Generic selectors
Exact matches only
Search in title
Search in content

मैथिलीशरण गुप्त की 7 कविताएँ – Maithili Sharan Gupt Poems in Hindi :

Maithili Sharan Gupt Poems in Hindi मैथिलीशरण गुप्त की 7 कविताएँ 
maithili sharan gupt poems in hindi

मैथिलीशरण गुप्त की कविताएँ 

  • नर हो, न निराश करो मन को

    नर हो, न निराश करो मन को
    कुछ काम करो, कुछ काम करो
    जग में रह कर कुछ नाम करो
    यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
    समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
    कुछ तो उपयुक्त करो तन को
    नर हो, न निराश करो मन को।
    संभलो कि सुयोग न जाय चला
    कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
    समझो जग को न निरा सपना
    पथ आप प्रशस्त करो अपना
    अखिलेश्वर है अवलंबन को
    नर हो, न निराश करो मन को।
    जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
    फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
    तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
    उठके अमरत्व विधान करो
    दवरूप रहो भव कानन को
    नर हो न निराश करो मन को।
    निज गौरव का नित ज्ञान रहे
    हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
    मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
    सब जाय अभी पर मान रहे
    कुछ हो न तज़ो निज साधन को
    नर हो, न निराश करो मन को।
    प्रभु ने तुमको कर दान किए
    सब वांछित वस्तु विधान किए
    तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
    फिर है यह किसका दोष कहो
    समझो न अलभ्य किसी धन को
    नर हो, न निराश करो मन को।
    किस गौरव के तुम योग्य नहीं
    कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
    जान हो तुम भी जगदीश्वर के
    सब है जिसके अपने घर के
    फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
    नर हो, न निराश करो मन को।
    करके विधि वाद न खेद करो
    निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो
    बनता बस उद्‌यम ही विधि है
    मिलती जिससे सुख की निधि है
    समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
    नर हो, न निराश करो मन को
    कुछ काम करो, कुछ काम करो।

  • दोनों ओर प्रेम पलता है

    सखि, पतंग भी जलता है
    हा! दीपक भी जलता है!
    सीस हिलाकर दीपक कहता–
    बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता?’
    पर पतंग पड़ कर ही रहता
    कितनी विह्वलता है!
    दोनों ओर प्रेम पलता है।
    बचकर हाय! पतंग मरे क्या?
    प्रणय छोड़ कर प्राण धरे क्या?
    जले नही तो मरा करे क्या?
    क्या यह असफलता है!
    दोनों ओर प्रेम पलता है।
    कहता है पतंग मन मारे–
    तुम महान, मैं लघु, पर प्यारे,
    क्या न मरण भी हाथ हमारे?
    शरण किसे छलता है?’
    दोनों ओर प्रेम पलता है।
    दीपक के जलने में आली,
    फिर भी है जीवन की लाली।
    किन्तु पतंग-भाग्य-लिपि काली,
    किसका वश चलता है?
    दोनों ओर प्रेम पलता है।
    जगती वणिग्वृत्ति है रखती,
    उसे चाहती जिससे चखती;
    काम नहीं, परिणाम निरखती।
    मुझको ही खलता है।
    दोनों ओर प्रेम पलता है।

  • अर्जुन की प्रतिज्ञा

    उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उसका लगा,
    मानों हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा ।
    मुख-बाल-रवि-सम लाल होकर ज्वाल सा बोधित हुआ,
    प्रलयार्थ उनके मिस वहाँ क्या काल ही क्रोधित हुआ ?
    युग-नेत्र उनके जो अभी थे पूर्ण जल की धार-से,

    अब रोश के मारे हुए, वे दहकते अंगार-से ।
    निश्चय अरुणिमा-मिस अनल की जल उठी वह ज्वाल ही,
    तब तो दृगों का जल गया शोकाश्रु जल तत्काल ही ।
    साक्षी रहे संसार करता हूँ प्रतिज्ञा पार्थ मैं,
    पूरा करूँगा कार्य सब कथानुसार यथार्थ मैं ।
    जो एक बालक को कपट से मार हँसते हैँ अभी,
    वे शत्रु सत्वर शोक-सागर-मग्न दीखेंगे सभी ।
    अभिमन्यु-धन के निधन से कारण हुआ जो मूल है,
    इससे हमारे हत हृदय को, हो रहा जो शूल है,
    उस खल जयद्रथ को जगत में मृत्यु ही अब सार है,
    उन्मुक्त बस उसके लिये रौख नरक का द्वार है ।
    उपयुक्त उस खल को न यद्यपि मृत्यु का भी दंड है,
    पर मृत्यु से बढ़कर न जग में दण्ड और प्रचंड है ।
    अतएव कल उस नीच को रण-मघ्य जो मारूँ न मैं,
    तो सत्य कहता हूँ कभी शस्त्रास्त्र फिर धारूँ न मैं ।
    अथवा अधिक कहना वृथा है, पार्थ का प्रण है यही,
    साक्षी रहे सुन ये बचन रवि, शशि, अनल, अंबर, मही ।
    सूर्यास्त से पहले न जो मैं कल जयद्रथ-वधकरूँ,
    तो शपथ करता हूँ स्वयं मैं ही अनल में जल मरूँ ।

