनन एक युग का अंत कह रहे हैं… तो आईये जानें उस “अटल युग” को, उस अटल के जीवन को…
  • अटल विहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसम्बर1924 को आधीन भारत के ग्वालियर स्टेट (अब मध्यप्रदेश) के ग्वालियर शहर में श्रीमती कृष्णा देवी और कृष्णा विहारी वाजपेयी के यहाँ हुआ. उनके पिता ग्वालियर के ही एक विध्यालय में शिक्षक थे. अटल जी की प्रारंभिक शिक्षा ग्वालियर में सरस्वती शिशु मंदिर से हुई. इसके बाद उन्होंने ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की. अटल जी को साहित्य में बचपन से ही रूचि थी. यही वजह है की स्नातक में उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी, और संस्कृत में विशिष्टता प्राप्त की. उनके पिता ब्रज भाषा में कवितायें लिखते थे. यहीं से उन्हें भी काव्य की विरासत मिली, जिसका आगे चलकर उन्होंने ने खूब प्रबलता से अनुशीलन किया. स्नातक के बाद उन्होंने डी.ए.वी कॉलेज से राजनीती विज्ञानं में एम.ए किया और आर्य समाज के युवा संगठन आर्य कुमार सभा के सदस्य बने.
  • Atal Bihari Vajpeyee Ka Political Safar Carrier in Hindi :

  • अटल जी का राजनितिक करियर 5 दसकों का रहा. उन्होंने 18 वर्ष की युवा उम्र में राजनीती में कदम रखा. भारत छोरो आन्दोलन के दौरान पहली बार उनकी गिरफ़्तारी हुई. छात्र जीवन से ही वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने और बहुत ही सक्रियता से संघ के कार्यक्रमों में भाग लेते थे. वो राष्ट्रीय जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में थे, और पहली बार लोकसभा के लिए1957 में जनसंघ की टिकेट पर बलरामपुर से चुने गए. अटल जी ने राजनीती की शिक्षा अपने राजनितिक गुरु श्री श्यामा प्रसाद मुख़र्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी से प्राप्त की और श्री स्यामा प्रसाद मुख़र्जी के मृत्यु के बाद जनसंघ की बागडोर अपने कंधो पर ली. 1975 में इमरजेंसी के दौरान विपक्ष के नेताओं के साथ अटल जी की भी गिरफ़्तारी हुई, और 1977 में जनता पार्टी की सरकार में विदेश मंत्री रहे. 1980 में जनता दल छोड़कर उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर भारतीय जनता पार्टी की स्तापना की और उसके पहले अध्यक्ष चुने गए. अटल जी राजनीती से सन्यास लेने तक भारतीय जनता पार्टी में ही सक्रिय रहे. उन्होंने तीन बार प्रधानमंत्री का पद संभाला, पहली बार 1996 में 13दिनों के लिए, फिर 1998 में दूसरी बार 13 महीने के लिए प्रधानमंत्री का पद संभाला और 1999 में भाजपा के नेतृत्व में गठबंधन सरकार में प्रधानमंत्री रहते हुए 5 साल का कार्यकाल पूरा करने वाले पहले प्रधानमंत्री बने. 2004 के लोकसभा चुनाव में एन. डी. ए की हर के बाद अटल जी ने राजनीती से सन्यास ले लिया.
  • Atal Bihari Vajpayee Achievements :

  • भारत के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में से एक अटल जी ने कई महत्वपूर्ण लोक कल्याण की योजनाओं की शुरुवात की. सर्व शिक्षा अभियान उनकी दूरद्रष्ट्ता और देश के विकास के लिए उनके प्रतिबद्धता का परिचायक है. स्वर्णिम चतुर्भुज अटल जी की प्रग्रतिशील सोच का ही नतीजा है. अटल जी हमेशा से आधुनिकता को स्वीकार करने और विकास में उसके इस्तेमाल के समर्थक रहे. उनका मानना था की संचार की आधुनिक तकनीकों और परिचालन की सुदृढ़ व्यवस्था से ही देश प्रगति के पथ पर आगे बढेगा. अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने भारत के पडोसी राष्ट्रों के साथ अपने सम्बन्ध सुधारने का परयास किया. ख़ास तौर पर पकिस्तान के साथ संबंधों में मधुरता लाने के लिए अटल जी ने लाहौर के लिए बस सेवा की शुरुवात की. देश को मजबूती देने के लिए तमाम अन्तराष्ट्रीय प्रतिबंधों और दबावों के बिच पोखरण में प्रनामु परिक्षण को सफल कराया. अटल जी का कार्यकाल हमेशा विकास के लिए उठाये क़दमों और उनकी दूरदर्शिता के लिए याद किया जायेगा.

 

  • Kavi Atal Bihari Vajpeyee –

  • एक महत्वपूर्ण राजनेता होने के साथ-साथ अटल जी एक प्रखर वक्ता और एक प्रशंसित कवि भी थे. उन्होंने एक से बढ़कर एक कवितायेँ लिखीं और जीवन के विभिन्न पहलूवों पर अपनी सोच को अपनी कलम के माध्यम से सब्दों में पिरोया.उनकी प्रमुख कवितायेँ- “कदम मिलाकर चलना होगा”, “खून क्यूँ सफ़ेद हो गया”, “मौत से ठन गयी”, “हिन्दू तन मन”, “गीत नहीं गाता हूँ”, “स्कूल चलें हम” हैं. साहित्य से अपने लगाओ की वजह से अटल जी ने कई पत्रिकाओं का संपादन भी किया.
  • बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी अटल जी को2014 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया. अटल जी आजीवन अविवाहित रहे. उनके आखरी दिनों में उनके कुछ चुनिन्दा मित्रों का उन्हें साथ मिला. लम्बी बीमारी से जूझने के बाद 16 अगस्त 2018 को अंतिम सांस ली. अटल जी के जाने से भारतीय राजनीती के एक स्वर्णिम युग का अंत हो गया.
  • अटल बिहारी वाजपेयी की Top 12 कविताएँ – Atal Bihari Vajpayee Poems in Hindi kavitayen
  • अटल बिहारी वाजपेयी के प्रेरणादायक विचार – Atal Bihari Vajpayee Quotes in Hindi Vichar

 

सुभाषचंद्र बोस की जीवनी Subhash Chandra Bose Biography in Hindi सुभाष चंद्र

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Subhash Chandra Bose Biography in Hindi

 

  • सुभाषचन्द्र बोस एक ऐसा नाम है, जिसे सुनकर मन में देशभक्ति की भावना हिलोरें मारने लगती है.
    निराशा दूर हो जाती है और कुछ कर गुजरने का जज्बा मन में फिर से प्रबल हो उठता है.
  • “नेताजी” उपनाम शायद वीर सुभाष पर हीं सबसे ज्यादा शोभा देता है.
  • माँ भारती के इस दिव्य सपूत का जन्म 23 January 1897 को जानकीनाथ बोस और प्रभावती देवी के घर में
    उड़ीसा के कटक नगर में हुआ था.
  • इनके पिता एक जाने-माने वकील थे.
  • बालक सुभाष का जन्म एक अमीर परिवार में हुआ था, फिर भी धन उन्हें कभी मोहित नहीं कर सका.

