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खूनी हस्ताक्षर कविता |||| Khooni Hastakshar Poem desh bhakti poem in Hindi :

खूनी हस्ताक्षर कविता khooni hastakshar poem desh bhakti poem in Hindi
Khooni Hastakshar Poem - खूनी हस्ताक्षर कविता desh bhakti poem in hindi

खूनी हस्ताक्षर कविता Khooni Hastakshar Poem – desh bhakti poem in hindi

  • खूनी हस्ताक्षर

    वह खून कहो किस मतलब का
    जिसमें उबाल का नाम नहीं।
    वह खून कहो किस मतलब का
    आ सके देश के काम नहीं।
    वह खून कहो किस मतलब का
    जिसमें जीवन, न रवानी है!
    जो परवश होकर बहता है,
    वह खून नहीं, पानी है!
    उस दिन लोगों ने सही-सही
    खून की कीमत पहचानी थी।
    जिस दिन सुभाष ने बर्मा में
    मॉंगी उनसे कुरबानी थी।
    बोले, “स्वतंत्रता की खातिर
    बलिदान तुम्हें करना होगा।
    तुम बहुत जी चुके जग में,
    लेकिन आगे मरना होगा।
    आज़ादी के चरणें में जो,
    जयमाल चढ़ाई जाएगी।
    वह सुनो, तुम्हारे शीशों के
    फूलों से गूँथी जाएगी।
    आजादी का संग्राम कहीं
    पैसे पर खेला जाता है?
    यह शीश कटाने का सौदा
    नंगे सर झेला जाता है”
    यूँ कहते-कहते वक्ता की
    आंखों में खून उतर आया!
    मुख रक्त-वर्ण हो दमक उठा
    दमकी उनकी रक्तिम काया!
    आजानु-बाहु ऊँची करके,
    वे बोले, “रक्त मुझे देना।
    इसके बदले भारत की
    आज़ादी तुम मुझसे लेना।”
    हो गई सभा में उथल-पुथल,
    सीने में दिल न समाते थे।
    स्वर इनकलाब के नारों के
    कोसों तक छाए जाते थे।
    “हम देंगे-देंगे खून”
    शब्द बस यही सुनाई देते थे।
    रण में जाने को युवक खड़े
    तैयार दिखाई देते थे।
    बोले सुभाष, “इस तरह नहीं,
    बातों से मतलब सरता है।
    लो, यह कागज़, है कौन यहॉं
    आकर हस्ताक्षर करता है?
    इसको भरनेवाले जन को
    सर्वस्व-समर्पण काना है।
    अपना तन-मन-धन-जन-जीवन
    माता को अर्पण करना है।
    पर यह साधारण पत्र नहीं,
    आज़ादी का परवाना है।
    इस पर तुमको अपने तन का
    कुछ उज्जवल रक्त गिराना है!
    वह आगे आए जिसके तन में
    खून भारतीय बहता हो।
    वह आगे आए जो अपने को
    हिंदुस्तानी कहता हो!
    वह आगे आए, जो इस पर
    खूनी हस्ताक्षर करता हो!
    मैं कफ़न बढ़ाता हूँ, आए
    जो इसको हँसकर लेता हो!”
    सारी जनता हुंकार उठी-
    हम आते हैं, हम आते हैं!
    माता के चरणों में यह लो,
    हम अपना रक्त चढाते हैं!
    साहस से बढ़े युबक उस दिन,
    देखा, बढ़ते ही आते थे!
    चाकू-छुरी कटारियों से,
    वे अपना रक्त गिराते थे!
    फिर उस रक्त की स्याही में,
    वे अपनी कलम डुबाते थे!
    आज़ादी के परवाने पर
    हस्ताक्षर करते जाते थे!
    उस दिन तारों ने देखा था
    हिंदुस्तानी विश्वास नया।
    जब लिक्खा महा रणवीरों ने
    ख़ूँ से अपना इतिहास नया।
    – गोपाल प्रसाद व्यास

  • हिंदुस्तान हमारा है

    कोटि-कोटि कंठों से गूजा
    प्यारा कौमी नारा है
    हिन्दुस्तान हमारा है।
    हिन्दुस्तान हमारा है॥
    मन्दिर और मीनार हमारे
    गाँव, शहर, बाजार हमारे।
    चन्दा-सूरज, गंगा-जमुना
    पैगम्बर-अवतार हमारे।
    हिन्दू, मुसलमान, ईसाई
    सिक्ख, पारसी, जैनी भाई।
    सभी इसी धरती के वासी
    सबके दिल में यही समाई।
    सिर्फ हमारा देश यहां पर
    नहीं और का चारा है॥
    हिन्दुस्तान हमारा है।
    हिन्दुस्तान हमारा है॥
    धरती है आज़ाद, हवा
    आज़ाद तरंगें लाती है।
    फूल-फूल आज़ाद कली
    आज़ाद खड़ी मुस्काती है।
    पंछी हैं आज़ाद चहकते
    उड़ते-फिरते जाते हैं।
    भौंरे देखो आज़ादी का
    नया तराना गाते हैं।
    उठो जवानी, आज़ादी पर
    पहला हाथ तुम्हारा है॥
    हिन्दुस्तान हमारा है।
    हिन्दुस्तान हमारा है॥
    इंकलाब हो गया, देश को
    हम आज़ाद बनाएंगे।
    जुल्मों के तूफान नहीं
    मंजिल से हमें हटाएंगे।
    हम आज़ादी के सैनिक हैं,
    मर-मर बढ़ते जाएंगे।
    तलवारों की धारों पर भी
    आगे कदम उठाएंगे।
    आज गुलामी के शासन को
    फिर हमने ललकारा है॥
    हिन्दुस्तान हमारा है।
    हिन्दुस्तान हमारा है॥
    उठो हिमालय, आज तुम्हारे
    कौन पार जा सकता है?
    हिन्द महासागर की बोलो
    कौन थाह पा सकता है?
    आज़ादी की बाढ़ नहीं
    संगीनों से रुक सकती है।
    अरे जवानी कभी नहीं
    जंजीरों से झुक सकती है।
    गरमी की लपटों ने सोखी
    कभी न बहती धारा है॥
    हिन्दुस्तान हमारा है।
    हिन्दुस्तान हमारा है॥
    – गोपाल प्रसाद व्यास
    Short Desh Bhakti Poem in Hindi देशभक्ति कविता हिन्दी में Desh Bhakti Kavita

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