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हैप्पी बर्थडे पापा कविता – Heart Touching Happy Birthday Papa Poem in Hindi pita

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Heart Touching Happy Birthday Papa Poem in Hindi

 

  • पापा का जन्मदिन

 

  • चलो मिलकर अंधेरे में एक ,
    दीप तो जलाते हैं,
    अपने पापा के खोये हुए,
    सपने को लौटाते है,
    अपनी तनख्वाह की गस्ती में,
    खुशियां डुबो दी,
    अपनी सारी ख्वाहिशों की,
    तिथि ही बदल दी,
    चलो अपनी सफलता के,
    गीत गुनगुनाते हैं
    पापा के जन्मदिन की खुशियां,
    मनाते हैं,
    अपने वक्त को बटोर,
    उपहार रुप में लाया है,
    पापा के ढलते हुए कंधे को,
    नयी उम्मीदों से सजाया है,
    पापा तु जीवन का सारांश है,
    पापा तु ही सारे सवाल का अन्त है,
    ठहर जा तेरे बुझते हुए,
    आंखों में नया ख्वाब तो बसा दूं
    तेरे जन्मदिन की पैगाम,
    सारे शहर को बता दूं।
    – कल्पना झा (बोकारो)
  • paapa ka janmadin

  • chalo milakar andhere mein ek ,
    deep to jalaate hain,
    apane paapa ke khoye hue,
    sapane ko lautaate hai,
    apanee tanakhvaah kee gastee mein,
    khushiyaan dubo dee,
    apanee saaree khvaahishon kee,
    tithi hee badal dee,
    chalo apanee saphalata ke,
    geet gunagunaate hain
    paapa ke janmadin kee khushiyaan,
    manaate hain,
    apane vakt ko bator,
    upahaar rup mein laaya hai,
    paapa ke dhalate hue kandhe ko,
    nayee ummeedon se sajaaya hai,
    paapa tu jeevan ka saaraansh hai,
    paapa tu hee saare savaal ka ant hai,
    thahar ja tere bujhate hue,
    aankhon mein naya khvaab to basa doon
    tere janmadin kee paigaam,
    saare shahar ko bata doon.
    – kalpana jha (bokaaro)
  • नानाजी – दादाजी कविता – Poem On Grandparents in Hindi 

 

रेल यात्रा पर कविता – Poem On Train in Hindi raigadi yatra ka varnan rail journey kavita

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रेल यात्रा पर कविता - Poem On Train in Hindi raigadi yatra ka varnan rail journey kavita

 

  • Poem On Train in Hindi

 

  • ‘इस रेल ने’

    इस रेल ने कितनी कहानियाँ छिपायी होंगी,
    कितने सफर खूबसूरत बने होंगे,
    कितने मुसाफिरों की मंजिलें मिलायी होंगी,
    इस रेल ने कितनी कहानियाँ छिपायी होंगी,
    उस चायवाले नें कितनों को चाय की आदत लगायी होंगी,
    उन चुस्कियों ने कितनी मुलाक़ातें यादगार बनायी होंगी,
    कितने किस्से बने होंगे स्टेशन में इंतेज़ार के वक़्त,
    फिर इस रेल की आवाज़ ने कितनी यादें दोहरायी होंगी,
    इस रेल ने कितनी कहानियाँ छिपायी होंगी…
    कितनों को घर मिले होंगे, कितने बेघर हुए होंगे,
    इन दरवाजों ने कितने अजनबियों को अपनायी होंगी,
    कितने मुसाफ़िर गुम हुए होंगे इस भीड़ में,
    कितनों को नई मंज़िलें दिलायी होंगी,
    इस रेल ने कितनी कहानियाँ छिपायी होंगी ।
    – जया पाण्डेय।

  • is rel ne kahais rel ne kitanee kahaaniyaan chhipaee hogee,
    kitane tren khoobasoorat bhavan,
    kitane musaaphiron kee manjilen milavaee hogee,
    is rel ne kitanee kahaaniyaan chhipaee hogee,
    vah chaayavaale nen eshiyaee ko chaay kee aadat lagaee hogee,
    un chukars ne kitanee mulaakaat kee yaadagaar banaayee hogee,
    kitane kisse banen steshan mein intezaar ke vaqt,
    phir is rel kee aavaaz ne kitanee yaaden doharaee hogee,
    is rel ne kitanee kahaaniyaan chhipaee hogee …
    anubhav karane ke lie ghar mil gaya, kitane beghar de aavaas,
    in daravaaje ne kitane ajanabiyon ko apanaee hogee,
    kitane musaaphir gum ne kaha is bheed mein,
    anubhav naee nyoozeelen viraay hogee,
    is rel ne kitanee kahaaniyaan chhipaee hogee.
    – jaya paandedey.

