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Desh Bhakti Short Story in Hindi - देशभक्ति कहानी desh bhakti kahani stories

 

  • सदा सुहागन – 1st Desh Bhakti Short Story in Hindi – देशभक्ति कहानी – desh bhakti kahani

  • सुषमा और अनुपमा दो सहेलियां थी. दोनों पढ़ने में बहुत तेज थी. उन दोनों में कॉलेज में फर्स्ट आने की हमेशा
    होड़ लगी रहती थी. दोनों ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली. कुछ समय के बाद उन दोनों के घर में शादी की बात की जाने लगी.
    अनुपमा बहुत महत्वाकांक्षी लड़की थी , वह चाहती थी कि उसकी शादी किसी बहुत ही अमीर लड़के से हो.
    जबकि सुषमा को किसी साधारण लड़के से शादी करने में कोई समस्या नहीं थी.

 

  • अनुपमा की शादी एक बड़े नेता के बेटे से हो गई. सुषमा की शादी एक सैनिक से हो गई. कुछ समय बाद
    दोनों मां बन गई. अनुपमा के बच्चे अपने पिता के धन और सत्ता के नशे में बहक गए. वे अपनी ही दुनिया
    में मस्त रहते थे, अबे अपनी मां की ना तो परवाह करते थे और ना उचित सम्मान देते थे. अनुपमा के पति
    राजनीति में बहुत ज्यादा व्यस्त रहते थे और अनुपमा के प्रति लापरवाह रहते थे. अब अनुपमा के पास सब
    कुछ था, सत्ता भी और पैसे भी. लेकिन उसके पास ना तो परिवार की खुशी थी और ना ही सुख शांति.
    सुषमा के पति कभी सीमा पर तैनात रहते थे, तो कभी किसी और स्थान पर. इस कारण सुषमा और
    उसके पति अक्सर दूर रहते थे. लेकिन दोनों के बीच बहुत प्यार था और वे दोनों एक दूसरे को अच्छे से समझते थे.
    एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे. सुषमा के दो बच्चे थे, एक लड़का और एक लड़की. सुषमा ने अपने बच्चों को
    संस्कारवान और समझदार बनाया था. सुषमा ने उनकी जरूरतें तो पूरी की, लेकिन उन्हें जरूरतों और फिजूलखर्ची
    के बीच का अंतर भी समझाया था. सुषमा ने मैं अपने बच्चों को आजादी तो दी थी, लेकिन उन्हें अनुशासन
    की सीमा में रहना भी सिखाया था. दूसरी ओर अनुपमा के पास सब कुछ होते हुए भी कुछ भी नहीं था,
    ना सुख, ना शांति, ना अपनापन और ना किसी बात का गर्व.
    समय बीतता गया, एक दिन खबर आई कि सुषमा के पति ने सीमा पर आतंकवादियों से लड़ाई करते
    हुए युद्ध में वीरगति पाई. सुषमा पर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. सरकार द्वारा शहीद सैनिकों को दी जाने
    वाली पेंशन और आर्थिक सहायता के कारण, सुषमा को कोई आर्थिक दिक्कत नहीं हुई. लेकिन वह फिर भी
    खुद को थोड़ा अकेला महसूस करने लगी. एक दिन अचानक अनुपमा सुषमा से मिलने आई, दोनों ने एक
    दूसरे का हाल चाल पूछा. अनुपमा सुषमा को यह बताने लगी कि  कैसे पैसा और ताकत होने के बावजूद कैसे
    वह अकेली पड़ गई है. कैसे अनुपमा नाममात्र की सुहागन रह गई है. अनुपमा ने सुषमा से कहा, तुम तो विधवा
    होते हुए भी सदा सुहागन रहोगी. क्योंकि तुम्हारे पास तुम्हारे पति के प्यार की सुनहरी यादें रहेंगी.
    तुम्हें इस बात का गर्व रहेगा, कि तुम्हारे पति देश के लिए जिए और देश के मरे. तुम्हारी जिंदगी मेरी जिंदगी
    से कहीं बेहतर है. मैं भले ही सदा सुहागन का जोड़ा पहनूँ, लेकिन वास्तव में सदा सुहागन तुम ही रहोगी.
  • Moral message of the story :

  • सैनिक के परिवार की जिंदगी किसी दूसरे की चमक-धमक भरी जिंदगी से ज्यादा बेहतर और सार्थक होती है.

 

