इन्हें भी जरुर पढ़ें ➜
Generic selectors
Exact matches only
Search in title
Search in content
Search in posts
Search in pages

Short Stories in Hindi हिंदी कहानी methods Story women men man naturally ladies female male body churna sanskrit dadima knowledge process calculator which occurs right

सैनिक बाबा हरभजन सिंह की कहानी Baba Harbhajan Singh Story Kahani in Hindi

baba harbhajan singh story in hindi – बाबा हरभजन सिंह स्टोरी इन हिंदी – baba harbhajan singh mystery – baba harbhajan singh shoes – baba harbhajan singh family – baba harbhajan singh image – baba harbhajan singh retirement – baba harbhajan singh story in hindi – baba harbhajan singh story in hindiसैनिक बाबा हरभजन सिंह की कहानी Baba Harbhajan Singh Story Kahani in Hindi

Baba Harbhajan Singh Story Kahani in Hindi

  • दोस्तों यह कहानी है ऐसे सैनिक की जो मृत्यु के बाद भी अपनी ड्यूटी करता है. अलग-अलग लोग इसे विश्वास और अविश्वास की कसौटी पर कसते हैं. आप भी इस पर विश्वास या अविश्वास कर सकते हैं. लेकिन सिक्किम के लोगों और वहां पर तैनात सैनिकों के अनुसार पंजाब रेजिमेंट के जवान हरभजन सिंह की आत्मा पिछले 45 वर्षों से देश के सीमा की रक्षा कर रही है.

 

  • Baba Harbhajan Singh Story in Hindi

  • सैनिकों के अनुसार हरभजन सिंह की आत्मा, चीन की तरफ से होने वाले खतरे के बारे में पहले से ही उन्हें जानकारी से देती है. चीनी सैनिक भी इस पर विश्वास करते हैं इसलिए भारत और चीन के बीच होने वाली फ्लैग मीटिंग में हरभजन सिंह के नाम की एक खाली कुर्सी लगाई जाती है ताकि वो मीटिंग में शामिल हो सकें.
  • Baba Harbhajan Singh Biography : हरभजन सिंह का जन्म 30 अगस्त 1946 को, जिला गुजरावाला जो कि अब पाकिस्तान में है, हुआ था. हरभजन सिंह 24 वीं पंजाब रेजिमेंट के जवान थे, वे 1966 में आर्मी में शामिल हुए थे. अपनी नौकरी के दौरान हीं 1968 में, सिक्किम में एक दुर्घटना में मारे गए. एक दिन वे खच्चर पर बैठकर नदी पार कर रहे थे तभी दुर्भाग्यवश खच्चर सहित नदी में बह गए. नदी में बहकर उनका शव काफी आगे निकल गया. भारतीय सैनिकों द्वारा दो दिन तलाश करने के बाद भी जब उनका शव नहीं मिला तो उन्होंने खुद अपने साथी सैनिक के सपने में आकर अपनी शव की जगह बताई.
  • Baba Harbhajan Singh Story in Hindi
  • सुबह होते हीं सैनिकों ने बताई गई जगह से हरभजन का शव बरामद करके अंतिम संस्कार किया. हरभजन सिंह के इस चमत्कार के बाद साथी सैनिकों की उन पर आस्था बढ़ गई और उन्होंने उनके बंकर को एक मंदिर का रूप दे दिया. जब बाद में उनके चमत्कार बढ़ने लगे और वे ढेरों लोगों की आस्था का केंद्र हो गए तो उनके लिए एक नया मंदिर बनाया गया, जो ‘बाबा हरभजन सिंह मंदिर’ के नाम से जाना जाता है. यह मंदिर गंगटोक में जेलेप्ला दर्रे और नाथुला दर्रे के बीच, 13000 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है. पुराना बंकर वाला मंदिर इससे 1000 फ़ीट ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है. मंदिर के अंदर बाबा हरभजन सिंह की एक फोटो और उनका सामान रखा है.
  • बाबा हरभजन सिंह अपनी मृत्यु के बाद से लगातार ही अपनी ड्यूटी देते आ रहे है. इसलिए उन्हें बाकायदा तनख्वाह भी दी जाती है, नियमानुसार उनका प्रमोशन भी होता है. कुछ साल पहले तक 2  महीने की छुट्टी पर गाँव भी भेजा जाता था.  ट्रैन में सीट रिज़र्व की जाती थी, तीन सैनिको के साथ उनका सारा सामान उनके गाँव भेजा जाता था तथा दो महीने पूरे होने पर फिर वापस सिक्किम लाया जाता था. जिन दो महीने बाबा छुट्टी पर रहते थे उस दरमियान पूरा बॉर्डर हाई अलर्ट पर रहता था क्योकि उस वक़्त सैनिको को बाबा की मदद नहीं मिल पाती थी.
  • Baba Harbhajan Singh Story in Hindi
  • बाबा का सिक्किम से जाना और वापस आना एक धार्मिक आयोजन का रूप लेता जा रहा था जिसमें बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा होने लगे थे. कुछ लोगो ने इस आयोजान को अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला बताकर अदालत का दरवाज़ा खटखटाया. तब से सेना ने बाबा को छुट्टी पर भेजना बंद कर दिया. अब बाबा पूरे साल ड्यूटी में रहते है. मंदिर में बाबा का एक कमरा भी है जिसमे प्रतिदिन सफाई करके बिस्तर लगाए जाते है. बाबा की सेना की वर्दी और जूते रखे जाते है. दूसरे दिन सफाई करने जाने पर उनके जूतों में कीचड़ और चद्दर पर सलवटे पाई जाती हैं.

 

  • लोगो की आस्था का केंद्र है Baba Harbhajan Singh Ka Mandir Kahani : बाबा हरभजन सिंह का मंदिर सैनिकों और लोगों दोनों की आस्था का केंद्र है. इस इलाके में आने वाला प्रत्येक नया सैनिक सबसे पहले बाबा के धोक लगाने आता है. लोगो में मान्यता है कि अगर इस मंदिर में बोतल में भरकर पानी को तीन दिन के लिए रख दिया जाए तो उस पानी में चमत्कारिक औषधीय गुण आ जाते हैं.  इस पानी को पीने से रोग मिट जाते है. इसलिए इस मंदिर में नाम लिखी हुई बोतलों का अम्बार लगा रहता है. यह पानी 21 दिन के अंदर प्रयोग में लाया जाता है और इस दौरान मांसाहार और शराब का सेवन नहीं करना होता है.

 

  • Baba Harbhajan Singh Story in Hindi
  • Baba Harbhajan Singh Ka Bankar Story : बाबा का बंकर, 14000 फ़ीट की ऊंचाई पर है, लाल और पीले रंगो से सज़ा है. सीढ़ियाँ लाल रंग की और पिलर पीले रंग के. सीढ़ियों के दोनों साइड रेलिंग पर नीचे से ऊपर तक घंटिया बंधी हैं. बाबा के बंकर में कॉपियाँ रखी हैं. इन कॉपियों में लोग अपनी मुरादे लिखते है ऐसा माना जाता है कि इनमें लिखी गई हर मुराद पूरी होती है. इसी तरह में बंकर में एक ऐसी जगह है जहाँ लोग सिक्के गिराते है यदि वो सिक्का उन्हें वापस मिला जाता है तो वो भाग्यशाली माने जाते हैं. फिर लोग उसे हमेशा के लिए अपने पर्स या तिजोरी में रख लेते हैं. दोनों जगहों का संचालन आर्मी के द्वारा किया जाता है.
  • आपको यह कहानी ( baba harbhajan singh story in hindi ) कैसी लगी, हमें जरुर बताएँ.
  • 3 देशभक्ति कहानी

 