 

  • सुभाषचंद्र बोस एक कुशल राजनीतिज्ञ, योग्य कूटनीतिज्ञ, वीर सिपाही, निडर, सेना के कुशल कप्तान,
    आश्चर्यजनक रूप से लोगों को मोहित कर लेने वाले अद्भुत व्यक्ति थे.
  • सुभाषचंद्र बोस अपने माता-पिता की 9 वीं सन्तान तथा 5 वें पुत्र थे.
  • उनकी शिक्षा कोलकाता के प्रेज़िडेंसी कॉलेज से हुई.
  • सुभाष Indian Civil Services की परीक्षा पास करने के बावजूद सरकारी नौकरी को ठोकर मारकर,
    देश की आजादी को महत्वपूर्ण मानकर क्रांतिकारियों के पथ पर चल निकले.
  • उन्होंने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया, देश की आजादी के लिए अपना उन्होंने सबकुछ
    त्याग दिया, और राष्ट्र की सेवा से एक पल के लिए भी नहीं डिगे.
  • अंग्रेजों का भारतीयों के प्रति बुरा व्यवहार देखकर, बचपन से हीं बालक सुभाष के मन में अंग्रेजों के प्रति
    नफरत की भावना भर गई.
  • एक बार एक शहर में हैजा ने विनाशकारी रूप ले लिया था, डॉक्टर और दवाइयाँ कम पड़ गई थी.
    तो सुभाष और अनेक स्वयंसेवी युवकों ने घर-घर जाकर लोगों की सेवा की, उनके घरों की सफाई की.
  • सुभाषचंद्र बोस गांधीजी से प्रभावित थे, लेकिन अहिंसा के पथ पर चलना उन्हें गंवारा नहीं था, क्योंकि वे जानते थे
    कि क्रन्तिकारी तरीकों से हीं अंग्रेजों के चंगुल से देश को जल्द-से-जल्द आजाद करवाया जा सकता है.
    आजादी माँगने से नहीं मिलेगी, आजादी को अंग्रेजों से छिनना पड़ेगा.
  • वे चाहते थे कि अंग्रेज डर से भारत छोड़कर चले जाएँ. सुभाष और अनेक नौजवानों ने दिन-रात, सुख-दुःख देखे
    बिना निरंतर काम किया.
  • सुभाष ने बंगाल को जगा दिया, और देखते हीं देखते क्रान्ति के अग्रदूत बन गए.
  • विरोधियों से भी अपनी बात मनवा लेने की अद्भुत कला शायद सुभाष से बेहतर किसी को नहीं आती थी.
  • गाँधी जी के द्वारा असहयोग आन्दोलन बीच में हीं रोक देने से सुभाष बहुत दुखी हुए.
  • 25 October 1924 को सुभाष को अंग्रेजों ने मांडले कारावास में बंद कर दिया.
  • 1938 में वे Congress के अध्यक्ष बने, लेकिन गाँधी जी के विरोध के चलते उन्होंने जल्द हीं कांग्रेस छोड़ दी.
  • उन्होंने Forward Block नामक Political Party की स्थापना की.

 

  • 1940 में उन्हें फिर कारावास में डाल दिया गया, लेकिन सुभाष के आमरण अनशन के डर से अंग्रेजों ने उन्हें
    कारावास से मुक्त कर दिया.
  • लेकिन उन्हें उनके हीं घर में नजरबंद कर दिया गया, लेकिन वे 26 January 1941 को अपने घर से भाग निकले
    और जर्मनी पहुंच गए.
  • उन्होंने आजाद हिन्द फौज का गठन किया, इस फौज के सैनिकों की संख्या लगभग 40,000 थी.
  • लोगों ने उनके आवाहन पर अपना तन, मन, धन यहाँ तक कि पूरा जीवन राष्ट्र के नाम कर दिया.
  • आजाद हिन्द फौज के झंडे पर बाघ बना हुआ रहता था.
  • “क़दम क़दम बढाए जा”वह जोशीला गीत है जिसे गाकर इसके वीर सिपाही जोश और उत्साह से भर जाते थे.

 

  • 1943 से 1945 तक आजाद हिन्द फौज की सेना ने अंग्रेजों से लड़ाई की, जिससे अंग्रेज विचलित हो गए.
    और उन्हें यह महसूस हो गया कि हम उन्हें भारत को स्वतन्त्रता देनी हीं होगी.
  • विमान दुर्घटना में उनके मृत्यु की बात कही जाती है, लेकिन उनकी मृत्यु का कोई स्पष्ट प्रमाण प्राप्त नहीं है.
    नेताजी की कमी हमेशा खलती रहेगी, वे शायद एक मात्र सर्वमान्य नेता थे. यह भारत का दुर्भाग्य हीं है कि
    आजादी के बाद सुभाष न जाने कहाँ खो गए. वरना उस अद्भुत नेतृत्व कर्ता के लिए क्या असम्भव हो सकता था,
    जिसने गुलामी के दिनों में 50,000 लोगों की सशस्त्र सेना तैयार कर दी थी. सुभाष से बेहतर विदेश निति किसकी
    हो सकती है ? जब देश किसी भी विपदा में घिर जाता है तो सहसा सुभाष की कमी खलने लगती है.
  • Subhash Chandra Bose par Kavita | सुभाषचंद्र बोस पर छोटी लेकिन अद्भुत कविता

 

Rani Padmini History in Hindi रानी पद्मिनी का जौहर rani padmini ka johur

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Rani Padmini History in Hindi

 

  • रानी पद्मिनी के पिता का नाम गंधर्वसेन था.

 

  • रानी पद्मिनी की माँ का नाम चंपावती था.
  • पद्मिनी अद्भुत सुन्दर थी, उनकी सुन्दरता के चर्चे हर ओर थे.