 

देश प्रेम पर कविता – Desh Prem Par Kavita An inspirational Poem in Hindi For Indians

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देश प्रेम पर कविता - Desh Prem Par Kavita An inspirational Poem in Hindi For Indians

 

  • देश प्रेम पर कविता – Desh Prem Par Kavita

 

  • एक दिन ही सही शहादतों के नाम कर लेना
    मिले कभी भारत माता तो उन्हें प्रणाम कर लेना
    भगत राजगुरु और आजाद जैसा काम कर लेना
    गरीबों में पैसा ना सही शिक्षा ही दान कर लेना
    और करनी हो जब मांग किसी से
    देश में अमन और चैन की मांग कर लेना
    रहे न हिंदू मुस्लिम और सिख इसाई यों में भेदभाव
    दिवाली को ईद और क्रिसमस को रमजान कर लेना
    एक दिन ही सही शहादतों के नाम कर लेना
    मिले कभी भारत माता तो उन्हें प्रणाम कर लेना
    अंबेडकर फुले और सरस्वती जैसे जीवन समाज हित में दान कर लेना
    विवेकानंद को आदर्श तो कलाम को सलाम कर लेना
    मां बहन और बेटी जैसी ही हर नारी का सम्मान कर लेना
    लहराता रहे तिरंगा सदा आसमान में खुद को लक्ष्मीबाई के समान कर लेना
    बनी रहे नारी संस्कृतियों की सदा संपदा भारत माता जैसा अपना परिधान कर लेना
    एक दिन ही सही शहादतों के नाम कर लेना
    मिले कभी भारत माता तो उन्हें प्रणाम कर लेना
    हो जाए जब क्रोध हा भी उस दिन बाबू को याद कर लेना
    मदर टेरेसा जैसा निर्मल हृदय और स्वभाव शांत कर  लेना
    बनी रहे मातृभाषा की शान हमेशा नाम को हिंदी और हिंदी को हिंदुस्तान कर लेना
    देश में सुख-समृद्धि का आह्वान कर लेना
    अपने कर्तव्यों का भली-भांति निर्वहन कर लेना
    और इस आजादी के खातिर वंदे मातरम वंदे मातरम का गुणगान कर लेना
    एक ही सही शहादतों के नाम कर ले ना मिले कभी भारत माता तो उन्हें प्रणाम कर लेना
    – युवा कवियत्री ज्योति दोहरे दिनकर
  • आपको यह कविता (Desh Prem Par Kavita ) कैसी लगी हमें जरुर बताएँ.

 

खुसरो की रचनाएँ – Amir Khusro Poetry in Hindi paheliyan dohe ghazal mukriyan poem

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खुसरो की रचनाएँ - Amir Khusro Poetry in Hindi paheliyan dohe ghazal mukriyan poem

 

  • खुसरो की रचनाएँ

 

  • ■ पहेलियाँ – amir khusro ki paheliyan in hindi with answer puzzles

  • एक गुनी ने ये गुन कीना, हरियल पिंजरे में दे दीना।
    देखो जादूगर का कमाल, डारे हरा निकाले लाल।।
    उत्तर—पान
  • एक परख है सुंदर मूरत, जो देखे वो उसी की सूरत।
    फिक्र पहेली पायी ना, बोझन लागा आयी ना।।
    उत्तर—आईना
  • बाला था जब सबको भाया, बड़ा हुआ कुछ काम न आया।
    खुसरो कह दिया उसका नाँव, अर्थ कहो नहीं छाड़ो गाँव।।
    उत्तर—दिया
  • घूम घुमेला लहँगा पहिने,
    एक पाँव से रहे खड़ी
    आठ हात हैं उस नारी के,
    सूरत उसकी लगे परी ।
    सब कोई उसकी चाह करे है,
    मुसलमान हिन्दू छत्री ।
    खुसरो ने यह कही पहेली,
    दिल में अपने सोच जरी ।
    उत्तर – छतरी
  • खडा भी लोटा पडा पडा भी लोटा।
    है बैठा और कहे हैं लोटा।
    खुसरो कहे समझ का टोटा॥
    – लोटा
  • घूस घुमेला लहँगा पहिने, एक पाँव से रहे खडी।
    आठ हाथ हैं उस नारी के, सूरत उसकी लगे परी।
    सब कोई उसकी चाह करे, मुसलमान, हिंदू छतरी।
    खुसरो ने यही कही पहेली, दिल में अपने सोच जरी।
    – छतरी
  • आदि कटे से सबको पारे। मध्य कटे से सबको मारे।
    अन्त कटे से सबको मीठा। खुसरो वाको ऑंखो दीठा॥
    – काजल
  • एक थाल मोती से भरा। सबके सिर पर औंधा धरा।
    चारों ओर वह थाली फिरे। मोती उससे एक न गिरे॥
    – आकाश
  • एक नार ने अचरज किया। साँप मार पिंजरे में दिया।
    ज्यों-ज्यों साँप ताल को खाए। सूखै ताल साँप मरि जाए॥
    – दीये की बत्ती
  • एक नारि के हैं दो बालक, दोनों एकहिं रंग।
    एक फिरे एक ठाढ रहे, फिर भी दोनों संग॥
    – चक्की
  • खेत में उपजे सब कोई खाय।
    घर में होवे घर खा जाय॥
    – फूट
  • गोल मटोल और छोटा-मोटा,
    हर दम वह तो जमीं पर लोटा।
    खुसरो कहे नहीं है झूठा,
    जो न बूझे अकिल का खोटा।।
    उत्तर – लोटा।
  • श्याम बरन और दाँत अनेक, लचकत जैसे नारी।
    दोनों हाथ से खुसरो खींचे और कहे तू आ री।।
    उत्तर – आरी
  • हाड़ की देही उज् रंग, लिपटा रहे नारी के संग।
    चोरी की ना खून किया वाका सर क्यों काट लिया।
    उत्तर – नाखून।
  • बाला था जब सबको भाया, बड़ा हुआ कुछ काम न आया।
    खुसरो कह दिया उसका नाव, अर्थ करो नहीं छोड़ो गाँव।।
    उत्तर – दिया।