  • मातृभूमि

    नीलांबर परिधान हरित तट पर सुन्दर है।
    सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥
    नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं।
    बंदीजन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है॥
    करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की।
    हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की॥
    जिसके रज में लोट-लोट कर बड़े हुये हैं।
    घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुये हैं॥
    परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये।
    जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाये॥
    हम खेले-कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में।
    हे मातृभूमि! तुझको निरख, मग्न क्यों न हों मोद में?
    पा कर तुझसे सभी सुखों को हमने भोगा।
    तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा?
    तेरी ही यह देह, तुझी से बनी हुई है।
    बस तेरे ही सुरस-सार से सनी हुई है॥
    फिर अन्त समय तू ही इसे अचल देख अपनायेगी।
    हे मातृभूमि! यह अन्त में तुझमें ही मिल जायेगी॥
    निर्मल तेरा नीर अमृत के से उत्तम है।
    शीतल मंद सुगंध पवन हर लेता श्रम है॥
    षट्ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भुत क्रम है।
    हरियाली का फर्श नहीं मखमल से कम है॥
    शुचि-सुधा सींचता रात में, तुझ पर चन्द्रप्रकाश है।
    हे मातृभूमि! दिन में तरणि, करता तम का नाश है॥
    सुरभित, सुन्दर, सुखद, सुमन तुझ पर खिलते हैं।
    भाँति-भाँति के सरस, सुधोपम फल मिलते है॥
    औषधियाँ हैं प्राप्त एक से एक निराली।
    खानें शोभित कहीं धातु वर रत्नों वाली॥
    जो आवश्यक होते हमें, मिलते सभी पदार्थ हैं।
    हे मातृभूमि! वसुधा, धरा, तेरे नाम यथार्थ हैं॥
    क्षमामयी, तू दयामयी है, क्षेममयी है।
    सुधामयी, वात्सल्यमयी, तू प्रेममयी है॥
    विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुःखहर्त्री है।
    भय निवारिणी, शान्तिकारिणी, सुखकर्त्री है॥
    हे शरणदायिनी देवि, तू करती सब का त्राण है।
    हे मातृभूमि! सन्तान हम, तू जननी, तू प्राण है॥
    जिस पृथ्वी में मिले हमारे पूर्वज प्यारे।
    उससे हे भगवान! कभी हम रहें न न्यारे॥
    लोट-लोट कर वहीं हृदय को शान्त करेंगे।
    उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे॥
    उस मातृभूमि की धूल में, जब पूरे सन जायेंगे।
    होकर भव-बन्धन- मुक्त हम, आत्म रूप बन जायेंगे॥

  • भारत माता का मंदिर

    यह भारत माता का मंदिर यह
    समता का संवाद जहाँ,
    सबका शिव कल्याण यहाँ है
    पावें सभी प्रसाद यहाँ ।
    जाति-धर्म या संप्रदाय का,
    नहीं भेद-व्यवधान यहाँ,
    सबका स्वागत, सबका आदर
    सबका सम सम्मान यहाँ ।
    राम, रहीम, बुद्ध, ईसा का,
    सुलभ एक सा ध्यान यहाँ,
    भिन्न-भिन्न भव संस्कृतियों के
    गुण गौरव का ज्ञान यहाँ ।
    नहीं चाहिए बुद्धि बैर की
    भला प्रेम का उन्माद यहाँ
    सबका शिव कल्याण यहाँ है,
    पावें सभी प्रसाद यहाँ ।
    सब तीर्थों का एक तीर्थ यह
    ह्रदय पवित्र बना लें हम
    आओ यहाँ अजातशत्रु बन,
    सबको मित्र बना लें हम ।
    रेखाएँ प्रस्तुत हैं, अपने
    मन के चित्र बना लें हम ।
    सौ-सौ आदर्शों को लेकर
    एक चरित्र बना लें हम ।
    बैठो माता के आँगन में
    नाता भाई-बहन का
    समझे उसकी प्रसव वेदना
    वही लाल है माई का
    एक साथ मिल बाँट लो
    अपना हर्ष विषाद यहाँ
    सबका शिव कल्याण यहाँ है
    पावें सभी प्रसाद यहाँ ।
    मिला सेव्य का हमें पुज़ारी
    सकल काम उस न्यायी का
    मुक्ति लाभ कर्तव्य यहाँ है
    एक एक अनुयायी का
    कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
    उठे एक जयनाद यहाँ
    सबका शिव कल्याण यहाँ है
    पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