राखी पर कहानी Raksha Bandhan Story in Hindi – Rakhi Par Ek Heart touching Kahani

raksha bandhan story in hindi – rakhi par kahani – रक्षाबंधन पर कहानी – राखी पर कहानी – raksha bandhan story in hindi – rakhi par kahani – रक्षाबंधन पर कहानी – राखी पर कहानी – raksha bandhan story in hindi – rakhi par kahani – रक्षाबंधन पर कहानी – राखी पर कहानी – raksha bandhan story in hindi – rakhi par kahani – रक्षाबंधन पर कहानी – राखी पर कहानीराखी पर कहानी Raksha Bandhan Story in Hindi - Rakhi Par Ek Heart touching Kahani

राखी पर कहानी Raksha Bandhan Story in Hindi – Rakhi Par Ek Heart touching Kahani

 

  • शीर्षक …..अधूरी कलाई

 

  • ( Raksha Bandhan Story in Hindi )

    “अरे निखिल  जल्दी -जल्दी खाना खा  ले फिर बाजार भी जाना है न !” शिवांगी  ने बेटे निखिल को रसोईघर से
    आवाज देते हुए कहा और खुद गर्मागर्म  पूड़ियाँ  तलने लगीं.
    “अभी आया मम्मी l “निखिल ने अपने कमरे  में से ही बुझी हुई आवाज में कहा l
    “अरे भई जल्दी खाना लगाओ  बड़ी भूँख लगी है l”  निखिल के पापा ने घर में घुसते  ही जोर से कहा l
    “हाँ..हाँ अभी देती  हूँ खाना …मगर अपने साहबजादे  को तो बुलाओ  ..आ ही नहीं रहा है पता नहीं क्या कर रहा है यह लड़का  l ”
    “अरे तुमने  उड़द  की दाल  की कचौड़ी  बनाई  हैं !आज तो आनंद आ गया l ” निखिल के पापा ने नथुने
    फुलाकर सूँघते हुए शरारत से कहा l
    “वैसे तुम्हारी बहिन ने खाना क्यों नहीं खिलाया ?”शिवांगी ने ताना  मारा  l
    “अरे यार तुम्हारे  हाथों का खाना खाने की लत  जो लग गयी है ..अबऔर किसी के हाथ का भाता  ही नहीं l
    निखिल के पापा ने चापलूसी  भरे अंदाज  में कहा तो शिवांगी खुश हो गयी  l
    “,और तुम्हारी भाँजियां खुश हैं ?” शिवांगी ने व्यंगात्मक  लहजे  में कहा सुनकर महेश  के चेहरे की हँसी एकदम  गायब  हो गई  मगर शिवांगी के चेहरे की रौनक बढ़ गई l
    “हाँ ..हाँ ठीक है …ठीकहै .l ” महेश ने इतना ही कहा और डाईनिंग टेबल  पर गुमसुम  से जाकर बैठ  गए l
    कैसे बताते  कि आज शीनू  और शोना  कितना  रोई थीं यह सुनकर कि हर साल बे दोनों निखिल के राखियाँ   बाँधती थीं मगर इस बार ननद  और भाभी की नाक की लड़ाई  में निखिल की कलाई और दोनों बच्चिओं  के अरमान  सूने  रह गए l

 

  • Raksha Bandhan Story in Hindi
  • “अरे आ गया तू  …चलो खाना खाते  हैं !” महेश ने बेटे निखिल से कहा l
    निखिल पापा के हाथ में बंधी  राखी की डोर  को देखे जा रहा था उदास  सा l महेश बेटे के अंतर्द्वंद्व  को समझ गए
    इसलिए प्यार  से  बोले  ……”निखिल में तुम्हारे लिए राखी लाया हूँ …आओ मैं बाँधूँ  या अपनी मम्मी से बंधबा  लो  l ”
    “पापा राखी तो बहिन से ही बंधबाई  जाती है फिर मम्मी या आप कैसे ?,”
    “,बेटा जिनके  बहिन नहीं होती …..
    “मगर पापा मेरे तो दो -दो बहिने  हैं फिर भी मेरी कलाई सूनी  है मम्मी और बुआ  जी के कारण l “,कहते हुए उसकी आँखें  भर  आईं  l
    “क्या मिला तुमको बच्चों में  दूरियाँ  बढ़ाकर  अपने अहंकार  और नाक  की लड़ाई को दोनों खुद तक ही सीमित  रहने  देतीं  …बच्चों में दूरियाँ क्यों बढ़ा  रही हो ?”महेश के प्रश्नों  ने उसको निरुत्तर  कर दिया तीनों  बिना  खाना खाये  अपने कमरे में चले
    गए l
    – लेखिका….राशि सिंह
    मुदाबाद उत्तर प्रदेश
  • आपको हमारी कहानी ( Raksha Bandhan Story in Hindi ) कैसी लगी हमें जरुर बताएँ.

 

दहेज प्रथा पर स्टोरी – Dahej Pratha Story in Hindi Par Short Kahani Script natak ekanki

dahej pratha story in hindi – दहेज प्रथा पर स्टोरी हिंदी में – dahej pratha par kahani – dahej pratha story in hindi pdf – dahej pratha short story in hindi – dahej pratha natak script in hindi – ekanki on dahej pratha – dahej pratha natak download – dahej pratha natak in hindi download – nukkad natak in hindi on dahej pratha – dahej pratha par natak script – dahej pratha story in hindi – दहेज प्रथा पर स्टोरी हिंदी में – dahej pratha par kahani – dahej pratha story in hindi – दहेज प्रथा पर स्टोरी हिंदी में – dahej pratha par kahani – dahej pratha story in hindi – दहेज प्रथा पर स्टोरी हिंदी में – dahej pratha par kahani – dahej pratha story in hindi – दहेज प्रथा पर स्टोरी हिंदी में – dahej pratha par kahani
दहेज प्रथा पर स्टोरी - Dahej Pratha Story in Hindi Par Short Kahani Script natak ekanki

दहेज प्रथा पर स्टोरी – Dahej Pratha Story in Hindi Par Short Kahani Script natak ekanki

 

  • शीर्षक …….’नाक का सवाल ‘ ( Dahej Pratha Story in Hindi )

  • दहेज के अक्सर कई कारण होते हैं, लड़के वालों का लालच, दिखावे के लिए समाज का दबाव, या लड़की वालों का शानोशौकत के साथ शादी करने की चाह रखना. इस कहानी ( Dahej Pratha Story in Hindi ) में हम दहेज का एक दूसरा पहलू आपको बताना चाहते हैं. तो इस कहानी को पढ़कर आप दहेज के एक छूपे हुए पहलू को जानिए.

 