 

  • ■मुकरियाँ amir khusro mukerian with meaning

  • अर्ध निशा वह आया भौन
    सुंदरता बरने कवि कौन
    निरखत ही मन भयो अनंद
    ऐ सखि साजन? ना सखि चंद!
  • शोभा सदा बढ़ावन हारा
    आँखिन से छिन होत न न्यारा
    आठ पहर मेरो मनरंजन
    ऐ सखि साजन? ना सखि अंजन!
  • जीवन सब जग जासों कहै
    वा बिनु नेक न धीरज रहै
    हरै छिनक में हिय की पीर
    ऐ सखि साजन? ना सखि नीर!
  • बिन आये सबहीं सुख भूले
    आये ते अँग-अँग सब फूले
    सीरी भई लगावत छाती
    ऐ सखि साजन? ना सखि पाती!
  • सगरी रैन छतियां पर राख
    रूप रंग सब वा का चाख
    भोर भई जब दिया उतार
    ऐ सखि साजन? ना सखि हार!
  • पड़ी थी मैं अचानक चढ़ आयो
    जब उतरयो तो पसीनो आयो
    सहम गई नहीं सकी पुकार
    ऐ सखि साजन? ना सखि बुखार!
  • सेज पड़ी मोरे आंखों आए
    डाल सेज मोहे मजा दिखाए
    किस से कहूं अब मजा में अपना
    ऐ सखि साजन? ना सखि सपना!
  • बखत बखत मोए वा की आस
    रात दिना ऊ रहत मो पास
    मेरे मन को सब करत है काम
    ऐ सखि साजन? ना सखि राम!
  • सरब सलोना सब गुन नीका
    वा बिन सब जग लागे फीका
    वा के सर पर होवे कोन
    ऐ सखि ‘साजन’ना सखि! लोन(नमक)
  • सगरी रैन मिही संग जागा
    भोर भई तब बिछुड़न लागा
    उसके बिछुड़त फाटे हिया’
    ए सखि ‘साजन’ ना, सखि! दिया(दीपक)
  • राह चलत मोरा अंचरा गहे।
    मेरी सुने न अपनी कहे
    ना कुछ मोसे झगडा-टंटा
    ऐ सखि साजन ना सखि कांटा!

 

  • ■ दो सुखने amir khusro sukhane

  • गोश्त क्यों न खाया?
    डोम क्यों न गाया?
    उत्तर—गला न था
  • जूता पहना नहीं
    समोसा खाया नहीं
    उत्तर— तला न था
  • अनार क्यों न चखा?
    वज़ीर क्यों न रखा?
    उत्तर— दाना न था( अनार का दाना और दाना=बुद्धिमान)
  • सौदागर चे मे बायद? (सौदागर को क्या चाहिए )
    बूचे(बहरे) को क्या चाहिए?
    उत्तर (दो कान भी, दुकान भी)
  • तिश्नारा चे मे बायद? (प्यासे को क्या चाहिए)
    मिलाप को क्या चाहिए
    उत्तर—चाह (कुआँ भी और प्यार भी)
  • शिकार ब चे मे बायद करद? ( शिकार किस चीज़ से करना चाहिए)
    क़ुव्वते मग़्ज़ को क्या चाहिए? (दिमाग़ी ताक़त को बढ़ाने के लिए क्या चाहिए)
    उत्तर— बा —दाम (जाल के साथ) और बादाम
  • रोटी जली क्यों? घोडा अडा क्यों? पान सडा क्यों ?
    उत्तर— फेरा न था
  • पंडित प्यासा क्यों? गधा उदास क्यों ?
    उत्तर— लोटा न था