  • रानी पद्मिनी की शादी के लिए उनके पिता ने स्वयंवर आयोजित किया था.
  • इसी स्वयंवर में चित्तौड़ के राजा रत्न सिंह के साथ रानी पद्मिनी की शादी हुई थी.
  • पद्मिनी की सुन्दरता के बारे में सुनकर अलाउद्दीन खिलजी, रानी पद्मिनी को पाने के लिए बेचैन हो उठा था.
    और उसने रानी को पाने के लिए चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया.
  • उसने चितौड़ के किले को कई महीनों तक घेरे रखा. लेकिन चित्तौड़ के वीर सैनिकों के कारण वह चित्तौड़
    पर विजय नहीं पा सका.
  • तब उसने छल से काम लेने की बात सोची. उसने राजा रत्न सिंह के पास संदेश भेजा कि हमने चित्तौड़ के रानी की सुन्दरता के बारे में बहुत सुना है, आप एक बार हमें रानी को देखने दीजिए. तो हम किले से हट जायेंगे.
  • राजा-रानी यह प्रस्ताव सुनकर बहुत क्रोधित हुए. लेकिन इतनी छोटी सी बात के कारण चित्तौड़ के
    सैनिकों का खून वे नहीं बहाना चाहते थे. इसलिए उन्होंने कहा कि खिलजी आईने में रानी का चेहरा देख सकता है.
  • आईने में रानी का चेहरा दिखाया गया, लेकिन रानी को देखने के बाद उसके मन में छल समा गया.
    अलाउद्दीन खिलजी ने राजा रत्न सिंह को धोखे से बन्दी बना लिया.
  • अलाउद्दीन खिलजी ने रानी के सामने शर्त रखी कि अगर रानी पद्मिनी खुद को उसे सौंप दे, तो राजा
    रत्न सिंह को वो छोड़ देगा.
  • रानी ने खिलजी को कहा कि, वह अपनी सात सौ दसियों के साथ खिलजी के सामने आने से पहले अपने
    पति से एक बार मिलना चाहती है.
  • खिलजी ने रानी का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया.
  • रानी ने सात सौ पालकियों में राजपूत सैनिकों को बिठाया, और पालकी उठाने का काम भी उन्होंने वीर सैनिकों से हीं करवाया.
  • अलाउद्दीन खिलजी के शिविर के पास पहुँचने पर वे सभी वीर सैनिक, यवन सेना पर टूट पड़े. खिलजी को इस हमले की उम्मीद नहीं थी, इसलिए उसके सैनिक विचलित हो गए.
  • रानी ने राजा रत्न सिंह को आजाद करवा लिया.
  • इसके बाद रानी पद्मिनी ने जौहर करने का निश्चय किया. रानी के साथ 16,000 वीरांगनाओं ने जौहर करने का निश्चय किया.
  • एक विशाल चिता सजाई गई, रानी पद्मिनी और 16,000 वीरांगनाओं ने अपने परिवार वालों से अंतिम बार
    मुलाकात की. फिर वे वीरांगनाएं जलती चिता में कूद पड़ी.

 

  • रानी पद्मिनी और 16,000 वीरांगनाओं के जौहर ने चित्तौड़ की मिट्टी को हमेशा के लिए पावन बना दिया.
  • इसके बाद 30,000 वीर सैनिक अलाउद्दीन की सेना पर टूट पड़े. भयंकर लड़ाई हुई,
    अंत में खिलजी चित्तौड़ के किले में प्रवेश करने में सफल हुआ. लेकिन किले के भीतर उसे कोई नहीं मिला.
    स्त्रियाँ जौहर कर चुकी थी और पुरुष शहीद हो चुके थे.
  • रानी पद्मिनी के जौहर की जीत हुई थी, और यह जौहर हमेशा भारतवासियों को इस बात की याद दिलाती
    रहेगी कि भारत की स्त्रियों के लिए उनका सम्मान सर्वोपरी है.

 

Raksha Bandhan Essay in Hindi रक्षाबंधन पर निबन्ध rakhi par Nibandh or 10 lines

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  • रक्षा बंधन

 

  • रक्षाबंधन का त्यौहार देश के महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक है. भारत वर्ष में तीज-त्यौहारों का मेला पूरे वर्ष भर लगा रहता है ताकि प्रेम सौहार्द की बेला कायम रहे. उनमें Raksha bandhan अपने हीं सौन्दर्य में रंगा हुआ, एक अनूठा उत्सव है. यह भाई-बहन के अटूट रिश्ते का त्यौहार है. इस त्यौहार के कारण भाई-बहन में एक-दूसरे के प्रति अपने कर्तव्य का आभास होता है, एक जिम्मेदारी का भाव आता है. सभी त्यौहार सामाजिक व्यवस्था को सुचारू बनाने एवं भावनात्मक दृष्टि से जुड़े रहने का सन्देश देते हैं.
    कब मनाया जाता है रक्षा बंधन ?
    राखी का यह पवित्र त्यौहार पवित्र सावन के महीने में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है.
    पौराणिक कथा :
    सभी त्यौहारों के पीछे उसका महत्व अर्थात कहानी छिपी होती है, जो हमें उस त्यौहार का हमारे जीवन में मूल्य तथा महत्व बताती है. साथ ही त्यौहार के इतिहास को हमारे सामने रखती है.
  • विष्णु भगवान के वामन अवतार के समय की कहानी है. राजा बलि ने अपने बल से पृथ्वी सहित तीनों लोकों को जीत लिया. इस प्रकार तीनों लोकों में उसका आधिपत्य हो गया. इंद्र देव ने इससे भयभीत होकर भगवान विष्णु को कोई उपाय करने कहा. विष्णु जी वामन अवतार लेकर राजा बलि के द्वार पर गये. ब्राहमण को द्वार पर देखकर राजा बलि ने उनसे कुछ भी मांगने का आग्रह किया, तो वामनरूपी भगवान विष्णु ने तीन पग भूमि माँगी. जिसके बदले में राजा बलि ने वामन देव को आशीर्वाद स्वरूप सदा उनके पास रहने का वचन लिया. वामन देव ने अपने रूप (आकर) को बढ़ाकर तीन पग में धरती, आकाश और पाताल को अपने आधीन कर लिया और बदले में राजा बलि को खुद को सौंप दिया.  यह देख माता लक्ष्मी चिंतित हो गई. और उन्होंने सावन की इस पूर्णिमा के दिन राजा बलि को रक्षासूत्र बांधा और बदले में अपने पति को लेकर चली गई. इस प्रकार माता लक्ष्मी ने राजा बलि को भाई बनाया और भाई बलि ने बहन लक्ष्मी की इच्छा पूरी की.
    इस तरह की कई कहानियाँ हमारे इतिहास में हैं जो राखी के इस त्यौहार का महत्व बताती है.
    कैसे मनाते हैं रक्षाबंधन ?
  • सावन की पूर्णिमा को बहनें जल्दी से स्नान कर पूजा करती हैं, सबसे पहले भगवान को राखी बंधती हैं.
  • फिर थाल तैयार की जाती है जिसमें कुमकुम, चावल, दीपक, राखी, रुमाल, श्री फल एवं मिष्ठान रखे जाते हैं.
  • भाई को रुमाल देकर उसके दाहिने हाथ में श्री फल दिया जाता है. श्री फल पर पहले ही कुमकुम एवं चावल लगाया जाता है.
  • इसके बाद भाई के माथे पर तिलक एवम चावल लगाया जाता है. उसके दाहिने हाथ पर राखी बाँधकर उसकी आरती उतारी जाती है.