  • दहेज प्रथा पर स्टोरी – Dahej Pratha Story in Hindi Par Short Kahani Script natak ekanki
  • Dahej Pratha Story in Hindi : आज पूरे घर में खुशी  का वातावरण  था कुंती  देवी और आनंद  बाबू का हृदय  तो बल्लिओ उछल रहा था ,उनकी  लाड़ली  इकलौती बिटिया का रिश्ता  इतने बड़े  खानदान  से जो आया था.
    एक मद्धम  परिवार के लिए इससे ज्यादा  बड़ी खुशी और क्या  हॉसकटी है की बिटिया का ग्रेजुएशन  पुरा होते ही हाथ  पीले  हो ो जायें. “अरे मैंने   तो पहले ही कहा था कि हमारी  मोहिनी है ही इतनी भाग्यवान  उसके लिए भला  इतना अच्छा रिश्ता कैसे नहीं आता ?” दादी दयावती  ने बेटे  आनंद से आनंदित  होते हुए कहा कुंती को अपनी बेटी पर नाज  हो उठा  वह भी मुस्करा ी पर नाज  हो उठा  वह भ मुस्करा  दी “सुन आनंद इतने  ऊँचे परिवार से रिश्ता आया है तो माँग भी ज्यादा ही होगी  l”दादी ने चिंतित  होते हुए कहा “अरे माँ जी हमारी दो चार  बेटी थोड़े  ही हैं जो हम परेशान हो जायें ,अरे एक ही तो बेटी है खूब धूमधाम  से विवाह  करेंगे सारे रिश्तेदार  और बिरादरी बाले  देखते  ही रह जाएंगेाव  देते  हुए कहा l
    “और दो -चाको ताव  देते  हुए कहा l
    “और दो -चार भी होतीं  तो क्या ऐसे ही विवाह करते अरे धूमधाम से करते हम धूमधाम से भले  ही   कितनी भी संपत्ति  बेचनी  ही क्यों न पड़ती  l ” इस बार आनंदी  जोश  मे भरकर  बोली  तो दयावती के चेहरे  की भी रौनक  गर्व से  बढ़ गई  l
    “यह सब रघुनारायण  का ही कमाल  है देखो न तुम्हारी  बहिन  लीलावती  का विवाह उसने  कितने  ऊँचे￰￰  घर से करबाया  और वह आज की तारीख  में कितनी खुश  है !” दयावती  ने अपनी बेटी   लीला  को याद कर भाबुक  होते हुए रूँधे गले से कहा l”क्या ..रघुनारायण करा  रहे हैं मोहिनी का विवाह हमको  नहीं करना पता  नहीं है आपको जीजी  के विवाह में हमारी कितनी जग हंसाई  हुई
    के,सब नाते  रिश्तेदार मुँह  बना रहे थे कि भाई विवाह कर रहा है सो
    तो धूमधाम से विवाह करता  l “
  • Dahej Pratha Story in Hindi
  • “ठीक कह रही हो बहु  इस बार ऐसी गलती  नहीं करेंगे l दयावती ने गहरी  सां लेते  हुए कहा l
    “अभी  रघुनारायण  को फोन  लगाता  हूँl ” कहते  हुए  हूँ बाबू ने बिचौलिया  रघुनारायण को फोन मिला  लिया और दुआ  सलाम  के बाद दहेज़ के मुद्दे  पर बात शुरू कर दी l
    “अरे नहीं  नहीं आनंद जी लड़के  बाले बहुत ही अच्छे घराने  के हैं, दहेज़ को वे बुराई मानते हैं …खुद लड़का  इसके खिलाफ  है उनको तो शरीफ खानदान की सुशील  बहु चाहिए  l ”
    “फिर भी रघुनारायण जी समाज  क्या कहेगा  कि इकलौती बिटिया का विवाह हमने  ऐसे ही कर दिया l यह बात जमी  नहीं l  लीला के विवाह ……

 

  • Dahej Pratha Story in Hindi
  • “हाँ हाँ  कोई  कमी  है क्या उसकी  ससुराल  में…?” रघुनारायण ने बात को बीच में ही काटते हुए कहा l
    “नहीं.. नहीं कमी तो नहीं है मगर हमारी बड़ी जगहंसाई  हुई थी l”
    “चलो  ठीक है मै बात करता हूँ उनसे  मगर यदि वह नहीं  माने  तो आप जो कुछ अपनी बेटी को देना  चाहते  हैं उसके नाम  कर दे  चुपचाप  भविष्य  में बच्चों के काम  आएगा  धन  l” रघुनारायण ने आनंद बाबू को समझाते  हुए कहा l
    “अरेनहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं हमको तो सबको  दिखाना  है न कि हमने इतना अच्छा बिटिया का विवाह किया है l ”
    रघुनारायण “जैसी  तुम्हारी मर्जी “, कह चुप हो  गए  और घर के सदस्य  खुश l
    लेखिका ….राशि सिंह
    मुरादाबाद उत्तर प्रदेश
    (अप्रकाशित एवं मौलिक लघुकथा )
  • इस कहानी ( Dahej Pratha Story in Hindi ) के जरिये हम दहेज के एक महत्वपूर्ण पहलू “सामजिक दिखावा” की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं. आपको यह कहानी ( Dahej Pratha Story in Hindi ) कैसी लगी, हमें जरुर बताएं.
  • दहेज प्रथा पर कविता – Poem On Dahej Pratha in Hindi Poem on Dowry in Hindi

 

Hindi Story Haar Ki Jeet – हिंदी स्टोरी हार की जीत – Kahani Haar Ki Jeet Ka Saransh

hindi story haar ki jeet – हिंदी स्टोरी हार की जीत – kahani haar ki jeet ka saransh – hindi story haar ki jeet – हिंदी स्टोरी हार की जीत – kahani haar ki jeet ka saransh – hindi story haar ki jeet – हिंदी स्टोरी हार की जीत – kahani haar ki jeet ka saransh – hindi story haar ki jeet – हिंदी स्टोरी हार की जीत – kahani haar ki jeet ka saransh – hindi story haar ki jeet – हिंदी स्टोरी हार की जीत – kahani haar ki jeet ka saransh – moral of the story haar ki jeet in hindi – haar ki jeet short story in hindi – kahani haar ki jeet ka saransh – haar ki jeet uddeshya – haar ki jeet question answer – haar ki jeet pdf – haar ki jeet ka uddeshyaHindi Story Haar Ki Jeet – हिंदी स्टोरी हार की जीत - Kahani Haar Ki Jeet Ka Saransh

Hindi Story Haar Ki Jeet – हिंदी स्टोरी हार की जीत – Kahani Haar Ki Jeet Ka Saransh

 

  • Haar Ki jeet ऐसी Hindi sory है, जिसे बचपन में ढेरों लोगों ने पढ़ा होगा. तो आइये बचपन की याद ताजा करते हैं और hindi story haar ki jeet पढ़ते हैं. और इस कहानी के अंत में haar ki jeet ka saransh भी पढ़ते हैं.

 

  • माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था. भगवद्-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता. वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान. उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था. बाबा भारती उसे ‘सुल्तान’ कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे. उन्होंने रूपया, माल, असबाब, ज़मीन आदि अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, यहाँ तक कि उन्हें नगर के जीवन से भी घृणा थी. अब गाँव से बाहर एक छोटे-से मन्दिर में रहते और भगवान का भजन करते थे. “मैं सुलतान के बिना नहीं रह सकूँगा”, उन्हें ऐसी भ्रान्ति सी हो गई थी. वे उसकी चाल पर लट्टू थे. कहते, “ऐसे चलता है जैसे मोर घटा को देखकर नाच रहा हो.” जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता.
  • खड़गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध डाकू था. लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे. होते-होते सुल्तान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची. उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा. वह एक दिन दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया. बाबा भारती ने पूछा, “खडगसिंह, क्या हाल है?”
    खडगसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “आपकी दया है.”
    “कहो, इधर कैसे आ गए?”
    “सुलतान की चाह खींच लाई.”
    “विचित्र जानवर है. देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे.”
    “मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है.”
    “उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी!”
    “कहते हैं देखने में भी बहुत सुँदर है.”
    “क्या कहना! जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है.”
    “बहुत दिनों से अभिलाषा थी, आज उपस्थित हो सका हूँ.”
    बाबा भारती और खड़गसिंह अस्तबल में पहुँचे. बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड़गसिंह ने देखा आश्चर्य से. उसने सैंकड़ो घोड़े देखे थे, परन्तु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न गुजरा था. सोचने लगा, भाग्य की बात है. ऐसा घोड़ा खड़गसिंह के पास होना चाहिए था. इस साधु को ऐसी चीज़ों से क्या लाभ? कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा. इसके पश्चात् उसके हृदय में हलचल होने लगी. बालकों की-सी अधीरता से बोला, “परंतु बाबाजी, इसकी चाल न देखी तो क्या?”
  • hindi story haar ki jeet
  • दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय अधीर हो गया. घोड़े को खोलकर बाहर गए. घोड़ा वायु-वेग से उडने लगा. उसकी चाल को देखकर खड़गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया. वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर वह अपना अधिकार समझता था. उसके पास बाहुबल था और आदमी भी. जाते-जाते उसने कहा, “बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा.”
  • बाबा भारती डर गए. अब उन्हें रात को नींद न आती. सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी. प्रति क्षण खड़गसिंह का भय लगा रहता, परंतु कई मास बीत गए और वह न आया. यहाँ तक कि बाबा भारती कुछ असावधान हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाईं मिथ्या समझने लगे. संध्या का समय था. बाबा भारती सुल्तान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे. इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता. कभी घोड़े के शरीर को देखते, कभी उसके रंग को और मन में फूले न समाते थे. सहसा एक ओर से आवाज़ आई, “ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना.”
  • आवाज़ में करूणा थी. बाबा ने घोड़े को रोक लिया. देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा कराह रहा है. बोले, “क्यों तुम्हें क्या कष्ट है?”
  • अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा, मैं दुखियारा हूँ. मुझ पर दया करो. रामावाला यहाँ से तीन मील है, मुझे वहाँ जाना है. घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा.”
  • “वहाँ तुम्हारा कौन है?”
  • “दुगार्दत्त वैद्य का नाम आपने सुना होगा. मैं उनका सौतेला भाई हूँ.”
  • बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे. सहसा उन्हें एक झटका-सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई. उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा है और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है. उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख निकल गई. वह अपाहिज डाकू खड़गसिंह था.बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात् कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, “ज़रा ठहर जाओ.”