 

  • ■ढकोसले

  • खीर पकाई जतन से और चरखा दिया जलाय।
    आयो कुत्तो खा गयो, तू बैठी ढोल बजाय, ला पानी पिलाय।
  • भैंस चढ़ी बबूल पर और लपलप गूलर खाय।
    दुम उठा के देखा तो पूरनमासी के तीन दिन।।
  • पीपल पकी पपेलियाँ, झड़ झड़ पड़े हैं बेर।
    सर में लगा खटाक से, वाह रे तेरी मिठास।।
  • लखु आवे लखु जावे, बड़ो कर धम्मकला।
    पीपर तन की न मानूँ बरतन धधरया, बड़ो कर धम्मकला।।
  • भैंस चढ़ी बबूल पर और लप लप गूलर खाए।
    उतर उतर परमेश्वरी तेरा मठा सिरानों जाए।।

 

  • ■ दोहे – amir khusro dohe

  • खुसरो बाजी प्रेम की मैं खेलूँ पी के संग।
    जीत गयी तो पिया मोरे हारी पी के संग।।
  • चकवा चकवी दो जने इन मत मारो कोय।
    ये मारे करतार के रैन बिछोया होय।।
  • उज्जवल बरन अधीन तन एक चित्त दो ध्यान।
    देखन में तो साधु लगे निपट पाप की खान।।
  • श्याम सेत गोरी लिए जनमत भई अनीत।
    एक पल में फिर जात है जोगी काके मीत।।
  • पंखा होकर मैं डुली, साती तेरा चाव।
    मुझ जलती का जनम गयो तेरे लेखन भाव।।
  • नदी किनारे मैं खड़ी सो पानी झिलमिल होय।
    पी गोरी मैं साँवरी अब किस विध मिलना होय।।
  • साजन ये मत जानियो तोहे बिछड़त मोहे को चैन।
    दिया जलत है रात में और जिया जलत बिन रैन।।
  • रैन बिना जग दुखी और दुखी चन्द्र बिन रैन।
    तुम बिन साजन मैं दुखी और दुखी दरस बिन नैंन।।
  • अंगना तो परबत भयो, देहरी भई विदेस।
    जा बाबुल घर आपने, मैं चली पिया के देस।।
  • आ साजन मोरे नयनन में, तोहे पलक ढाप दूँ।
    न मैं देखूँ और न को, न तोहे देखन दूँ।
  • अपनी छवि बनाई के मैं तो पी के पास गई।
    जब छवि देखी पीव की सो अपनी भूल गई।।
  • खुसरो पाती प्रेम की बिरला बाँचे कोय।
    वेद, कुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय।।
  • संतों की निंदा करे, रखे पर नारी से हेत।
    वे नर ऐसे जाऐंगे, जैसे रणरेही का खेत।।
  • खुसरो सरीर सराय है क्यों सोवे सुख चैन।
    कूच नगारा सांस का, बाजत है दिन रैन।।

 

  • ■ ग़ज़ल – amir khusro ghazal

  • ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल,
    दुराये नैना बनाये बतियां |
    कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऎ जान,
    न लेहो काहे लगाये छतियां ||
  • शबां-ए-हिजरां दरज़ चूं ज़ुल्फ़
    वा रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह,
    सखि पिया को जो मैं न देखूं
    तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां ||
  • यकायक अज़ दिल, दो चश्म-ए-जादू
    ब सद फ़रेबम बाबुर्द तस्कीं,
    किसे पडी है जो जा सुनावे
    पियारे पी को हमारी बतियां ||
  • चो शमा सोज़ान, चो ज़र्रा हैरान
    हमेशा गिरयान, बे इश्क आं मेह |
    न नींद नैना, ना अंग चैना,
    ना आप आवें, न भेजें पतियां ||
  • बहक्क-ए-रोज़े, विसाल-ए-दिलबर
    कि दाद मारा, गरीब खुसरौ |
    सपेत मन के, वराये राखूं
    जो जाये पांव, पिया की घतियां ||

 