 

 

PV Sindhu Biography in Hindi – पी. वी. सिन्धु की प्रेरणादायक जीवनी कहानी

 PV Sindhu Biography in Hindi – PV Sindhu Biography in Hindi – पी. वी. सिन्धु की जीवनी – PV Sindhu Biography in Hindi – PV Sindhu Biography in Hindiपी. वी. सिन्धु की जीवनी - PV Sindhu Biography in Hindi

 

  • पी.वी. सिंधु अब कौन नहीं जनता इन्हें. पी.वी. सिंधु वो बैडमिंटन खिलाड़ी हैं जिन्होंने अपना नाम भारत में ही नहीं, बल्कि भारत का नाम पूरे विश्व में रोशन किया है.

 

  • PV Sindhu विश्व वरीयता प्राप्त भारत की महिला बैडमिंटन खिलाड़ी हैं. जिन्होंने 2016 में रियो ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया है.
  • पी.वी. सिंधु जिनका जन्म 5 जुलाई 1995 को हैदराबाद, तेलंगाना में हुआ.

  • पी.वी. सिंधु के पिता का नाम पी. वी. रमण है. जो कि बॉलीबाल के राष्ट्रीय खिलाड़ी रह चुके हैं.
    और पी.वी. सिंधु की माता जी का नाम पी. विजया है. उनकी माता जी भी एक बॉलीबाल खिलाड़ी थी.
    उनके पिता जी को भारत सरकार द्वारा सन 2000 में अर्जुन पुरस्कार दिया गया.
  • माता और पिता जी दोनों हीं वॉलीबाल खिलाड़ी रहे और उनका सपना भी यही था कि उनकी बेटी भी इस खेल को अपनाये. लेकिन पी.वी. सिंधु शीर्ष बैडमिंटन खिलाड़ी पुलेला गोपीचंद से बहुत प्रभावित थी.
    जब वह 6 साल की थी तब पुलेला ने ऑल इंग्लॅण्ड ओपन चैंपियनशिप जीती थी. जिससे पी.वी. सिंधु बहुत प्रोत्साहित हुई.
    और उनकी रूचि बैडमिंटन में ज्यादा थी.
  • पी.वी. सिंधु की छोटी बहन पी.वी. दिव्या हैं.
  • सिंधु की रूचि बैडमिंटन में थी और 8 साल की उम्र से पी.वी. सिंधु ने बैडमिंटन के प्रशिक्षण की शुरुआत की.
  • पी.वी. सिंधु के प्रथम गुरु महबूब अली रहे. उन्होंने ही शुरुआत में पी.वी. सिंधु को बैडमिंटन सिखाया.
  • उसके बाद उनके माता पिता ने उनका दाखिला पुलेला गोपीचंद अकादमी में करा दिया.
    और फिर वह अपनी पढ़ाई के साथ साथ बैडमिंटन में भी महारत हासिल करने लगीं.
  • उनके लिए पुलेला गोपीचंद उनके कोच ने भी यह कहा कि पी.वी. सिंधु की एक बहुत ही ख़ास बात यह है कि
    वह कभी हार नहीं मानती और कोशिश करती रहती हैं .
  • उनका कोचिंग उनके घर से 56 किलोमीटर दूर होने के बावजूद भी पी.वी. सिंधु हमेशा अपने समय पर आती थी. इसी से पता चलता है. कि वह अपने खेल के प्रति कितना समर्पित हैं.

  • अपनी इस छोटी सी उम्र में भी पी.वी. सिंधु बहुत बड़ी-बड़ी सफलताएं हासिल कर चुकी हैं.
  • जूनियर एशियन बैडमिंटन चैंपियन 2009 में सिंधु ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कांस्य पदक जीता.
  • वर्ष 2010 में सिंधु उबर कप में इंडियन नेशनल टीम की मेंबर भी रहीं. और 2010 में ईशन फज्र इंटरनेशनल बैडमिंटन चैलेंज में सिल्वर मेडल जीता.
  • साल 2012 में पी.वी. सिंधु ने चाइना की ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट Li Xuerui को सुपर सिरीज़ टूर्नामेंट
    लन्दन में हराकर सबको चौंका दिया. और 2012 में वह अपने करियर की बेस्ट रैंकिंग 15 पर पहुंची.
  • 2013 में सिंधु ने wang shixian चाइनीज़ खिलाड़ी को world championship में हराया और
    भारत की महिला सिंगल की पहली मेडलिस्ट बनी.
  • अपने खेल के लगातार बेहतरीन प्रदर्शन से 2013 में उन्हें अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया.
  • पी.वी. सिंधु ने कई जगह जीत को साकार किया तो कहीं हार का भी सामना करना पड़ा.
    साल 2014 में Glassglow Commonwealth Games में वूमेन्स सिंगल सेमीफाइनल स्टेज तक
    पहुँचने के बाद उन्हें हार का सामना करना पड़ा.
  • पी.वी. सिंधु ने वर्ल्ड बैडमिंटन चैंपियनशिप में लगातार 2 मेडल जीते और इतिहास रचकर भारत की ऐसी पहली महिला बनीं.
  • मकाउ ओपन ग्रैंड प्रिक्स गोल्ड में नवंबर 2015 को उन्होंने अपना तीसरा वुमेन्स सिंगल जीता.
  • 2016 की शुरुआत में ही जनवरी 2016 को मलेशिया मास्टर्स ग्रैंड प्रिक्स गोल्ड वुमेन्स सिंगल जीता.