 

  • hindi story haar ki jeet
  • खड़गसिंह ने यह आवाज़ सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा.”
  • “परंतु एक बात सुनते जाओ.” खड़गसिंह ठहर गया.
  • बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा कसाई की ओर देखता है और कहा, “यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है. मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूँगा. परंतु खड़गसिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ. इसे अस्वीकार न करना, नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा.”
  • “बाबाजी, आज्ञा कीजिए. मैं आपका दास हूँ, केवल घोड़ा न दूँगा.”
  • “अब घोड़े का नाम न लो. मैं तुमसे इस विषय में कुछ न कहूँगा. मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना.”
  • खड़गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया. उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना. इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खड़गसिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका. हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, “बाबाजी इसमें आपको क्या डर है?”
  • सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया, “लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे दीन-दुखियों पर विश्वास न करेंगे.” यह कहते-कहते उन्होंने सुल्तान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही नहीं रहा हो.

 

  • hindi story haar ki jeet
  • बाबा भारती चले गए. परंतु उनके शब्द खड़गसिंह के कानों में उसी प्रकार गूँज रहे थे. सोचता था, कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है! उन्हें इस घोड़े से प्रेम था, इसे देखकर उनका मुख फूल की नाईं खिल जाता था. कहते थे, “इसके बिना मैं रह न सकूँगा.” इसकी रखवाली में वे कई रात सोए नहीं. भजन-भक्ति न कर रखवाली करते रहे. परंतु आज उनके मुख पर दुख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी. उन्हें केवल यह ख्याल था कि कहीं लोग दीन-दुखियों पर विश्वास करना न छोड़ दे. ऐसा मनुष्य, मनुष्य नहीं देवता है.
  • रात्रि के अंधकार में खड़गसिंह बाबा भारती के मंदिर पहुँचा. चारों ओर सन्नाटा था. आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे. थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भौंक रहे थे. मंदिर के अंदर कोई शब्द सुनाई न देता था. खड़गसिंह सुल्तान की बाग पकड़े हुए था. वह धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा. फाटक खुला पड़ा था. किसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था. खड़गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया. इस समय उसकी आँखों में नेकी के आँसू थे. रात्रि का तीसरा पहर बीत चुका था. चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया. उसके पश्चात्, इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर बढ़े. परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई. साथ ही घोर निराशा ने पाँव को मन-मन भर का भारी बना दिया. वे वहीं रूक गए. घोड़े ने अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और ज़ोर से हिनहिनाया. अब बाबा भारती आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर घुसे और अपने प्यारे घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे मानो कोई पिता बहुत दिन से बिछड़े हुए पुत्र से मिल रहा हो. बार-बार उसकी पीठपर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुँह पर थपकियाँ देते. फिर वे संतोष से बोले, “अब कोई दीन-दुखियों से मुँह न मोड़ेगा.”
  • haar ki jeet kahani KE LEKHAK- सुदर्शन

 

  • kahani haar ki jeet ka saransh / uddeshya – haar ki jeet kahani का सारांश यह है कि हमें कोई भी ऐसा गलत काम नहीं करना चाहिए जिससे कि दीन-दुखियों पर लोग विश्वास करना छोड़ दें. हमें दीन-दुखी का ढोंग रचकर किसी को मूर्ख नहीं बनाना चाहिए.

 

चेतक के वीरता की कहानी || Maharana Pratap Horse Chetak History in Hindi`

maharana pratap horse chetak history in hindi – चेतक की कहानी – maharana pratap horse chetak history in hindi – चेतक की कहानी – maharana pratap horse chetak history in hindi – चेतक की कहानी – maharana pratap horse chetak history in hindi – चेतक की कहानी – maharana pratap horse chetak history in hindi – चेतक की कहानी
Maharana Pratap Horse Chetak History in Hindi || चेतक के वीरता की कहानी ||`

 

  • चेतक वीर महाराणा प्रताप का सबसे प्रिय घोड़ा था.
  • हल्दीघाटी के युद्ध में चेतक ने अद्भुत स्वामीभक्ति बुद्धिमत्ता और वीरता का उदाहरण प्रस्तुत किया था.
  • चेतक युद्ध में बुरी तरह घायल हो जाने के बाद भी महाराणा प्रताप को रणक्षेत्र से बाहर सुरक्षित लाने में सफल हुआ था.

 

  • Chetak चेतक की गति इतनी तेज हुआ करती थी, कि किसी दूसरे घोड़े के जरिए चेतक का पीछा कर पाना असंभव था.
  • चेतक अरबी मूल का घोड़ा था.
  • जल्दी ही चेतक की चर्चा आसपास के क्षेत्र में होने लगी.
  • चेतक की गति इतनी अधिक तेज होती थी मानो वह हवा के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा हो.
  • चेतक की गति इतनी अधिक थी कि वह सवार व्यक्ति को लेकर क्षण भर में बहुत आगे पहुंच जाता था.
  • एक वाक्य में कहें तो चेतक महाराणा प्रताप की ताकत बन गया था.
  • क्योंकि चेतक विशेष था इसलिए महाराणा उसे विशेष स्नेह देते थे, और उस का विशेष ख्याल रखते थे.
  • चेतक की अद्भुत क्षमताओं ने उसे विशेष ऐतिहासिक पहचान दी है.
  • Chetak चेतक दुर्गम पथों पर भी आसानी से चलता था.

  • चेतक महाराणा प्रताप के लिए ईश्वर के वरदान से कम बिल्कुल भी नहीं था.
  • हल्दीघाटी के युद्ध में एक बरसाती नाले को पार करते हुए चेतक चोटिल हो गया और अंततः वीरगति को प्राप्त हुआ.
  • चेतक के वीरगति को प्राप्त होने के बाद, महाराणा प्रताप और उनके भाई शक्ति सिंह ने स्वयं अपने हाथों से चेतक का दाह संस्कार किया था.
  • चेतक की स्वामीभक्ति और वीरता के गीत आज भी मेवाड़ में गाए जाते हैं.
  • जिस जगह पर महाराणा प्रताप और उनके भाई शक्ति सिंह में चेतक का दाह संस्कार किया था उस स्थान पर
    आज चेतक की समाधि बनी हुई है.
  • चेतक ने कई लोगों को प्रेरित किया है और आने वाली पीढ़ियों को भी वह प्रेरित करता रहेगा.