  • सरकस

    होकर कौतूहल के बस में,
    गया एक दिन मैं सरकस में।
    भय-विस्मय के खेल अनोखे,
    देखे बहु व्यायाम अनोखे।
    एक बड़ा-सा बंदर आया,
    उसने झटपट लैम्प जलाया।
    डट कुर्सी पर पुस्तक खोली,
    आ तब तक मैना यौं बोली।
    ‘‘हाजिर है हजूर का घोड़ा,’’
    चौंक उठाया उसने कोड़ा।
    आया तब तक एक बछेरा,
    चढ़ बंदर ने उसको फेरा।
    टट्टू ने भी किया सपाटा,
    टट्टी फाँदी, चक्कर काटा।
    फिर बंदर कुर्सी पर बैठा,
    मुँह में चुरट दबाकर ऐंठा।
    माचिस लेकर उसे जलाया,
    और धुआँ भी खूब उड़ाया।
    ले उसकी अधजली सलाई,
    तोते ने आ तोप चलाई।
    एक मनुष्य अंत में आया,
    पकड़े हुए सिंह को लाया।
    मनुज-सिंह की देख लड़ाई,
    की मैंने इस भाँति बड़ाई-
    किसे साहसी जन डरता है,
    नर नाहर को वश करता है।
    मेरा एक मित्र तब बोला,
    भाई तू भी है बम भोला।
    यह सिंही का जना हुआ है,
    किंतु स्यार यह बना हुआ है।
    यह पिंजड़े में बंद रहा है,
    नहीं कभी स्वच्छंद रहा है।
    छोटे से यह पकड़ा आया,
    मार-मार कर गया सिखाया।
    अपने को भी भूल गया है,
    आती इस पर मुझे दया है।

  • मनुष्यता

    विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी¸
    मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी।
    हुई न यों सु–मृत्यु तो वृथा मरे¸ वृथा जिये¸
    नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए।
    यही पशु–प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे¸
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।
    उसी उदार की कथा सरस्वती बखानवी¸
    उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
    उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती;
    तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
    अखण्ड आत्मभाव जो असीम विश्व में भरे¸
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिये मरे।।
    सहानुभूति चाहिए¸ महाविभूति है वही;
    वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
    विरूद्धवाद बुद्ध का दया–प्रवाह में बहा¸
    विनीत लोक वर्ग क्या न सामने झुका रहे?
    अहा! वही उदार है परोपकार जो करे¸
    वहीं मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।
    अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े¸
    समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े–बड़े।
    परस्परावलम्ब से उठो तथा बढ़ो सभी¸
    अभी अमत्र्य–अंक में अपंक हो चढ़ो सभी।
    रहो न यों कि एक से न काम और का सरे¸
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।
    मनुष्य मात्र बन्धु है” यही बड़ा विवेक है¸
    पुराणपुरूष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।
    फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद है¸
    परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं।
    अनर्थ है कि बंधु हो न बंधु की व्यथा हरे¸
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।
    चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए¸
    विपत्ति विप्र जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
    घटे न हेल मेल हाँ¸ बढ़े न भिन्नता कभी¸
    अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
    तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे¸
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।
    रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में
    सन्त जन आपको करो न गर्व चित्त में
    अन्त को हैं यहाँ त्रिलोकनाथ साथ में
    दयालु दीन बन्धु के बडे विशाल हाथ हैं
    अतीव भाग्यहीन हैं अंधेर भाव जो भरे
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

  • नर हो, न निराश करो मन को – Nar Ho Na Nirash Karo Man Ko

.

About Suvichar Hindi .Com ( Read here SEO, Tips, Hindi Quotes, Shayari, Status, Poem, Mantra : )

SuvicharHindi.Com में आप पढ़ेंगे, Hindi Quotes, Status, Shayari, Tips, Shlokas, Mantra, Poem इत्यादि|
Previous आम के 25 फायदे || Benefits of Mango in Hindi aam ke fayde remedies हानि :
Next 46 Vidur Niti in Hindi with meaning महात्मा विदुर की नीति sampurn quote sutr :

5 comments

  1. Riddhi

    WE ARE HUMANS.

  2. Deepti

    V nice collection

  3. hari

    dhavyawad!

  4. setharam

    Ver nice I love very much it

  5. Rajeshwar Paikara

    All is well
    I read some topic
    I really like these

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.