महादेवी वर्मा की कविताएँ – Mahadevi Verma Poem in Hindi :

महादेवी वर्मा की कविताएँ – Mahadevi Verma Poem in Hindi Kavitayein Poetry
महादेवी वर्मा की कविताएँ - Mahadevi Verma Poem in Hindi Kavitayein Poetry

महादेवी वर्मा की कविताएँ – Mahadevi Verma Poem in Hindi Kavitayein Poetry

  • जो तुम आ जाते एक बार
  • जो तुम आ जाते एक बार
    कितनी करूणा कितने संदेश
    पथ में बिछ जाते बन पराग
    गाता प्राणों का तार तार
    अनुराग भरा उन्माद राग
    आँसू लेते वे पथ पखार
    जो तुम आ जाते एक बार
    हँस उठते पल में आर्द्र नयन
    धुल जाता होठों से विषाद
    छा जाता जीवन में बसंत
    लुट जाता चिर संचित विराग
    आँखें देतीं सर्वस्व वार
    जो तुम आ जाते एक बार
    – महादेवी वर्मा

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  • अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी
  • आँधी आई जोर शोर से,
    डालें टूटी हैं झकोर से।
    उड़ा घोंसला अंडे फूटे,
    किससे दुख की बात कहेगी!
    अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी?
    हमने खोला आलमारी को,
    बुला रहे हैं बेचारी को।
    पर वो चीं-चीं कर्राती है
    घर में तो वो नहीं रहेगी!
    घर में पेड़ कहाँ से लाएँ,
    कैसे यह घोंसला बनाएँ!
    कैसे फूटे अंडे जोड़े,
    किससे यह सब बात कहेगी!
    अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी?
    – महादेवी वर्मा

महादेवी वर्मा की कविताएँ – Mahadevi Verma Poem in Hindi Kavitayein Poetry

  • दीपक अब रजनी जाती रे
  • दीपक अब रजनी जाती रे
    जिनके पाषाणी शापों के
    तूने जल जल बंध गलाए
    रंगों की मूठें तारों के 
    खील वारती आज दिशाएँ
    तेरी खोई साँस विभा बन
    भू से नभ तक लहराती रे
    दीपक अब रजनी जाती रे
    लौ की कोमल दीप्त अनी से
    तम की एक अरूप शिला पर
    तू ने दिन के रूप गढ़े शत 
    ज्वाला की रेखा अंकित कर
    अपनी कृति में आज
    अमरता पाने की बेला आती रे
    दीपक अब रजनी जाती रे
    धरती ने हर कण सौंपा
    उच्छवास शून्य विस्तार गगन में
    न्यास रहे आकार धरोहर
    स्पंदन की सौंपी जीवन रे
    अंगारों के तीर्थ स्वर्ण कर
    लौटा दे सबकी थाती रे
    दीपक अब रजनी जाती रे
    – महादेवी वर्मा

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  • उर तिमिरमय घर तिमिरमय
  • उर तिमिरमय घर तिमिरमय
    चल सजनि दीपक बार ले!
    राह में रो रो गये हैं
    रात और विहान तेरे
    काँच से टूटे पड़े यह
    स्वप्न, भूलें, मान तेरे;
    फूलप्रिय पथ शूलमय
    पलकें बिछा सुकुमार ले!
    तृषित जीवन में घिर घन-
    बन; उड़े जो श्वास उर से;
    पलक-सीपी में हुए मुक्ता
    सुकोमल और बरसे;
    मिट रहे नित धूलि में 
    तू गूँथ इनका हार ले !
    मिलन वेला में अलस तू
    सो गयी कुछ जाग कर जब,
    फिर गया वह, स्वप्न में
    मुस्कान अपनी आँक कर तब।
    आ रही प्रतिध्वनि वही फिर
    नींद का उपहार ले !
    चल सजनि दीपक बार ले !
    – महादेवी वर्मा
  • महादेवी वर्मा की कविताएँ – Mahadevi Verma Poem in Hindi

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