 

  • पी.वी. सिंधु प्रीयिमर बैडमिंटन लीग में चेन्नई समशेर टीम की कप्तान बनी और टीम को 5 मैच जिताये.
    और इसी के साथ टीम को सेमीफाइनल तक पहुँचाया. परंतु यह टीम फाइनल में देल्ही एसर्स से हार गयी.
  • साल 2016 में ब्राज़ील के रियो डि जेनेरियो में आयोजित ओलंपिक खेलों में पी.वी. सिंधु ने भारत की ओर से खेलकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिया.

  • पी.वी. सिंधु ने वुमेन्स सिंगल सेमीफाइनल में जापान की नोज़ोमी ओकुहरा को सीधे सेटों में हराया और
    फाइनल में अपनी जगह सुरक्षित की.

 

  • लेकिन सिंधु विश्व की प्रथम वरीयता प्राप्त खिलाड़ी स्पेन की केरोलिना मेरीन को फाइनल्स में नहीं हरा पायीं.
    पर भारत के लिए सिल्वर मेडल जीतकर उन्होंने भारत का नाम पुरे विश्व में रोशन किया.
  • पी.वी. सिंधु ने बहुत से पुरस्कार जीते, वर्ष 2013 में उन्हें अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया.
    और 2014 में FICCI के महत्वपूर्ण खिलाड़ी का सम्मान तथा NDTV इंडियन ऑफ़ द इयर से सम्मानित किया गया.
  • साल 2015 में पी.वी. सिंधु को ‘पद्म श्री’ अवॉर्ड से सम्मानित किया गया.
  • रियो rio ओलंपिक में सिल्वर पदक जितने के बाद तो पी.वी. सिंधु पर जैसे पुरस्कार की बारिश होने लगी.
    उनकी उपलब्धियां देखने के बाद अनेक देशों की सरकारों ने उन्हें करोड़ो रूपए की राशि इनाम में देने का निश्चय किया.
    तथा आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा हज़ार गज ज़मीन तथा A-Grade की सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया गया.

 

नरेन्द्र मोदी की जीवनी – Narendra Modi Biography in Hindi Language

Narendra Modi Biography in Hindi Language – नरेन्द्र मोदी की जीवनी – Narendra Modi Biography in Hindi Language – Narendra Modi Biography in Hindi Language
नरेन्द्र मोदी की जीवनी - Narendra Modi Biography in Hindi Language

 

  • श्री नरेन्द्र मोदी एक जज्बा, एक अभियान का नाम हैं आज. उनके व्यक्तित्व का लोहा पूरी दुनिया मानती है, करोड़ो भारतीयों की आशाएँ जुड़ी हैं उनसे… युवा वर्ग उन्हें अपना आर्दश मानता है. उनका जीवन आज एक उदाहरण है.
  • 2014 के चुनावों में श्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का नेतृत्व कर पूर्ण बहुमत से जीत दिलायी थी और 26 मई 2014 को उन्होने भारत के प्रधानमंत्री के तौर में शपथ लेकर भारत के पंद्रहवें (15वें) और पहले ऐसे प्रधानमंत्री बने जिनका जन्म देश स्वतंत्र होने के बाद हुआ.

 

  • उनका जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था संघर्षों के साथ उनका बचपन बीता, जिस वजह से उन्होने जीवन की कठीनाईयों को काफी करीब से जाना और समझा. एक चाय बेचने वाले साधारण से लड़के से एक अद्भुत व्यक्तित्व बनने का ये सफर एक मिसाल है.
  • जिसकी शुरुआत गुजरात के वाडनगर से हुई. 17 सितम्बर 1950 को एक छोटे से कस्बे वाडनगर, बाम्बे स्टेट (वर्तमान गुजरात) में श्री नरेन्द्र मोदी का जन्म माता हीराबेन मोदी और पिता दामोदरदास मुलचंद मोदी की तीसरी संतान के रूप में हुआ. श्रीनरेन्द्र मोदी कुल छः भाई-बहन हैं.
  • श्री मोदी का परिवार पिछड़े हुए घांची तेली समुदाय से आता है. उनका पूरा परिवार एक कच्चे मकान में रहा करता था.
  • उनकी माता आस-पड़ोस के घरों के बर्तन साफ किया करती थीं और पिता रेलवे स्टेशन में चाय की दुकान लगाते थे. मोदी भी उनकी मदद किया करते थे, आती-जाती रेलों की बोगीयों में चाय बेचा करते थे, बाद में अपने भाई के साथ बस स्टैण्ड में उन्होने चाय की दुकान लगाना शुरू किया, इसके साथ ही वे अपनी पढ़ाई-लिखाई का भी पूरा ध्यान रखते थें. उन्हे पढ़ने का बहुत शौक था . उनके शिक्षक बताते हैं कि वो एक साधारण छात्र हुआ करते थे लेकिन शुरुआत से ही वे वाद-विवाद की कला में माहिर हुआ करते थे, एक कुशल वक्ता और नेतृत्व की क्षमता उनमें नजर आती थी. वे नाटकों और भाषणों में बड़ी रुचि से हिस्सा लिया करते थे, खेलकूद भी काफी प्रिय था उन्हें.
  • बचपन से ही उनमें देशभक्ति की भावना थी जो कई अवसरों में सामने भी आई. छोटी आयु से ही उन्होने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) के स्थानीय शाखा में भाग लेना शुरु कर दिया था वहाँ उनकी मुलाकात लक्ष्मण रॉव इनामदार से हुई जिन्हे वकील साहब के नाम से भी जाना जाता था उन्होने मोदी को बाल स्वयंसेवक (junior cadet) का कार्य सौंपा और फिर उनके राजनैतिक मार्गदर्शक बने. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक ऐसा संगठन है जो देश के सांस्कृतिक और आर्थिक विकास हेतु कार्य करता है.
  • छोटी आयु में ही उनका विवाह स्थानीय जशोदाबेन से करवा दिया गया था, जो ज्यादा समय तक नहीं टिक पाया. उसी वक्त श्रीमोदी की स्कूली शिक्षा पूर्ण हुई थी, 1967 में उन्होने घर छोड़ दिया और हिमालय जाकर 2 वर्षों तक साधुओं की तरह जिन्दगी बिताई, आध्यात्मिक यात्राएँ की जिसमें ॠषिकेश, बंगाल में रामकृष्ण आश्रम और पूर्वोत्तर की यात्राएँ शामिल है. इन यात्राओं के दौरान उन्हे स्वामी विवेकानन्द को गहराई से समझने का अवसर प्राप्त हुआ जिससे उनमें उनके विचारों में कई परिवर्तन आएँ. यहाँ से उनके जीवन की एक नई और अद्भूत यात्रा प्रारंभ हुई…
  • 2 वर्ष बाद वो में वाडनगर वापस आए पर कुछ समय के लिए, उन्होने फिर घर छोड़ अहमदाबाद का रुख कर लिया और 1971 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पूर्ण प्रचारक बन गए अपना सारा समय वहीं देना शुरू कर दिया. 1978 में वे स्वयं सेवक संघ के सम्भाग प्रचारक बने और राजनिति विज्ञान (pollitical science) में दिल्ली विश्वविधालय से स्नातक की डिग्री ली और फिर 5 वर्ष बाद 1982 में राजनिति विज्ञान से ही मास्टर की डिग्री गुजरात विश्वविधालय से प्राप्त की.
  • 1975-1977 के आपातकाल के दौरान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसी संस्थाओं में प्रतिबंध लगा दिया गया था. जिसकी वजह से उन्हें छिपकर भेष बदल कर रहना पड़ रहा था पर उन हालात में भी तत्कालिन सरकार की गलत नीतियों का विरोध करना जारी रखा, पर्चे छापकर और लोगो में बाँटकर उन्होने अपने प्रबंध कौशल और बुद्धिमत्ता का परिचय दिया था और जिसने उनके नेतृत्व क्षमता का और विकास किया उनकी सराहना भी हुई.
  • वे 1985 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़े और 1987 में गुजरात के प्रदेश सचिव बने. फिर अहमदाबाद के नगर निगम के चुनाव में उन्होने भाग लिया जिसमें पहली बार भाजपा को जीत हासिल हुई.