 

सीता हरण की वास्तविक कहानी जानते हैं आप ! ramayan Sita Haran story in hindi

Ramayan Sita Haran Story in Hindi – सीता हरण की कहानी – सीता का हरण नहीं हुआ, तो किसका हरण हुआ ! ramayan Sita Haran story in hindi – Ramayan Sita Haran Story in Hindi – सीता हरण की कहानी – सीता का हरण नहीं हुआ, तो किसका हरण हुआ ! ramayan Sita Haran story in hindi – Ramayan Sita Haran Story in Hindi – सीता हरण की कहानी – सीता का हरण नहीं हुआ, तो किसका हरण हुआ ! ramayan Sita Haran story in hindi – Ramayan Sita Haran Story in Hindi – सीता हरण की कहानी – सीता का हरण नहीं हुआ, तो किसका हरण हुआ ! ramayan Sita Haran story in hindi
सीता का हरण नहीं हुआ, तो किसका हरण हुआ ! ramayan Sita Haran story in hindi

 

  • रामायण में सीता हरण का प्रसंग आता है. इस लेख में हम जानेंगे कि सीता हरण की जो कहानी लोगों के बीच फैली हुई है. उस कथा में और वास्तविकता में क्या अंतर है.

 

  • लोगों के बीच यह कहानी फैली हुई है कि जब राम सीता और लक्ष्मण वनवास काट रहे थे. वे कुटिया बनाकर रहते थे.
    एक दिन रावण ने सीता हरण के उद्देश्य से मारीच को सोने का मृग बनकर सीता की नजरों के सामने जाने के लिए बोला.
    मारीच भगवान राम से छल नहीं करना चाहता था, उसने कहा, वह राम-सीता से छल नहीं करेगा. तो रावण ने मारीच को धमकी दी कि यदि वह सोने का मृग बनकर सीता के सामने नहीं जायेगा. तो रावण खुद उसका वध कर देगा. तब मारीच ने सोचा, रावण के हाथों मरकर उसे मुक्ति भी नहीं मिलेगी… जबकि राम के हाथों अगर उसे मृत्यु आई भी तो वह मोक्ष पा लेगा.
    मारीच सोने का हिरण बनकर माता सीता के सामने आया और जैसे हीं उसने देखा कि माता सीता ने उसे देख लिया है.
    मारीच घने वन की ओर भाग चला. माता सीता ने भगवान राम से कहा, मैंने सोने का मृग देखा है… मुझे वह सोने का मृग चाहिए. भगवान राम ने माता सीता से कहा, सोने का मृग नहीं होता है. यह कोई भ्रम होगा. पर माता सीता ने भगवान राम की बात नहीं मानी और राम से सोने के मृग को लाने की जिद करने लगी. राम लक्ष्मण को सीता की सुरक्षा करने को बोलकर सोने के मृग के पीछे चल दिए. आगे-आगे मृग दौड़ा जा रहा था और पीछे-पीछे राम दौड़ रहे थे. बहुत देर हो गई, राम मृग को लेकर नहीं आये.
    तभी सीता ने राम की आवाज सुनी, “ लक्ष्मण मुझे बचाओ “. सीता ने वही आवाज़ कई बार सुनी. तो सीता ने लक्ष्मण से कहा, आप अपने भ्राता की मदद के लिए जाइये. लक्ष्मण ने कहा, भैया राम को कोई कुछ नहीं कर सकता है, यह जरुर किसी की माया होगी. लेकिन लक्ष्मण के वन की ओर भगवान राम की मदद के लिए जाने के लिए सीता जिद करने लगी. लक्ष्मण ने कुटिया से निकलते समय कुटिया के द्वार के बाहर एक रेखा खींच दी, जिसे पार करके कोई भी जीव कुटिया के भीतर प्रवेश नहीं कर सकता था.
    इसी रेखा को लक्ष्मण रेखा कहते हैं. लक्ष्मण के जाने के कुछ देर के बाद रावण ऋषि का वेश बनाकर आया.
    और माता सीता से भिक्षा मांगने लगा. माता सीता उसे भिक्षा देने लगी, तो उसने लक्ष्मण रेखा को देखा….
    जिसे पार करके वह सीता हरण नहीं कर पायेगा. तो रावण क्रोधित होने का ढोंग करने लगा. रावण बोला,
    अगर तुम बंधन में रहकर भिक्षा दोगी, तो मैं तुम्हारी भिक्षा ग्रहण नहीं करूंगा. माता सीता उससे लक्ष्मण रेखा में रहकर हीं, भिक्षा लेने की विनती करने लगी. लेकिन रावण अपनी जिद पर अड़ा रहा. अंत में सीता लक्ष्मण रेखा को पार कर भिक्षा देने, रेखा से बाहर आई. सीता के रेखा पार करते हीं रावण अपने वास्तविक रूप में आ गया. और सीता का हाथ पकड़कर पुष्पक विमान में बैठाकर लंका ले गया. इस तरह से सीता हरण हुआ.
    लोग सोचते हैं, रावण ने वास्तविक सीता का हरण किया. लेकिन सच्चाई यह है कि राम को रावण के सीता हरण की योजना की जानकारी पहले हीं मिल गई थी. राम ने अग्नि देवता का आवाहन कर उन्हें बुलाया था. राम ने अग्नि देव से कहा, अग्नि देव आप अपनी पुत्री सीता को अपने पास सुरक्षित रखिये. भूलोक में कुछ लीला करनी है, उसके पश्चात मैं सीता को आपके पास से ले लूँगा. उसके बाद से छाया सीता हीं राम के साथ रह रही थी. आप छाया सीता को आधुनिक शब्दों में क्लोन सीता भी कह सकते हैं. अर्थात छाया सीता का हीं रावण ने अपहरण किया था. क्योंकि सीता पतिव्रता स्त्री थी, इसलिए अगर रावण वास्तविक सीता को छू भी लेता, तो उसी क्षण वह भस्म हो जाता.
    यह रही सीता के हरण की वास्तविकता. इस सच्चाई को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं. ताकि सीता हरण की सच्चाई सभी तक पहुंचे.

 

6 प्रेरक लघुकथा || Prerak Laghu Katha in Hindi Short Prerak Prasang in Hindi

laghu katha in hindi – prerak laghu katha in hindi – लघुकथा संग्रह – laghu katha in hindi – prerak laghu katha in hindi – लघुकथा संग्रह – laghu katha in hindi – prerak laghu katha in hindi – लघुकथा संग्रह – laghu katha in hindi – हिंदी laghu katha – nepali laghu katha – laghu katha hindi  – laghu katha nepali – laghu katha hindi story – prerak laghu katha in hindi – laghu katha in marathi – laghu katha hindi me – hasya laghu katha in hindi – laghu katha in sanskrit language – hindi laghu katha with moral – marathi laghu katha – laghu katha in sanskrit – sanskrit laghu katha – laghu katha in hindi with moral
Prerak Laghu Katha in Hindi || प्रेरक लघुकथा || Short Prerak Prasang in Hindi

 

  • Prerak Laghu Katha in Hindi – लघुकथा

 

