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Mitrata Par Dohe मित्रता पर 15 दोहे Dosti Pe Doha True Friendship dohas quotes lines

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मित्रता पर 15 दोहे Dosti Pe Doha True Friendship dohas quotes lines

 

 


  • Mitrata Par Tulsidas Ke Dohe

    मित्रता पर तुलसीदास के दोहे

  • जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि विलोकत पातक भारी।
    निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरू समाना।
    – जो मित्र के दुख से दुखी नहीं होता है उसे देखने से भी भारी पाप लगता है. अपने पहाड़ समान दुख को धूल के बराबर और मित्र के साधारण धूल समान दुख को सुमेरू पर्वत के समान समझना चाहिए.
  • जिन्ह कें अति मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई।
    कुपथ निवारि सुपंथ चलावा । गुन प्रगटै अबगुनन्हि दुरावा।
    – जिनके स्वभाव में इस प्रकार की बुद्धि न हो वे मूर्ख केवल जिद करके हीं किसी से मित्रता करते हैं. सच्चा मित्र गलत रास्ते पर जाने से रोककर सही रास्ते पर चलाता है और अवगुण छिपाकर केवल गुणों को प्रकट करता है.
  • देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई।
    विपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।
    – मित्र से लेन देन करने में शंका न करे. अपनी शक्ति अनुसार हमेशा मित्र की भलाई करे. वेद के अनुसार संकट के समय वह सौ गुणा स्नेह-प्रेम करता है. अच्छे मित्र के यही गुण हैं.
  • आगें कह मृदु वचन बनाई। पाछे अनहित मन कुटिलाई।

    जाकर चित अहिगत सम भाई।अस कुमित्र परिहरेहि भलाई।

    – जो सामने बना-बनाकर मीठा बोलता है और पीछे मन में बुरी भावना रखता है तथा जिसका मन सांप की चाल के जैसा टेढा है ऐसे खराब मित्र को त्यागने में हीं भलाई है.

  • सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। माया कृत परमारथ नाहीं।
    – इस संसार में सभी शत्रु और मित्र तथा सुख और दुख माया झूठे हैं और वस्तुतः वे सब बिलकुल नहीं हैं.
  • सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।
    – देवता आदमी मुनि सबकी यही रीति है कि सब अपने स्वार्थपूर्ति हेतु हीं प्रेम करते हैं.

  • Dosti Par Rahim Ke Dohe

    दोस्ती पर रहीम के दोहे

  • मथत मथत माखन रहै दही मही बिलगाय
    रहिमन सोई मीत है भीर परे ठहराय ।
    – दही को बार बार मथने से दही और मक्खन अलग हो जाते हैं. रहीम कहते हैं कि सच्चा मित्र
    दुख आने पर तुरंत सहायता के लिये पहुँच जाता है. मित्रता की पहचान दुख में हीं होती है.
  • जो रहीम दीपक दसा तिय राखत पट ओट
    समय परे ते होत हैं वाही पट की चोट ।
    – जिस प्रकार वधु दीपक को आँचल की ओट से बचाकर शयन कक्ष में रखती है, लेकिन मिलन के समय उसी दीपक को जल्दी से बुझा देती है. उसी तरह बुरे दिनों में अच्छा मित्र भी अच्छा शत्रु बन जाता है.
  • टूटे सुजन मनाइये जो टूटे सैा बार
    रहिमन फिरि फिरि पोहिये टूटे मुक्ताहार |
    – हमारी भलाई चाहने वालों को रूठने पर उन्हें अनेक प्रयास करके मना लेना चाहिये.
    ऐसे प्रेमी को मनाने में हार-जीत का प्रश्न नहीं होना चाहिये. ठीक वैसे जैसे मोती का हार
    टूटने पर उसे पुनः पिरो लिया जाता है. क्योंकि वह मोती अत्यधिक मूल्यवान है.

 

  • वरू रहीम कानन बसिय असन करिय फल तोय

    बंधु मध्य गति दीन ह्वै बसिबो उचित न होय ।

    – जंगल में बस जाओ और जंगली फल-फूल पानी से जीवन यापन करो लेकिन उन भाइयों के बीच मत रहो जिनके साथ तुम्हारा सम्पन्न जीवन बीता हो और अब गरीब होकर रहना पड़ रहा हो.

  • जलहिं मिलाई रहीम ज्यों कियो आपु सग छीर
    अगबहिं आपुहि आप त्यों सकल आँच की भीर।
    – दूध पानी को अपने में पूरी तरह से मिला लेता है पर दूध को आग पर चढ़ाने से पानी उपर आ जाता है और अन्त तक सहता रहता है. सच्चे दोस्त की यही पहचान है.
  • कहि रहीम संपति सगे बनत बहुत बहु रीत

    विपति कसौटी जे कसे तेई सांचे मीत ।

    – संपत्ति रहने पर लोग किसी न किसी बहाने से रिश्ते जोड़ते हैं. लेकिन विपत्ति संकट के समय जो साथ देता है वही सच्चा मित्र ( संबंधी ) है.

 

  • ये रहीम दर दर फिरहिं मांगि मधुकरी खाहिं
    यारो यारी छेाड़िक वे रहीम अब नाहिं ।
    – अब रहीम दर दर फिर रहा है और भीख मांगकर खा रहा है. अब दोस्तों ने भी दोस्ती छोड़ दिया है और अब वे पुराने रहीम नही रहे. गरीब रहीम अब मित्रता नही निभा सकता है.
  • रहिमन तुम हमसों करी करी करी जो तीर
    बाढे दिन के मीत हेा गाढे दिन रघुबीर ।
    – कठिनाई के दिनों में मित्र गायब हो जाते हैं और अच्छे दिन आने पर हाजिर हो जाते हैं.
    केवल प्रभु हीं अच्छे और बुरे दिनों के मित्र रहते हैं. मैं अब अच्छे और बुरे दिनों के मित्रों को पहचान गया हूँ.
  • रहिमन कीन्ही प्रीति साहब को भावै नही
    जिनके अगनित भीत हमैं गरीबन को गनै ं
    – रहीम ने अपने मालिक से प्रेम किया किंतु वह प्रेम मालिक को भाया नही-अच्छा नही लगा. स्वाभाविक है कि जिनके अनगिनत मित्र होते हैं-पे गरीब की मित्रता को क्यों महत्व देंगें.

 

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