  • :- मेरी बदहाली से क्यों तुम बेखबर रहते हो यार क्यों चुराते हो नज़र और क्यों  बात बनाते हो। अब मैं ओर जुड़े नही सह सकता मेरी जान अपनी छाती से क्यों नही लगा लेते।जुदाई की रातें तो ज़ुल्फों से भी घनी और लम्बी हैं दिन विसाल-ए-यार का ज़िन्दगी सा छोटा है। अगर मैं पिया को देख नही पाई तो अंधेरी रात कैसे काटूंगी। यकायक ही वो दो जादुई आँखें मेरे दिल का सुकून ले उड़ीं, लेकिन यह फुर्सत किसे है जो मेरे पिया तक मेरी बात पहुँचा दे। जलती हुई शम्मा और हैरान ज़र्रे की माफ़िक मैं इश्क में हमेशा फरियाद कर रहा हूँ। मेरे आंखों में न तो नींद है और न रात में चैन। मेरे पिया खुद आते भी नही और कोई खत भी नही भेजते।महबूब के दीदार के दिन की ख़ुशी का जिसने इतना लम्बा इंतज़ार कराया है, खुसरो, दिल का दर्द दबा के रखूंगी अगर मुझे कोई उस पिया की चालें समझा दे।
  • आपको हमारी यह प्रस्तुति ( Amir Khusro Poetry in Hindi) कैसी लगी जरुर बताएँ.
  • – अंशु प्रिया (Anshu priya)

 

प्यार-इश्क-मोहब्बत पर कविता – Pyar Ki Kavita Ishq Poem Mohabbat Hindi Poetry Prem

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प्यार-इश्क-मोहब्बत पर कविता - Pyar Ki Kavita Ishq Poem Mohabbat Hindi Poetry Prem

 

  • दोस्तों हम आपके लिए लाये हैं प्यार-इश्क-मोहब्बत पर कविता – Pyar Ki Kavita Ishq Poem Mohabbat Hindi Poetry Prem. हमें उम्मीद है कि आपको कविताएँ पसंद आएँगी.
  • Pyar Ki Kavita In Hindi

 

  • __तुम__
    अपना सम्पूर्ण तुम्हे सौंप कर
    जब लेती हूं साँस,
    तुम अंदर भर जाते हो,
    आत्मा तक पैठ जाते हो,
    छू लेते हो रूह को,
    और तब मैं,
    मैं नहीं रह जाती,
    तुम हो जाती हूँ
    जैसे उतार फेंका हो खुद को,
    और दिख पड़ा हो मेरा अंतस
    “तुम”
    – अंशु प्रिया ( Anshu Priya )

 

  • Sachche Pyar ki kavita

    Prem Mohabbat Ishq Poem Kavita

    __प्रेम__
    मैं नहीं जानती की तुम मेरे कौन हो?
    कई बार जब खुद को झिंझोड़ कर
    पूछा है खुद से
    की कौन हो तुम मेरे,
    तो जवाब देने में हमेशा असफल रहती हूँ।
    तुम मेरे पिता नही हो,
    पर मेरा सारा बचपना
    मैं तुम पर ही ज़ाहिर क्यों कर देती हूँ।
    क्यों लगी हर चोट पर तुम्हारी ही पुचकार चाहती हूँ।
    तुम मेरे बच्चे भी नहीं हो,
    पर मेरा सारा दुलार
    तुम पर ही क्यों उमड़ पड़ता है।
    क्यों तुम्हारा सर अपने वक्ष में दुबका कर
    मैं सारी ममता तुम पर उड़ेल देना चाहती हूँ
    तुम मेरे स्वामी भी नही हो,
    पर क्यों मेरा कोई भी फैसला
    मैं तुम्हारे बिना नही ले पाती,
    या यूँ कहूँ लेना नही चाहती।
    क्यों मैं खुद ही तुम्हारी बंदिनी बन जाती हूँ।
    तुम मेरे प्रेमी भी तो नही हो,
    क्योंकि अगर तुम सिर्फ मेरे प्रेमी हो
    तो मेरी बाकी सभी भावनाएँ बेमानी है।
    मैं सिर्फ इतना समझ पाई हूँ,
    की तुम शायद मेरे सबकुछ हो,
    और शायद कुछ भी नहीं,
    तुम सिर्फ  “प्रेम” हो।
    – अंशु प्रिया ( Anshu Priya )

  • प्यार पर 2 बेहतरीन कविताएँ Love Poem in Hindi

 

माँ दुर्गा पर कविता – Poem on Maa Durga in Hindi mata durga kavita navratri lines liner

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माँ दुर्गा पर कविता - Poem on Maa Durga in Hindi mata durga kavita navratri lines liner

 

  • जय माँ दुर्गा – Poem on Maa Durga in Hindi

 