 

  • उन्होने 1990 में श्री लालकृष्ण आडवाणी के अयोध्या रथ-यात्रा का भव्य आयोजन किया ये उनका पहला राष्ट्रीय स्तर कार्य था, जिससे देश के वरिष्ठ नेताओं का ध्यान उनपर गया.
  • धीरे-धीरे उनका कद भाजपा में बढ़ता गया, 1995 में भाजपा के राष्ट्रीय सचिव बने और नई दिल्ली से हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के कार्य-भार सम्भालने लगे. 1998 में भाजपा के प्रमुख सचिव बने और उस समय के लोकसभा चुनाव में भाजपा को जीत हासिल करने में मदद की.
  • 2002 के गुजरात सभा चुनाव में भाग लेते हुए राजकोट से जीतकर वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने.
  • उनकी सरकार को 2002 के गुजरात दंगे पर सही नियंत्रण नीति ना अपनाए जाने का जिम्मेदार ठहराया गया, जो गोधरा में हिन्दु तीर्थयात्रीयों को ट्रेन में जलाए जाने के आक्रोश का नतीजा था.

 

  • हालांकि बाद में उन्हे सर्वोच्च न्यायलय से बरी (क्लीन चीट) कर दिया गया पर्याप्त सबूत ना मिलने के आधार पर.
  • जिसकी वजह से उन्हे पद से इस्तिफा देने के लिए मजबूर किया गया विपक्षी दलों के द्वारा. पर दिसम्बर 2002 में ही वो वापस चुनाव जीतकर गुजरात के मुख्यमंत्री बने, लगातार 12 साल तक वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने रहें.
  • वहाँ के विकास के लिए उन्होने कई योजनाएँ लागू की और गुजरात को आर्थिक तौर पर मजबूत किया. वहाँ के सभी गाँवो में बिजली पहुँचाने से लेकर कृषि उत्पाद को बढ़ावा देने जैसे और भी कई कार्य किए, विदेशी निवेश को सफलता पूर्वक गुजरात लाने में भी कामयाब रहें. भाजपा को उनके इन कार्यों से काफी सहायता मिली.

 

विराट कोहली की जीवनी – Virat Kohli Biography in Hindi Language

Virat Kohli Biography in Hindi Language – Virat Kohli Biography in Hindi Language – Virat Kohli Biography in Hindi Language
विराट कोहली की जीवनी - Virat Kohli Biography in Hindi Language

 

  • विराट कोहली Indian cricket team के प्लेयर हैं.
  • इन्हें भविष्य का सचिन भी कहा जाने लगा है.
    ये बहुत आक्रमक बैट्समैन हैं.
  • विराट का जन्म 5 नवंबर 1988 को दिल्ली में हुआ था.

  • इनका पूरा नाम विराट प्रेम कोहली है. उनका निक नेम चीकू है.
  • उनके पिता प्रेम कोहली एक क्रिमिनल वकील थे.
    और उनकी माता का नाम सरोज कोहली है और वे एक गृहिणी हैं.

 

  • विराट को क्रिकेट बचपन से ही बहुत पसंद था, वह बचपन से अपने पिता के साथ क्रिकेट खेला करते थे.
  • विराट कोहली ने अपनी पढ़ाई विशाल भारती पब्लिक स्कूल से की है.
  • उनके पिता के दोस्त के कहने पर विराट के पिताजी ने उनका अड्मिशन Delhi Cricket Academy में कराया था. उनके दोस्त ने उन्हें सलाह दी के विराट के इस टैलेंट को इसी तरह गलियो में वेस्ट न करें.
  • विराट के पहले कोच/मेंटर राज कुमार शर्मा जी थे.

    जिन्होंने विराट का पूरा जीवन बदल दिया. यहाँ तक की विराट का चीकू नाम भी उन्होंने ही रखा.

  • 9वीं कक्षा में उन्हें सेंत सेवियर कान्वेंट स्कूल में डाला गया ताकि उन्हें क्रिकेट के प्रशिक्षण में सहायता मिल सके.
  • 18 दिसम्बर 2006 को ब्रेन स्ट्रोक की वजह से विराट के पिता की म्रत्यु हो गयी. पिताजी की म्रत्यु के बाद उन्हें बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ा.

  • विराट कोहली ने एक साक्षात्कार में बताया कि युवा दिनों में ही पिताजी को खोने के बाद उनका पारिवारिक व्यवसाय ठीक नहीं चल रहा था. जिसकी वजह से उन्हें किराये के घर में भी रहना पड़ा.
  • जब 2006 में विराट कर्नाटक के खिलाफ रणजी ट्राफी के लिए खेल रहे थे. तब उन्हें उनके पिता की म्रत्यु का पता चला. लेकिन विराट ने पहले अपने मैच को पूरा किया फिर वे अपने घर दिल्ली गए.
  • विराट कोहली दायें हाथ से खेलने वाले बैट्समैन हैं.
  • वह अभी इंडियन टेस्ट क्रिकेट टीम के कप्तान हैं. और वन-डे क्रिकेट की भारतीय टीम के उप-कप्तान हैं.
  • वह इंडियन क्रिकेट के अंडर-19 टीम के भी कप्तान रहे हैं. जिसने 2008 में मलेशिया के अंडर-19 विश्वकप में इतिहास रचाया.
  • विराट ने श्रीलंका के विरूद्ध अपने क्रिकेट के करियर की शुरुआत की.