  • शीर्षक —–‘अतीत से निरपेक्ष ‘

    ”मम्मी !”
    ”हाँ बेटा !”
    ”अरे मैने पूरा घर छान मारा और आप यहाँ बैठी हो !”
    ”हाँ बेटा ,अकेली थी इसलिये यहाँ आकर बैठ गयी !”
    ”आज कोई नई बात थोडे ही है –आप तो पता नहीं रोज अकेली इस समुद्र के किनारे आकर न जाने क्या सोचती रहती हैं ?”
    ”कौन कहता है कि मैं सोचती हूँ —?अरे बेटा मैं तो यहाँ आकर तन्हा नहीं बल्कि खुद से मुलाकात करती हूँ –बतियाती हूँ खुद से –!”
    ”अरे मम्मी आप भी न –!”
    ”खैर छोड तेरी समझ में नहीं आयेगा !”
    ”मम्मी –!”
    ”हाँ !”
    ”आज पापा का फ़ोन आया था !”
    अचानक बेटे बासु के मुँह से उसके पापा का नाम सुनकर शालिनी के हिलते हुए पानी में पडे पैर रुक गये ।समुद्र जैसे ठहर सा गया ।वह आश्चर्य से और प्रश्नवाचक नजरों से बासु की ओर देखने लगी।
    ”माँ पापा कह रहे थे कि वह बहुत शर्मिंदा हैं –वह आपसे माँफी माँगने को तैयार हैं !’
    ”लेकिन बेटा —?”
    ”मम्मी मैं जानता हूँ आप पापा से बहुत नाराज हो मगर –!”
    ”मगर क्या बेटा ?”
    ”उनसे गलती हुई थी जो वो आपको छोडकर इधर-उधर–!”
    ”चुप हो जा बासू मैं जानती हूँ कि तू अब बडा हो गया है।तेरा कोलेज भी इस बार पूरा हो जायेगा। मगर तू यह नहीं जानता कि मैने क्या -क्या सहा था ? कैसे तुम दोनो भाईयों को पढाया -लिखाया? क्या तुम चाहते हो कि तुम्हारी माँ फिर उसी घिनावने और डरावने अतीत में वापस चली जाये? –क्या उनके माँफी माँगने से गुजरा वक्त वापस आ जायेगा –?नहीं न! बासु मैं अपने अतीत के निरपेक्ष हो चुकी हूँ भुला चुकी हूँ उस सब को एक डरावना स्वप्न समझकर तुम दोनो को ही मैने अपनी दुनिया मान लिया है प्लीज बेटा —-!” कहकर शालिनी बेटे से लिपटकर रोने लगी
    ”सौरी मम्मी मैने आपका दिल दुखाया मगर अब वायदा करता हूँ कभी भी आपको फोर्स नहीं करूँगा !” कहकर बासु अपनी माँ के बालों में हाथ फेरने लगा ।
    – लेखिका— राशि सिंह
    मुरादाबाद उत्तर प्रदेश
    अप्रकाशित एवं मौलिक लघुकथा

 

  • शीर्षक —–‘धिक्कार ‘

    ”बाबू जी कुछ  रुपये दे दो ।मेरा पोता  बहुत बीमार है। अस्पताल जाना है ।एक भी पैसा नहीं है मेरे पास ।

    एक बुजुर्ग रिक्शे बाले व्यक्ति ने पार्किंग में खडी कार को स्टार्ट करते हुए सुरेश से गिड़गिडाते हुए कहा ।
    ”अरे जाओ यहाँ से चले आते हैं पता नहीं कहाँ -कहाँ से !”सुरेश ने उस वुजुर्ग को धकियाते हुए कहा और गाडी स्टार्ट कर आगे बढ गया ।जैसे ही गाडी आगे बढी उसके नीचे भाग कर अचानक सुरेश का सात बर्षीय पुत्र रोहित आ गया ।सुरेश ने एकदम ब्रेक लगाये लेकिन रोहित एक तरफ़ गिरकर अचेत हो गया ।
    ”अरे यह क्या किया बाबूजी ?” कहते हुए उस वुजुर्ग व्यक्ति ने रोहित को सँभाला ।सुरेश बेटे की हालत देखकर बेहोश हो गया। सुरेश की पत्नि बाहर आकर दहाड़ मारकर रोने लगी ।वुजुर्ग ने आव देखा न ताव बच्चे को गोदी में उठाया और सड़क पार बने हुए अस्पताल की ओर भाग गया। डाक्टर ने एकदम रोहित को एडमिट कर लिया। पीछे -पीछे सुरेश और सुनन्दा भी पहुँच गये ।
    ”अच्छा हुआ समय पर एडमिट करा दिया अब बच्चा ठीक है !” डाक्टर ने बाहर आकर कहा तो सुरेश और सुनन्दा की जान में जान आई ।
    सुरेश अस्पताल में चारों ओर उस व्रद्ध व्यक्ति को देख रहा था जिसने आज उसके घर के चिराग को बुझने से बचा लिया परंतु कहीं दिखाई नहीं दिया। खुद को बहुत गरीब और कमजोर सा महसूस कर रहा था सुरेश ।
    ”धिक्कार है मुझपर मै उसकी सहायता भी चन्द कागज के टुकडो से न कर सका और उसने तो मेरी दुनियाँ ही बचा दी ।

    लेखिका —राशि सिंह 

 

  • शीर्षक — ‘कल्पना लोक ‘

    ”कल्पना –अरे कहाँ हो भई ?” लोक ने घर में घुसते ही अपनी पत्नि कल्पना को आवाज दी ।
    ”मै यहाँ हूँ बाथरूम  में नहा रही हूँ !”
    ”अरे यार संडे को तो तुम्हारा पूरा टाईम टेबल ही गड़बडा जाता है ।ग्यारह बज गये अब जल्दी करो भी न ।बाजार भी  जाना है  ।और सूरज कहाँ है ?”
    ”अभी आती हूँ !”
    ”सूरज को मैने उसके मित्र के घर भेज दिया है ।अरे भई एक ही तो दिन मिलता है मुझे आपके साथ घूमने फिरने के लिये उसमें भी सूरज को —न बाबा न !” कल्पना ने तौलिया से अपने गीले बाल सुखाते हुए कहा ।
    ”कल्पना तुमको हो क्या गया है पूरे हफ़्ते तो वह आया की कस्टडी में रहता है और आज तुमने —!”
    ”पापा कोई बात नहीं आज मुझे कोई नया गैजेट लाकर दे देना मैं समय बिता लूँगा उसके साथ !” कौने में खडे दस साल के बेटे की बात सुनकर कल्पना और लोक की बोलती बंद हो गयी ।
    ”बेटा इधर आओ ।”कल्पना ने सूरज को अपने पास आने को कहा लेकिन सूरज बिना कोई उत्तर दिये अपने कमरे में चला गया ।अब वह वहाँ बैठकर पता नहीं कौनसे कल्पना लोक में विचरण करेगा इस बात से अन्जान कल्पना और लोक बाजार चले गये इंजोय करने ,छूट्टी मनाने ।

    लेखिका —राशि सिंह 

 

  • शीर्षक —-‘टूटा तारा ‘

    ”क्या हुआ तनिष्क?” आँख बंद किये छत पर अकेले खडे अपने पाँच साल के बेटे से ऋतु ने आश्चर्यचकित होते हुए पूँछा ।
    ”कुछ नहीं मम्मी ,इंतजार कर रहा हूँ
    ”किसका ?”
    ”तारा टूटने का !”
    ”क्यों ?”
    ”दादी बीमार हैं न ! उनके लिये ।दादी ने मुझे बताया कि अगर तारा टूटे तो जो भी विश माँगोगे पूरी हो जाती है । मासूम तनिष्क ने मासूमियत से कहा सुनकर ऋतु का ह्र्दय आत्मग्लानि से भर गया ।
    ”एक यह है जो दादी की सलामती के लिये प्रार्थना कर रहा है और एक मैं हूँ जो भगवान से रोज उनके मरने की प्रार्थना करती हूँ ताकि उनकी सेवा नहीं करनी पडे !”ऋतु हाथ जोड़कर तनिष्क के पास ही घुटनो के बल बैठ गयी सासू माँ के स्वास्थ्य की सलामती के लिये ।