  • गद्दारों की कौम – 2nd Desh Bhakti Short Story in Hindi

  • बात प्रथम स्वाधीनता संग्राम की है. झांसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो चुकी थी.
    झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अकेले हीं, अंग्रेजों का सामना करने के लिए तैयार थी.
    लेकिन उनके पास पर्याप्त धन नहीं था, जिससे वो विशाल सेना का निर्माण कर सके.
    और अपनी सेना के लिए ज्यादा हथियारों की व्यवस्था कर सके. रानी ने झांसी के सभी
    धनाढ्य लोगों और व्यापारियों को अपने दरबार में बुलाया. और उनके सामने अपनी समस्या
    बताई तथा उनसे आर्थिक सहयोग मांगा. वे सभी व्यापारी और धनाढ्य लोग अपने अपने घर चले गए.
    उनमें से कुछ लोगों ने रानी को सहयोग देने का निश्चय किया. ज्यादातर दूसरे लोगों ने रानी की बजाए
    अंग्रेजों के पक्ष का सहयोग करना बेहतर समझा. क्योंकि अंग्रेज ज्यादा मजबूत थे और उन्होंने अपने
    सहयोगियो को इस बात का आश्वासन दिया था कि वे अपने सहयोगियों से उनका धन नहीं छीनेंगे.
    और इसका नतीजा यह हुआ कि रानी लक्ष्मीबाई ना तो अपनी सेना का आकार है ही बढ़ा पाई और
    ना रानी की सेना बहुत ज्यादा हथियारों से युक्त हो पाई.
    जब रानी लक्ष्मीबाई और उनकी सेना की लड़ाई अंग्रेजों से शुरू हुई, तो उन्होंने अंग्रेजों से वीरता से लड़ाई लड़ी.
    लेकिन छोटी और कमजोर सेना अंग्रेजों से पराजित हो गई. रानी लक्ष्मीबाई भी बुरी तरह से हो गए घायल हो गई.
    घायल रानी को उनके कुछ वफादार सैनिक बैलगाड़ी से युद्ध क्षेत्र से दूर एक झोपड़ी में ले गए. रानी को अपनी
    मृत्यु का एहसास हो चुका था, रानी ने कहा मेरी मृत्यु के बाद झोपड़ी के साथ ही मुझे जला देना.
    ताकि मरने के बाद भी अंग्रेज मेरी लाश को भी हाथ ना लगा सके. रानी वीरगति को प्राप्त हुई.
    रानी के कहे अनुसार, उसे झोपड़ी के साथ रानी की चिता जला दी गई. युद्ध में झांसी की हार हुई और
    अंग्रेजों ने झांसी पर कब्जा कर लिया. अगर उन धनाढ्य लोगों ने लक्ष्मीबाई की मदद की होती है,
    तो अंग्रेज हार जाते. और प्रथम स्वाधीनता संग्राम का परिणाम कुछ और ही होता.

 

  • Moral message of the story :

  • अगर आप खुद देश के लिए अपनी जान दांव पर नहीं लगा सकते हैं,
    तो उन लोगों की मदद कीजिए जो देश के लिए मरने के लिए तैयार है. आप धन संपन्न या शक्ति संपन्न है,
    तो आपकी निष्ठा अपने देश के प्रति होनी चाहिए. अन्यथा आप खुद को सुरक्षित रखने के चक्कर में अपने
    देश से गद्दारी कर बैठेंगे. अगर देश सुरक्षित रहता है, तो आप फिर से धन कमा लेंगे. लेकिन अगर देश
    विदेशी आक्रमणकारियों या बुरे लोगो के चंगुल में फस जाता है. तो आपकी संस्कृति और परंपराएं दूषित
    हो जाएंगी. और आने वाली कई पीढ़ियों गुलामी की मानसिकता से विकृत हो जाएंगी.

 

  • ‘फर्ज  ‘ – 3rd Desh Bhakti Short Story in Hindi

     ” ऐ  लँगड़े चल  जल्दी खोल बोर  को l”  कबाड़ी    ने  कूड़े  बीनने  बाले व्यक्ति  जिसकी  एक  टाँग थी और बैसाखी  के सहारे  बोरे को घसीटता  हुआ लाया  था ,से मुँह बनाते  हुए कड़क  आवाज  में कहा l
    “नहीं रिजवान  भाई आज कबाड़ा  नहीं है ….l “
    “कबाड़ा नहीं है तो फिर क्या है इस बोरे में और यहाँ खड़ा  क्यों है ?”
    “कल मै तुमको  कबाड़ा लाकर दे  दुँगा आज तुम  मुझे कुछ पैसे  उधार  दे दो घर सामान  लेकर  जाऊँगा l” ,उसने डरते  हुए कहा l
    “चल ..चल आगे बढ़  …बड़ा आया उधार बाला  …और इस बोरे के कचरे  का आचार  डालेगा    क्या ?”कबाड़ी ने उसका  मजाक बनाते हुए कहा l सुनकर गली  के और भी दुकानदार हँसने लगे  वह सहम  गया l
    “लगता है लँगड़े को आज सोना  मिल  गया है l” पास की दुकानवाला  सोनू  मिस्त्री  गुटखे  को चबाते  हुए बोला  l
    सभी दुकानवाले  जोर  -जोर से हँसने लगे l
    “अरे खोलकर देखूँ तो सही लंगड़े की माया  l ” कबाड़ी ने जैसे ही हाथ बढ़ाया उसने अपना बोरा  कसकर  पकड़  लिया l
    “तीन -चार दूकान  वाले  इकट्ठे  हो गए और उससे  बोरा छीनकर  जमीन पर लौट  दिया वह चिल्लाकर  पागलों  की भाँति बिखरे  कागजों  को बटोरने  लगा l सभी दुकानदारों  के सिर शर्म  से झुक  गए ,क्योंकि वह पूरा  बोरा तिरंगो  से भरा  हुआ था l “
    आज पूरे दिन आजादी  के जश्न  में डूबे  ढोंगी  लोगों ने दिखाबा  कर देश के अभिमान  दिलों  की शान  तिरंगे को फहराकर  पैरों  से कुचलने  के लिए फेंक  दिया था l
    सभी दुकानदारों के सिर झुक गए
    तभी छोटे -छोटे दो बच्चे  भागते  हुए आये  ….
    “बापू  ..बापू आज देखो हमने और माँ ने दो बोरे तिरंगे बीने  माँ कह रही थी कि आज खाने  के लिए कुछ नहीं है हमने तो व्रत  रख लिया l”उसने अपने दोनों बच्चों को सीने से लगा लिया l
    लेखिका ……राशि सिंह
    मुरादाबाद उत्तर प्रदेश
    (अप्रकाशित एवं मौलिक लघुकथा )
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