  • शुरूआती दौर में विराट को आरक्षित खिलाड़ी के रूप में टीम में रखा जाता था. पर उन्होंने अपने टैलेंट से क्रिकेट के मध्यक्रम में अपने हुनर को साबित किया.
  • जब 2011 में भारत ने विश्वकप जीता तब विराट कोहली भी उस टीम का हिस्सा थे.
  • 2011 में अपना पहला टेस्ट मैच विराट ने वेस्ट इंडीज के खिलाफ खेला.

  • उन्होंने 2013 में ऑस्ट्रेलिया और साऊथ अफ्रीका में शतकों की वजह से उन्हें “वन-डे स्पेशलिस्ट” भी कहा जाने लगा.
  • वह वन-डे रैंकिंग में शीर्ष स्थान पर रहे तथा उन्होंने 20-20 मैच में भी सफलता हासिल की. और ICC में सर्वश्रेष्ठ 20-20 बैट्समैन की लिस्ट में भी शीर्ष स्थान पर रहे.
  • जब 2014 में धोनी ने Test Matches से संन्यास लिया. तब विराट को Test Team की कप्तानी सोंपी गयी.

  • उन्होंने वन-डे क्रिकेट में सबसे तेज़ 5000 रन बनाने का रिकार्ड्स भी बनाया.
  • विराट कोहली पहले ऐसे बल्लेबाज हैं. जिन्होंने 4 साल में 1000 या उससे भी ज्यादा रन वन-डे मैचों में हासिल किये. और साल 2015 में 20-20 मैच में वेह 1000 रन बनाकर दुनिया के सबसे तेज बैट्समैन बने.
  • विराट कोहली ने कई पुरस्कार हासिल किये. 2012 में ICC ODI प्लेयर ऑफ़ द इयर चुना गया.

 

  • BCCI द्वारा 2011-2012 में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेटर बने. उन्हें अर्जुन पुरस्कार भी मिला.
  • UK की एक मैगज़ीन smart pro ने 2014 में विराट कोहली को वर्ल्ड का दूसरा सबसे ज्यादा मार्केटबले इंसान बताया.
  • ये ISL की टीम FC Goa और IPTL फ्रेंचाईज़ी UAE रॉयल्स के सह-मालिक भी रहे.
  • विराट कोहली ने विश्वकप में पहले मैच में शतक बनाया.

  • विराट का शानदार प्रदर्शन अभी भी ज़ारी है.

 

लाला लाजपत राय का जीवन परिचय – Lala Lajpat Rai Biography in Hindi

Lala Lajpat Rai Biography in Hindi – लाला लाजपत राय का जीवन परिचय
Lala Lajpat Rai Biography in Hindi - लाला लाजपत राय का जीवन परिचय

 

  • लाला लाजपत राय भारत के महान क्रांतिकारियों में से एक थे.

 

  • लाला लाजपत राय को ‘पंजाब केसरी’ भी कहा जाता है.
  • लाला लाजपत राय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम दल के प्रमुख नेता थे.
  • उन्हें ‘पंजाब के शेर’ की उपाधि भी मिली थी.
  • उनके दिल में राष्ट्र प्रेम की भावना बचपन से ही अंकुरित हो चुकी थी.
  • लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी, 1865 ई. को फ़रीदकोट जिले के ढुंढिके गाँव ( पंजाब ) में हुआ था.
  • उनके पिता का नाम लाला राधाकृष्ण था. उनके पिता शिक्षक थे.
  • पाँच वर्ष की आयु में लाला लाजपत राय की पढ़ाई शुरू हो गई.
  • 1880 में आगे पढ़ने के लिए वे लाहौर आ गए.
  • उन्होंने 1882 में एफ. ए. की परीक्षा और मुख़्तारी की परीक्षा पास की. यहीं वे आर्य समाज के सदस्य बन गये.
  • लाला लाजपत राय ने एक छोटे वकील के रूप में अपने मूल निवास स्थान जगराँव में ही वकालत आरम्भ कर दी. इसके बाद वे रोहतक चले गए.
  • रोहतक में रहते हुए ही उन्होंने 1885 ई. में वकालत की परीक्षा पास की.
  • 1886 में वे हिसार आए, एक सफल वकील के रूप में 1892 तक वे यहीं रहे और इसी वर्ष लाहौर आये. तब से लाहौर ही उनकी सार्वजनिक गतिविधियों का केन्द्र बन गया.
  • 1886 में डी.ए.वी. कॉलेज लाहौर की स्थापना में लाला लाजपत राय ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
  • इटली के क्रांतिकारी ज्यूसेपे मेत्सिनी को लाजपत राय अपना आदर्श मानते थे.
  • मेत्सिनी द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘ड्यूटीज ऑफ़ मैन’ का लाला लाजपत राय ने उर्दू में अनुवाद किया. इसे उन्होंने लाहौर के एक पत्रकार को पढ़ने के लिए दिया. उस पत्रकार ने उसमें थोड़ा-बहुत संशोधन किया और अपने नाम से छपवा लिया.
  • कांग्रेस के ‘लाहौर अधिवेशन’ को सफल बनाने में लालाजी का ही हाथ था.
  • वे ‘हिसार नगर निगम’ के सदस्य चुने गए थे और फिर बाद में सचिव भी चुन लिए गए.
  • जब देश के कई हिस्सों में अकाल पड़ा तो लालाजी राहत कार्यों में सबसे ज्यादा सक्रिय नजर आए. लाला जी ने अनेक स्थानों पर अकाल में शिविर लगाकर लोगों की सेवा की.
  • लाला लाजपत राय ने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और विपिनचन्द्र पाल के साथ मिलकर कांग्रेस में उग्र विचारों का प्रवेश कराया.
  • इन तीनों की जोड़ी लाल-बाल-पाल के नाम से प्रसिद्ध हुई. ये तीनों कांग्रेस के गर्म दल के नेता थे.
  • 1907 में पंजाब के किसानों के प्रदर्शन में लालाजी और सरदार अजीतसिंह को बर्मा के मांडले जेल में नज़रबंद कर दिया गया. लेकिन लोगों के विरोध के कारण सरकार को अपना यह आदेश वापस लेना पड़ा.