  • जय जगदम्बा जननी माँ दुर्गा भवानी,
    गाए तुम्हारी लीला
    संसार का हर प्राणी।
    तुम वीरों की शक्ति माता,
    कमज़ोरों की हो ढाल।
    तुम जग की करुणामयी माता,
    जगत तुम्हारा लाल।
    जब भी आई है जग पर,
    कोई विपत्ति भारी।
    तुमने आँचल फैला कर,
    हर ली पीड़ा सारी।
    तुम्हारे क्रोध के आगे ,
    देव- दानव काँपे थर थर।
    किंतु ममता छिपी हुई है,
    तेरे क्रोध के भी अंदर।
    तेरी शक्ति से ही शासित,
    है ब्रह्मांड ये सारा।
    जिसका न कोई साथी माता,
    उसका तू है सहारा।
    देवों ने जब पुकार लगाई,
    देख विपत्ति भारी।
    दौड़ी आई रक्षा को माता
    लिये सिंह सवारी।
    देख माता का रौद्र रूप
    महिषासुर घबराया।
    दानवों के प्रकोप से तूने,
    जग को मुक्त कराया।
    काली रूप धर कर तूने ही
    रक्तबीज को हराया।
    माता तेरी शक्ति के आगे
    कोई टिक न पाया।
    है दानव हर गली में माता
    सर्वत्र फैला अंधियारा।
    शक्ति रूप ले कर आओ माता,
    फैला दो उजियारा।
    — अंशु प्रिया (anshu priya)
  • jay maan durga

    • jay jagadamba jananee maan durga bhavaanee,

    gae tumhaaree leela
    sansaar ka har praanee.
    tum veeron kee shakti maata,
    kamazoron kee ho dhaal.
    tum jag kee karunaamayee maata,
    jagat tumhaara laal.
    jab bhee aaee jag par,
    koee vipatti bhaaree.
    tumane aanchal phaila kar,
    har lee peeda sab.
    aap krodh ke aage,
    dev- daanav kaanpe thar thar.
    kintu mamata chhipee huee hai,
    tere krodh ke andar bhee.
    teree shakti se hee shaasit,
    hai brahmaand ye saara.
    jisaka koee saathee maata,
    usaka too sahaara hai.
    devon ne jab pukaar lagaee,
    dekhen vipatti bhaaree.
    doree aaee raksha maata
    sinh sinh savaaree.
    dekh maata ka raudr roop
    mahishaasur ghabaraaya.
    daanavon ke prakop se toone,
    jag ko mukt karaaya.
    kaalee roop dhar kar toone hee
    raktabeej ko haraaya.
    maata teree shakti ke aage
    koee mel nahin mila.
    hai daanav har galee mein maata
    sarvatr phaila andhiyaara.
    shakti roop le kar aao maata,
    phaila do ujiyaara.
    – anshu priya (anshu priya)

  • समय पर 3 कविता | Poem On Time in Hindi | samay par kavita & poerty समय

 

गाँव की याद कविता Poem On Village in Hindi – gaon par kavita village life beauty

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Poem On Village in Hindi - gaon par kavita

 

  • Poem On Village – gaon par kavita

 

  • बदलता गाँव – Village (Hindi Poem)

  • मेरे गाँव में अब सावन की हरियाली नहीं बची,
    यहाँ की सारी रौनक शहर का रुख कर चली,
    यहाँ कागज़ की वो कश्तियाँ सारी डूब पड़ी,
    यहाँ की मिट्टी से वो सौंधी खुशबू छूट चली,
    अब यहाँ त्योहारों की शोरगुल भी नहीं मिली,
    मेरे गांव की सारी गलियाँ अब चुपचाप हो चली,
    मेरे गाँव में अब होली की पिचकारियां नहीं बची,
    मेरे गाँव में अब दीवाली की किलकारियां नहीं बची,
    यहाँ के बसिंदो को शहरों के धूल उड़ा ले गए,
    सुन माटी! यहाँ अब वो माटी के लाल नहीं बचे,
    इस पुराने बरगद की गोद थी बचपन बिताने के लिए
    और वो छुट्टियों के मोहताज हैं अब यहाँ आने के लिए।
    – Jaya Pandey ( जया पाण्डेय )
  • मेरा गाँव – Village Poem – gaon par kavita

  • गांव छोड़ शहर चले हम
    बहुत दूर चले जाएं हम…
    अपने गांव और मकान से……
    एक दृश्य छाया रहता है आंखों में सामने फीकी पड़ जाती है शहर की रौनके है।
    कच्ची गली याद आती है उड़ती धूल याद आती है जिसमें सुबह शाम खेल बढ़े हुए।
    शहर का हर शख्स थका हुआ रहता है।
    पर ना जाने क्यों अमीरी की होड़  कि बाजार में रहता है।
    याद आते हैं वह हरे भरे लहराते खेत…..
    जो पवन आते फसल लहराते देख………
    मन मुक्त हो जाता है देख छटा हरियाली की
    शहर तेरे पास किसी के लिए वक्त नहीं है
    पर मेरा गांव वक्त से भरा हुआ है मिलने मिलाने की रसम दर्पण होती है।
    देख घटा सावन की मन झूम उठा ठंडी हवा के झोंके से……..
    गांव छोड़ शहर चले हम
    बहुत दूर चले आए हम
    अपने गांव और मकान से…….
    – Hansraj Pal