    लेखिका —-राशि सिंह

 

  • शीर्षक —–‘मैली सी माँ ‘

    ”अरे बेटा सुरेन्द्रररर–!”कमरे के भीतर से किसी बुजुर्ग महिला की कपकपाती सी आवाज आई ।
    ”जाओ सुनकर आओ अपनी माता श्री की।” सुगन्धा ने नाश्ता करते हुए पति से मुँहे बनाते हुए  कहा ।
    ”हाँ हाँ जा रहा हूँ –जा रहा हूँ तुम भी कभी पूँछ लिया करो उनका हाल -चाल !”
    ”मैं ,न बाबा न मैं तो उस कमरे की तरफ़ मुँह भी नहीं करती इतनी बदबू आती है छी–।”
    ”कुछ खाने को दिया या नहीं उनको ?”
    ”अभी मेड नहीं आई है। आयेगी तब भिजवा दूँगी ।”
    ”मेरा रुमाल दो यार ।”
    ”अभी देती हूँ ।”
    ”लाओ जल्दी ।”सुरेन्द्र ने रुमाल को नाक से बाँधा और भीतर चला गया ।
    ”हाँ बोलो ।”
    ”बेटा इस कमरे की लाइट खराब हो गयी है। रात बहुत ठंड लगी ।हीटर भी न चला ।’कमाँ ने रजाई में से मुँह निकाल कर कपकपाते हुए कहा ।
    ”ठीक है ठीक है आज करबा दूँगा और ज्यादा शोर मत मचाया करो ।सब हो जायेगा ।मेड आती ही होगी ।”
    ”बेटा थोडी देर बैठ तो सही ।”
    ”अरे नहीं माँ औफिस के लिये लेट हो रहा हूँ ।यहाँ कहाँ बैठ जाऊँ इतनी तो बदबू आ रही है ?” रुमाल से मुँह ढककर सुरेन्द्र ने कहा और बाहर निकल गया माँ की आँखों में लाचारी के आँसू आ गये बे खुद को सूँघने लगी ”क्या सच में ही मैं मैली हो गयी हूँ ?अभी तो हाथों में सुरेन्द्र के मल-मूत्र की गंध आती है मुझे और वो कह गया की मुझमें दुर्गन्ध?”

    लेखिका —-राशि सिंह 

 

  • शीर्षक —–‘रक्त -रंजित ‘

    ”आह ! छुओ मत मुझे!” स्नेहा ने आलिंगन में कैद करते पति नितिन को रोकते हुए कहा ।
    ”क्यों क्या हुआ ?”
    ”बहुत पीडा हो रही है ।”
    ”कहाँ ?”
    ”ह्र्दय में ।”
    ”यार मजाक मत करो, मैंने तो तुम्हारे एक थप्पड भी नहीं मारा ।
    ”थप्पड मार देते तो शायद इतना दर्द न होता । मेरी आत्मा इतना नहीं कराहती ,जितना तुम्हारी बातों के तीर ने इसको छलनी करके रख दिया ।
    ”छोडो भी —!”
    ”अरे मैं अपना घर अपने माँ -बाप सबको छोडकर आई हूँ और आपने पहली ही रात को ”अँगूठी छोटी है ,चैन छोटी है ” कहकर मुझे सुनाना शुरू कर दिया बारात की खातिरदारी अच्छी नहीं हुई !”
    ”ऐसे तो लड़के बाले कहते ही हैं !” बेशर्मी से कहता हुआ नितिन बाहर निकल गया ।कमरे में स्नेहा अवाक सी रह गयी पति की ऐसी बात सुनकर ।प्रतीक की बातों से लग रहा था , मानो लड़की बालों को ताना देना लड़के बालों का जन्म सिद्ध अधिकार हो ।

    लेखिका —–राशि सिंह

  • Yah Hindi laghu katha aapko kaisi lagi hmein jarur btayein aur agar aapne bhi koi laghu katha likhi hai, to hmein jarur bhejein.

 

3 देशभक्ति कहानी Desh Bhakti Short Story in Hindi desh bhakti kahani stories ekanki

desh bhakti short story in hindi – Desh Bhakti Short Story in Hindi – देशभक्ति कहानी – desh bhakti kahani stories – Desh Bhakti Short Story in Hindi – देशभक्ति कहानी desh bhakti kahani stories – Desh Bhakti Short Story in Hindi – देशभक्ति कहानी desh bhakti kahani stories
Desh Bhakti Short Story in Hindi - देशभक्ति कहानी desh bhakti kahani stories

 

  • सदा सुहागन – 1st Desh Bhakti Short Story in Hindi – देशभक्ति कहानी – desh bhakti kahani

  • सुषमा और अनुपमा दो सहेलियां थी. दोनों पढ़ने में बहुत तेज थी. उन दोनों में कॉलेज में फर्स्ट आने की हमेशा
    होड़ लगी रहती थी. दोनों ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली. कुछ समय के बाद उन दोनों के घर में शादी की बात की जाने लगी.
    अनुपमा बहुत महत्वाकांक्षी लड़की थी , वह चाहती थी कि उसकी शादी किसी बहुत ही अमीर लड़के से हो.
    जबकि सुषमा को किसी साधारण लड़के से शादी करने में कोई समस्या नहीं थी.

 

  • अनुपमा की शादी एक बड़े नेता के बेटे से हो गई. सुषमा की शादी एक सैनिक से हो गई. कुछ समय बाद
    दोनों मां बन गई. अनुपमा के बच्चे अपने पिता के धन और सत्ता के नशे में बहक गए. वे अपनी ही दुनिया
    में मस्त रहते थे, अबे अपनी मां की ना तो परवाह करते थे और ना उचित सम्मान देते थे. अनुपमा के पति
    राजनीति में बहुत ज्यादा व्यस्त रहते थे और अनुपमा के प्रति लापरवाह रहते थे. अब अनुपमा के पास सब
    कुछ था, सत्ता भी और पैसे भी. लेकिन उसके पास ना तो परिवार की खुशी थी और ना ही सुख शांति.
    सुषमा के पति कभी सीमा पर तैनात रहते थे, तो कभी किसी और स्थान पर. इस कारण सुषमा और
    उसके पति अक्सर दूर रहते थे. लेकिन दोनों के बीच बहुत प्यार था और वे दोनों एक दूसरे को अच्छे से समझते थे.
    एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे. सुषमा के दो बच्चे थे, एक लड़का और एक लड़की. सुषमा ने अपने बच्चों को
    संस्कारवान और समझदार बनाया था. सुषमा ने उनकी जरूरतें तो पूरी की, लेकिन उन्हें जरूरतों और फिजूलखर्ची
    के बीच का अंतर भी समझाया था. सुषमा ने मैं अपने बच्चों को आजादी तो दी थी, लेकिन उन्हें अनुशासन
    की सीमा में रहना भी सिखाया था. दूसरी ओर अनुपमा के पास सब कुछ होते हुए भी कुछ भी नहीं था,
    ना सुख, ना शांति, ना अपनापन और ना किसी बात का गर्व.
    समय बीतता गया, एक दिन खबर आई कि सुषमा के पति ने सीमा पर आतंकवादियों से लड़ाई करते
    हुए युद्ध में वीरगति पाई. सुषमा पर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. सरकार द्वारा शहीद सैनिकों को दी जाने
    वाली पेंशन और आर्थिक सहायता के कारण, सुषमा को कोई आर्थिक दिक्कत नहीं हुई. लेकिन वह फिर भी
    खुद को थोड़ा अकेला महसूस करने लगी. एक दिन अचानक अनुपमा सुषमा से मिलने आई, दोनों ने एक
    दूसरे का हाल चाल पूछा. अनुपमा सुषमा को यह बताने लगी कि  कैसे पैसा और ताकत होने के बावजूद कैसे
    वह अकेली पड़ गई है. कैसे अनुपमा नाममात्र की सुहागन रह गई है. अनुपमा ने सुषमा से कहा, तुम तो विधवा
    होते हुए भी सदा सुहागन रहोगी. क्योंकि तुम्हारे पास तुम्हारे पति के प्यार की सुनहरी यादें रहेंगी.
    तुम्हें इस बात का गर्व रहेगा, कि तुम्हारे पति देश के लिए जिए और देश के मरे. तुम्हारी जिंदगी मेरी जिंदगी
    से कहीं बेहतर है. मैं भले ही सदा सुहागन का जोड़ा पहनूँ, लेकिन वास्तव में सदा सुहागन तुम ही रहोगी.
  • Moral message of the story :

  • सैनिक के परिवार की जिंदगी किसी दूसरे की चमक-धमक भरी जिंदगी से ज्यादा बेहतर और सार्थक होती है.