 

  • लाला लाजपत राय ने देशभर में स्वदेशी वस्तुएँ अपनाने के लिए अभियान चलाया.
  • अंग्रेज़ों ने जब 1905 में बंगाल का विभाजन कर दिया तो लालाजी ने सुरेंद्रनाथ बनर्जी और विपिनचंद्र पाल आदि के साथ इस फैसले का जमकर विरोध किया. 3 मई, 1907 को अंग्रेज़ों ने उन्हें रावलपिंडी में गिरफ़्तार कर लिया.
  • लालाजी को 1907 में 6 माह का निर्वासन सहना पड़ा था.
  • 1907 के सूरत के प्रसिद्ध कांग्रेस अधिवेशन में लाला लाजपत राय ने अपने सहयोगियों के द्वारा राजनीति में गरम दल की विचारधारा का सूत्रपात कर दिया था.
  • प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918) के दौरान उन्होने इंग्लैंड और अमेरिका के लोगों को देश की आज़ादी के लिए लोगों को एकजुट किया. वहाँ ‘इण्डियन होमरूल लीग’ की स्थापना की.

 

  • उन्होंने ‘तरुण भारत’ नामक पुस्तक लिखी, जिसे ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था.
  • उन्होंने ‘यंग इंण्डिया’ नामक मासिक पत्र भी निकाला.
  • इसी दौरान उन्होंने ‘भारत का इंग्लैंड पर ऋण’, ‘भारत के लिए आत्मनिर्णय’ आदि पुस्तकें लिखीं.
  • लालाजी परदेश में रहकर भी अपने देश और देशवासियों के उत्थान के लिए काम करते रहे थे. अपने चार वर्ष के प्रवास काल में उन्होंने ‘इंडियन इन्फ़ॉर्मेशन’ और ‘इंडियन होमरूल’ दो संस्थाएं सक्रियता से चलाईं.
  • 1920 में उन्होंने पंजाब में असहयोग आन्दोलन का नेतृत्व किया, जिसके कारण उन्हें 1921 में जेल हुई. उनके नेतृत्व में यह आंदोलन पंजाब में जंगल की आग की तरह फैल गया और जल्द ही वे ‘पंजाब का शेर’ या ‘पंजाब केसरी’ जैसे नामों से पुकारे जाने लगे.

 

  • 1924 में लालाजी कांग्रेस के अन्तर्गत ही बनी स्वराज्य पार्टी में शामिल हो गये और ‘केन्द्रीय धारा सभा के सदस्य चुन लिए गये. जब उनका पण्डित मोतीलाल नेहरू से राजनैतिक मतभेद हो गया तो उन्होंने ‘नेशनलिस्ट पार्टी’ का गठन किया और पुनः असेम्बली में पहुँच गये.
  • अन्य विचारशील नेताओं की भाँति लालाजी भी कांग्रेस में दिन-प्रतिदिन बढ़ने वाली मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति से अप्रसन्नता अनुभव करते थे, इसलिए स्वामी श्रद्धानन्द तथा मदनमोहन मालवीय के सहयोग से उन्होंने ‘हिन्दू महासभा’ के कार्य को आगे बढ़ाया.
  • 1925 में उन्हें ‘हिन्दू महासभा’ के कलकत्ता अधिवेशन का अध्यक्ष भी बनाया गया.
  • सन 1912 में लाला लाजपत राय ने एक ‘अछूत कॉन्फ्रेंस’ आयोजित की थी, जिसका उद्देश्य हरिजनों के उद्धार के लिये ठोस कार्य करना था.
  • उन्हीं के प्रयासों से 1926 ई. में ‘श्रमिक संघ अधिनियम’ पारित किया गया.

 

  • एन. एम. जोशी, लाला लाजपत राय एवं जोसेफ़ बैपटिस्टा के प्रयत्नों से 1920 ई. में स्थापित ‘अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ पर वामपंथियों का प्रभाव बढ़ने लगा.
  • ‘एटक’ (ए.आई.टी.यू.सी) के प्रथम अध्यक्ष लाला लाजपत राय थे. यह सम्मेलन 1920 ई. में बम्बई में हुआ था. इसके उपाध्यक्ष जोसेफ़ बैप्टिस्टा तथा महामंत्री दीवान चमनलाल थे.
  • मांडले जेल में लाला लाजपत राय का किसी से भी किसी प्रकार का कोई संपर्क नहीं था. अपने इस समय लालाजी ने भगवान श्रीकृष्ण, अशोक, शिवाजी, स्वामी दयानंद सरस्वती, गुरुदत्त, मेत्सिनी और गैरीबाल्डी की संक्षिप्त जीवनियाँ भी लिखीं. ‘नेशनल एजुकेशन’, ‘अनहैप्पी इंडिया’ और ‘द स्टोरी ऑफ़ माई डिपोर्डेशन’ उनकी अन्य महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं. उन्होंने ‘पंजाबी’, ‘वंदे मातरम्‌’ (उर्दू) और ‘द पीपुल’ इन तीन समाचार पत्रों की स्थापना करके इनके माध्यम से देश में ‘स्वराज’ का प्रचार किया. लाला लाजपत राय ने उर्दू दैनिक ‘वंदे मातरम्‌’ में लिखा था-

 

  • 3 फ़रवरी, 1928 को साइमन कमीशन भारत पहुँचा, जिसके विरोध में पूरे देश में आग भड़क उठी. लाहौर में 30 अक्टूबर, 1928 को जब लाला लाजपत राय के नेतृत्व में साइमन कमीशन का विरोध कर रहे युवाओं को बेरहमी से पीटा गया. पुलिस ने लाला लाजपत राय पर निर्ममता से लाठियाँ बरसाईं. वे बुरी तरह घायल हो गए. अपने अंतिम क्षणों में उन्होंने कहा था- मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक चोट ब्रिटिश साम्राज्य के क़फन की कील बनेगी.
  • और इस चोट ने कितने ही ऊधमसिंह और भगतसिंह तैयार कर दिए, जिनके प्रयत्नों से हमें आज़ादी मिली.
  • इस घटना के 17 दिन बाद 17 नवम्बर, 1928 को लाला जी की मृत्यु हो गई.
  • लालाजी की मृत्यु से सारा देश उत्तेजित हो उठा और चंद्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव व अन्य क्रांतिकारियों ने लालाजी की मौत का बदला लेने का निर्णय किया. इन्होने 17 दिसंबर, 1928 को ब्रिटिश पुलिस के अफ़सर सांडर्स को गोली से उड़ा दिया. सांडर्स की हत्या के मामले में ही राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह को फ़ाँसी की सज़ा सुनाई गई.

 

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