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वृन्द के दोहे – Kavi Vrind Ke Dohe With Meaning in Hindi :

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वृन्द के दोहे – Kavi Vrind Ke Dohe With Meaning in Hindi
वृन्द के दोहे - Kavi Vrind Ke Dohe With Meaning in Hindi

वृन्द के दोहे – Kavi Vrind Ke Dohe With Meaning in Hindi

  • अपनी पहुँच बिचारी के करतब कीजे दौर।
    तेते पाँव पसारिये जेती लांबी सौर॥
    अर्थ: वृन्द जी इस दोहे में कहते हैं कि व्यक्ति को पहले अपनी क्षमता का आंकलन करने के बाद ही अपना लक्ष्य निश्चित करना चाहिए. ताकि आप अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें. अपनी क्षमता का सही आंकलन किये बिना लक्ष्य पाने की लालसा करना चादर से बहार पैर पसारने जैसा है.
  • विद्या धन उद्यम बिना, कहो जो पावे कौन
    बिना डुलाये न मिले, ज्यों पंखे की पौन।
    अर्थ: वृन्द जी इस दोहे में कहते हैं कि जीवन में कुछ भी पाने के लिए परिश्रम करना पड़ता है. मेहनत के बिना कोई विद्या नहीं प्राप्त कर सकता है. ठीक वैसे हीं जैसे पंखे को हिलाये बिना हवा नहीं मिलती है.
  • सबै सहायक सबल के, कोउ न निबल सहाय ।
    पवन जगावत आग को, दीपहिं देत बुझाय ॥
    अर्थ: वृन्द जी इस दोहे में कहते हैं कि मजबूत व्यक्ति की दुनिया में हर कोई सहायता करता है, कमजोर व्यक्ति की कोई सहायता नहीं करता है. जैसे हवा आग को बढ़ाती है लेकिन दीपक को बुझा देती है.
  • अति हठ मत कर हठ बढ़े, बात न करिहै कोय ।

    ज्यौं –ज्यौं भीजै कामरी, त्यौं-त्यौं भारी होय ॥

  • अर्थ: वृन्द जी इस दोहे में कहते हैं कि ज्यादा जिद नहीं करनी चाहिए. क्योंकि ज्यादा जिद करने से लोग बात करना और रूठने को महत्व नहीं देने लगते हैं. ठीक उसी तरह जैसे की कोई छोटा कम्बल जैसे-जैसे भींगता है वैसे-वैसे भारी होता जाता है.

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  • जैसे बंधन प्रेम कौ, तैसो बन्ध न और ।
    काठहिं भेदै कमल को, छेद न निकलै भौंर ॥
    अर्थ: वृन्द जी इस दोहे में कहते हैं कि जैसा प्यार का बंधन होता है, वैसा बंधन किसी और चीज का नहीं होता है. जैसे कि लकड़ी के काठ को छेद देने वाला भौंरा कमल को नहीं छेदता है.
  • वृन्द के दोहे – Kavi Vrind Ke Dohe With Meaning in Hindi
  • स्वारथ के सबहिं सगे,बिन स्वारथ कोउ नाहिं ।
    सेवै पंछी सरस तरु, निरस भए उड़ि जाहिं ॥
    अर्थ: वृन्द जी इस दोहे में कहते हैं कि इस दुनिया में सभी स्वार्थवश दूसरों से जुड़े होते हैं या उन्हें अपना कहते हैं. ठीक वैसे हीं हरे-भरे वृक्ष में पक्षी रहते हैं, लेकिन उसके सूख जाने पर वे उस पेड़ को छोड़कर उड़ जाते हैं.
  • मूढ़ तहाँ ही मानिये, जहाँ न पंडित होय ।
    दीपक को रवि के उदै, बात न पूछै कोय ॥
    अर्थ: वृन्द जी इस दोहे में कहते हैं कि मूर्ख व्यक्ति को वहीं महत्व देना चाहिए जहाँ कोई विद्वान ना हो. क्योंकि विद्वान के होने के बाद मूर्ख का कोई महत्व नहीं रह जाता है. जैसे कि सूर्य के उदय हो जाने के बाद दीपक को कोई महत्व नहीं देता है.
  • बिन स्वारथ कैसे सहे, कोऊ करुवे बैन।

    लात खाय पुचकारिये, होय दुधारू धैन॥

  • अर्थ: वृन्द जी इस दोहे में कहते हैं कि बिना स्वार्थ के कोई भी व्यक्ति कड़वे वचन नहीं सहता है. जैसे दुधारू गाय की लात खाने के बाद भी व्यक्ति उसे दुलारता और पुचकारता है क्योंकि दूध उसी से मिलना है.

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  • कारज धीरे होत है, काहे होत अधीर।
    समय पाय तरुवर फरै, केतिक सींचो नीर।।
    अर्थ: वृन्द जी इस दोहे में कहते हैं कि कोई भी काम धैर्य के साथ होता है. धीरज खोना अच्छा नहीं होता होता है. ठीक वैसे हीं जैसे वृक्ष पर समय आने पर हीं फल लगते हैं, चाहे उसे समय से पहले कितने हीं पानी से सींचा जाये.
  • क्यों कीजे ऐसो जतन, जाते काज न होय ।
    परबत पर खोदै कुआँ, कैसे निकरै तोय ॥
    अर्थ: वृन्द जी इस दोहे में कहते हैं कि ऐसा प्रयास नहीं करना चाहिए जिससे कि काम ना बने. जैसे कि पर्वत पर कुआं खोदने से कोई फायदा नहीं होता.
  • जाकौ बुधि-बल होत है, ताहि न रिपु को त्रास ।
    घन –बूँदें कह करि सके, सिर पर छतना जास ॥
    अर्थ: वृन्द जी इस दोहे में कहते हैं कि जिसके पास बुद्धि रूपी बल होता है, उसे शत्रु का भय नहीं होता है. ठीक उसी तरह जिसके सिर पर छत हो, बादल और वर्षा की बूंदों से उसे कोई भय नहीं होता है.

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  • निरस बात, सोई सरस, जहाँ होय हिय हेत ।

    गारी प्यारी लगै, ज्यों-ज्यों समधन देत ।।

  • अर्थ: वृन्द जी इस दोहे में कहते हैं कि जिस व्यक्ति के प्रति हमारे ह्रदय में लगाव और स्नेह का भाव होता है, उस व्यक्ति की नीरस बात भी सरस लगती है. जैसे समधिन के द्वारा दी जाने वाली गालियाँ भी अच्छी लगती हैं क्योंकि उन गालियों में स्नेह का भाव होता है.
  • जो जाको गुन जानहि सो तिहि आदर देत।
    काकिल अंबहि लेत है काग निबोरी लेत।।
  • अर्थ: वृन्द जी इस दोहे में कहते हैं कि जो जिसका गुण जानता है वो उसी को आदर देता है. जिस प्रकार कोयल आम खाती है और कौआ नीम की निबौरी खाता है.
  • अति परिचै ते होत है, अरुचि अनादर भाय।
    मलयागिरि की भीलनी, चंदन देत जराय॥
    अर्थ: वृन्द जी इस दोहे में कहते हैं कि किसी के लिए अति सुलभ हो जाने से सामने वाले व्यक्ति की आप में रूचि नहीं रह जाती है. और व्यक्ति का अपमान होता है. जैसे कि मलयगिरी पर्वत की भीलनी उस चन्दन की लकड़ियों से खाना पकाती है, जो चन्दन सभी स्थानों पर महत्व पाता है.
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