 

  • गद्दारों की कौम – 2nd Desh Bhakti Short Story in Hindi

  • बात प्रथम स्वाधीनता संग्राम की है. झांसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो चुकी थी.
    झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अकेले हीं, अंग्रेजों का सामना करने के लिए तैयार थी.
    लेकिन उनके पास पर्याप्त धन नहीं था, जिससे वो विशाल सेना का निर्माण कर सके.
    और अपनी सेना के लिए ज्यादा हथियारों की व्यवस्था कर सके. रानी ने झांसी के सभी
    धनाढ्य लोगों और व्यापारियों को अपने दरबार में बुलाया. और उनके सामने अपनी समस्या
    बताई तथा उनसे आर्थिक सहयोग मांगा. वे सभी व्यापारी और धनाढ्य लोग अपने अपने घर चले गए.
    उनमें से कुछ लोगों ने रानी को सहयोग देने का निश्चय किया. ज्यादातर दूसरे लोगों ने रानी की बजाए
    अंग्रेजों के पक्ष का सहयोग करना बेहतर समझा. क्योंकि अंग्रेज ज्यादा मजबूत थे और उन्होंने अपने
    सहयोगियो को इस बात का आश्वासन दिया था कि वे अपने सहयोगियों से उनका धन नहीं छीनेंगे.
    और इसका नतीजा यह हुआ कि रानी लक्ष्मीबाई ना तो अपनी सेना का आकार है ही बढ़ा पाई और
    ना रानी की सेना बहुत ज्यादा हथियारों से युक्त हो पाई.
    जब रानी लक्ष्मीबाई और उनकी सेना की लड़ाई अंग्रेजों से शुरू हुई, तो उन्होंने अंग्रेजों से वीरता से लड़ाई लड़ी.
    लेकिन छोटी और कमजोर सेना अंग्रेजों से पराजित हो गई. रानी लक्ष्मीबाई भी बुरी तरह से हो गए घायल हो गई.
    घायल रानी को उनके कुछ वफादार सैनिक बैलगाड़ी से युद्ध क्षेत्र से दूर एक झोपड़ी में ले गए. रानी को अपनी
    मृत्यु का एहसास हो चुका था, रानी ने कहा मेरी मृत्यु के बाद झोपड़ी के साथ ही मुझे जला देना.
    ताकि मरने के बाद भी अंग्रेज मेरी लाश को भी हाथ ना लगा सके. रानी वीरगति को प्राप्त हुई.
    रानी के कहे अनुसार, उसे झोपड़ी के साथ रानी की चिता जला दी गई. युद्ध में झांसी की हार हुई और
    अंग्रेजों ने झांसी पर कब्जा कर लिया. अगर उन धनाढ्य लोगों ने लक्ष्मीबाई की मदद की होती है,
    तो अंग्रेज हार जाते. और प्रथम स्वाधीनता संग्राम का परिणाम कुछ और ही होता.

 

  • Moral message of the story :

  • अगर आप खुद देश के लिए अपनी जान दांव पर नहीं लगा सकते हैं,
    तो उन लोगों की मदद कीजिए जो देश के लिए मरने के लिए तैयार है. आप धन संपन्न या शक्ति संपन्न है,
    तो आपकी निष्ठा अपने देश के प्रति होनी चाहिए. अन्यथा आप खुद को सुरक्षित रखने के चक्कर में अपने
    देश से गद्दारी कर बैठेंगे. अगर देश सुरक्षित रहता है, तो आप फिर से धन कमा लेंगे. लेकिन अगर देश
    विदेशी आक्रमणकारियों या बुरे लोगो के चंगुल में फस जाता है. तो आपकी संस्कृति और परंपराएं दूषित
    हो जाएंगी. और आने वाली कई पीढ़ियों गुलामी की मानसिकता से विकृत हो जाएंगी.

 

  • ‘फर्ज  ‘ – 3rd Desh Bhakti Short Story in Hindi

     ” ऐ  लँगड़े चल  जल्दी खोल बोर  को l”  कबाड़ी    ने  कूड़े  बीनने  बाले व्यक्ति  जिसकी  एक  टाँग थी और बैसाखी  के सहारे  बोरे को घसीटता  हुआ लाया  था ,से मुँह बनाते  हुए कड़क  आवाज  में कहा l
    “नहीं रिजवान  भाई आज कबाड़ा  नहीं है ….l “
    “कबाड़ा नहीं है तो फिर क्या है इस बोरे में और यहाँ खड़ा  क्यों है ?”
    “कल मै तुमको  कबाड़ा लाकर दे  दुँगा आज तुम  मुझे कुछ पैसे  उधार  दे दो घर सामान  लेकर  जाऊँगा l” ,उसने डरते  हुए कहा l
    “चल ..चल आगे बढ़  …बड़ा आया उधार बाला  …और इस बोरे के कचरे  का आचार  डालेगा    क्या ?”कबाड़ी ने उसका  मजाक बनाते हुए कहा l सुनकर गली  के और भी दुकानदार हँसने लगे  वह सहम  गया l
    “लगता है लँगड़े को आज सोना  मिल  गया है l” पास की दुकानवाला  सोनू  मिस्त्री  गुटखे  को चबाते  हुए बोला  l
    सभी दुकानवाले  जोर  -जोर से हँसने लगे l
    “अरे खोलकर देखूँ तो सही लंगड़े की माया  l ” कबाड़ी ने जैसे ही हाथ बढ़ाया उसने अपना बोरा  कसकर  पकड़  लिया l
    “तीन -चार दूकान  वाले  इकट्ठे  हो गए और उससे  बोरा छीनकर  जमीन पर लौट  दिया वह चिल्लाकर  पागलों  की भाँति बिखरे  कागजों  को बटोरने  लगा l सभी दुकानदारों  के सिर शर्म  से झुक  गए ,क्योंकि वह पूरा  बोरा तिरंगो  से भरा  हुआ था l “
    आज पूरे दिन आजादी  के जश्न  में डूबे  ढोंगी  लोगों ने दिखाबा  कर देश के अभिमान  दिलों  की शान  तिरंगे को फहराकर  पैरों  से कुचलने  के लिए फेंक  दिया था l
    सभी दुकानदारों के सिर झुक गए
    तभी छोटे -छोटे दो बच्चे  भागते  हुए आये  ….
    “बापू  ..बापू आज देखो हमने और माँ ने दो बोरे तिरंगे बीने  माँ कह रही थी कि आज खाने  के लिए कुछ नहीं है हमने तो व्रत  रख लिया l”उसने अपने दोनों बच्चों को सीने से लगा लिया l
    लेखिका ……राशि सिंह
    मुरादाबाद उत्तर प्रदेश
    (अप्रकाशित एवं मौलिक लघुकथा )
  • Real Love Story in Hindi Language एक अनूठी लव स्टोरी awesome love story

 

error: Content is protected !!