 

भगतसिंह सुखदेव राजगुरु पर कविता – Poem On Bhagat Singh in Hindi sukhdev rajguru

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भगतसिंह सुखदेव राजगुरु पर कविता - Poem On Bhagat Singh in Hindi sukhdev rajguru

 

  • भगत सिंह ऐसे स्वतंत्रता सेनानी हैं, जो आज भी भारतीय को प्रेरित करते हैं. हम आपके लिए लेकर आए हैं भगत सिंह पर कविता. हमें विश्वास है आपको शहीद भगतसिंह की कविता पसंद आएगी.
  • Veer Bhagat Singh Par Kavita – poem on bhagat singh in hindi

 

  • शहीद वीर भगतसिंह
  • युगों तक तेरी कुर्बानी का ज़िकर रहेगा
    ऐ भगत! तेरा इतिहास अमर रहेगा ।
    नज़ारा तेरी शहादत-सा कहीं नहीं,
    ये देश क्रांति का ‘वो’ दीपक ढूंढता है,
    वो मार के भी तुझे मार ना सके,
    लाहौर की गलियों में अब भी ‘इंक़लाब’ गूंजता है,
    युगों तक रहेगा तेरे यौवन का त्याग,
    युगों तक तेरे तूफानी हौसलों का असर रहेगा,
    ऐ भगत! तेरा इतिहास अमर रहेगा ।
    जन्मा था एक वीर, ग़ुलामी से लड़ाई के लिए,
    आँखों में एक आग लिए बुराई के लिए,
    जंजीरों का उसपे ज़ोर कहाँ था जिसने
    अपनी रूह रिहा कर दी वतन की रिहाई के लिए,
    फ़िज़ाओं में तेरी खुशबू अब भी है बाक़ी,
    इस मिट्टी में तेरी सरफ़रोशी का कहर रहेगा,
    ऐ भगत! तेरा इतिहास अमर रहेगा ।
    – जया पाण्डेय (Jaya Pandey)
  • Sheed Bhagat Singh Ki Kavita

  • सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
    देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है ।
    करता नहीं क्यों दूसरा कुछ बातचीत,
    देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल मैं है ।
    यों खड़ा मक़्तल में कातिल कह रहा है बार-बार
    क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है ।
    ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
    अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफिल में है ।
    वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां,
    हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है ।
    खींच कर लाई है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
    आशिकों का आज जमघट कूचा-ऐ-कातिल में है ।
    सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
    देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है ।
    – Poem by Bhagat Singh

 

  • Poem on Bhagat Singh Sukhdev & Rajguru in Hindi

  • आज लग रहा कैसा जी को कैसी आज घुटन है
    दिल बैठा सा जाता है, हर साँस आज उन्मन है
    बुझे बुझे मन पर ये कैसी बोझिलता भारी है
    क्या वीरों की आज कूच करने की तैयारी है?
    हाँ सचमुच ही तैयारी यह, आज कूच की बेला
    माँ के तीन लाल जाएँगे, भगत न एक अकेला
    मातृभूमि पर अर्पित होंगे, तीन फूल ये पावन,
    यह उनका त्योहार सुहावन, यह दिन उन्हें सुहावन।
    फाँसी की कोठरी बनी अब इन्हें रंगशाला है
    झूम झूम सहगान हो रहा, मन क्या मतवाला है।
    भगत गा रहा आज चले हम पहन वसंती चोला
    जिसे पहन कर वीर शिवा ने माँ का बंधन खोला।
    झन झन झन बज रहीं बेड़ियाँ, ताल दे रहीं स्वर में
    झूम रहे सुखदेव राजगुरु भी हैं आज लहर में।
    नाच नाच उठते ऊपर दोनों हाथ उठाकर,
    स्वर में ताल मिलाते, पैरों की बेड़ी खनकाकर।
    पुनः वही आलाप, रंगें हम आज वसंती चोला
    जिसे पहन राणा प्रताप वीरों की वाणी बोला।
    वही वसंती चोला हम भी आज खुशी से पहने,
    लपटें बन जातीं जिसके हित भारत की माँ बहनें।
    उसी रंग में अपने मन को रँग रँग कर हम झूमें,
    हम परवाने बलिदानों की अमर शिखाएँ चूमें।
    हमें वसंती चोला माँ तू स्वयं आज पहना दे,
    तू अपने हाथों से हमको रण के लिए सजा दे।
    सचमुच ही आ गया निमंत्रण लो इनको यह रण का,
    बलिदानों का पुण्य पर्व यह बन त्योहार मरण का।
    जल के तीन पात्र सम्मुख रख, यम का प्रतिनिधि बोला,
    स्नान करो, पावन कर लो तुम तीनो अपना चोला।
    झूम उठे यह सुनकर तीनो ही अल्हण मर्दाने,
    लगे गूँजने और तौव्र हो, उनके मस्त तराने।
    लगी लहरने कारागृह में इंक्लाव की धारा,
    जिसने भी स्वर सुना वही प्रतिउत्तर में हुंकारा।
    खूब उछाला एक दूसरे पर तीनों ने पानी,
    होली का हुड़दंग बन गई उनकी मस्त जवानी।
    गले लगाया एक दूसरे को बाँहों में कस कर,
    भावों के सब बाँढ़ तोड़ कर भेंटे वीर परस्पर।
    मृत्यु मंच की ओर बढ़ चले अब तीनो अलबेले,
    प्रश्न जटिल था कौन मृत्यु से सबसे पहले खेले।
    बोल उठे सुखदेव, शहादत पहले मेरा हक है,
    वय में मैं ही बड़ा सभी से, नहीं तनिक भी शक है।
    तर्क राजगुरु का था, सबसे छोटा हूँ मैं भाई,
    छोटों की अभिलषा पहले पूरी होती आई।
    एक और भी कारण, यदि पहले फाँसी पाऊँगा,
    बिना बिलम्ब किए मैं सीधा स्वर्ग धाम जाऊँगा।
    बढ़िया फ्लैट वहाँ आरक्षित कर तैयार मिलूँगा,
    आप लोग जब पहुँचेंगे, सैल्यूट वहाँ मारूँगा।
    पहले ही मैं ख्याति आप लोगों की फैलाऊँगा,
    स्वर्गवासियों से परिचय मैं बढ, चढ़ करवाऊँगा।
    तर्क बहुत बढ़िया था उसका, बढ़िया उसकी मस्ती,
    अधिकारी थे चकित देख कर बलिदानी की हस्ती।
    भगत सिंह के नौकर का था अभिनय खूब निभाया,
    स्वर्ग पहुँच कर उसी काम को उसका मन ललचाया।
    भगत सिंह ने समझाया यह न्याय नीति कहती है,
    जब दो झगड़ें, बात तीसरे की तब बन रहती है।
    जो मध्यस्त, बात उसकी ही दोनों पक्ष निभाते,
    इसीलिए पहले मैं झूलूं, न्याय नीति के नाते।
    यह घोटाला देख चकित थे, न्याय नीति अधिकारी,
    होड़ा होड़ी और मौत की, ये कैसे अवतारी।
    मौत सिद्ध बन गई, झगड़ते हैं ये जिसको पाने,
    कहीं किसी ने देखे हैं क्या इन जैसे दीवाने?
    मौत, नाम सुनते ही जिसका, लोग काँप जाते हैं,
    उसको पाने झगड़ रहे ये, कैसे मदमाते हें।
    भय इनसे भयभीत, अरे यह कैसी अल्हण मस्ती,
    वन्दनीय है सचमुच ही इन दीवानो की हस्ती।
    मिला शासनादेश, बताओ अन्तिम अभिलाषाएँ,
    उत्तर मिला, मुक्ति कुछ क्षण को हम बंधन से पाएँ।
    मुक्ति मिली हथकड़ियों से अब प्रलय वीर हुंकारे,
    फूट पड़े उनके कंठों से इन्क्लाब के नारे ।
    इन्क्लाब हो अमर हमारा, इन्क्लाब की जय हो,
    इस साम्राज्यवाद का भारत की धरती से क्षय हो।
    हँसती गाती आजादी का नया सवेरा आए,
    विजय केतु अपनी धरती पर अपना ही लहराए।
    और इस तरह नारों के स्वर में वे तीनों डूबे,
    बने प्रेरणा जग को, उनके बलिदानी मंसूबे।
    भारत माँ के तीन सुकोमल फूल हुए न्योछावर,
    हँसते हँसते झूल गए थे फाँसी के फंदों पर।
    हुए मातृवेदी पर अर्पित तीन सूरमा हँस कर,
    विदा हो गए तीन वीर, दे यश की अमर धरोहर।
    अमर धरोहर यह, हम अपने प्राणों से दुलराएँ,
    सिंच रक्त से हम आजादी का उपवन महकाएँ।
    जलती रहे सभी के उर में यह बलिदान कहानी,
    तेज धार पर रहे सदा अपने पौरुष का पानी।
    जिस धरती बेटे हम, सब काम उसी के आएँ,
    जीवन देकर हम धरती पर, जन मंगल बरसाएँ।।
    – Shree Krishna Saral
    आपको हमारी कविताओं (poem on bhagat singh in hindi) का संकलन कैसा लगा, जरुर बताएँ.

 

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