Poem on Air Pollution in Hindi – वायु प्रदूषण पर कविता & हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा kavita :

poem on air pollution in hindi – वायु प्रदूषण पर कविता
Poem on Air Pollution in Hindi – वायु प्रदूषण पर कविता & हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा kavita

Poem on Air Pollution in Hindi

  • मैं हूँ हवा

    मैं हूँ हवा, कहूँगी मैं ये आज।
    बहुमूल्य हूँ मैं सृष्टि में सबसे।
    मुझ बिन जीवन नहीं किसी का।
    पांच तत्वों में एक मेरा भी है नाम।
    मस्त मौला हूँ मैं, हूँ मैं चंचल
    यदि कभी जो मैं थम जाऊँ, सृष्टि में हाहाकार मचाऊं।
    खिलखिलाती हूँ मैं जब, सारी फ़िज़ा को साथ हंसाऊ।
    झूमने लगता है पत्ता-पत्ता, वृक्ष, खेतों को भी संग-संग नचाऊं।
    अंग से जब लिपट हूँ जाती, तन-मन सब प्रफुल्लित कर जाती।
    कभी जो मैं प्रचंड प्रलय मचाऊं
    सब कुछ साथ तबाह कर जाऊँ।
    जिन मानवों का जीवन चलता मुझी से,
    उन्होंने ही मुझे प्रदूषित कर डाला।
    विषाक्त गैसों को मुझमें हैं फैलाते,
    जिसने बार-बार, अम्बर को भी काला कर डाला।
    पटाखों का प्रयोग कर अपने कर्तव्यों से मुख है मोड़ते,
    महत्व सब जानते हैं मेरा, फिर भी क्यों नहीं प्रदूषण हैं रोकते।
    स्वच्छ रखेंगे जो ये मुझको
    सुरक्षित रखेंगे ये खुद को।
    – भारती विकास (प्रीति)

  • Hawa Hu Hawa Main Basanti Hawa Hu Poem in Hindi

    बसंती हवा
    हवा हूँ, हवा मैं
    बसंती हवा हूँ।
    सुनो बात मेरी –
    अनोखी हवा हूँ।
    बड़ी बावली हूँ,
    बड़ी मस्त्मौला।
    नहीं कुछ फिकर है,
    बड़ी ही निडर हूँ।
    जिधर चाहती हूँ,
    उधर घूमती हूँ,
    मुसाफिर अजब हूँ।
    न घर-बार मेरा,
    न उद्देश्य मेरा,
    न इच्छा किसी की,
    न आशा किसी की,
    न प्रेमी न दुश्मन,
    जिधर चाहती हूँ
    उधर घूमती हूँ।
    हवा हूँ, हवा मैं
    बसंती हवा हूँ!
    जहाँ से चली मैं
    जहाँ को गई मैं –
    शहर, गाँव, बस्ती,
    नदी, रेत, निर्जन,
    हरे खेत, पोखर,
    झुलाती चली मैं।
    झुमाती चली मैं!
    हवा हूँ, हवा मै
    बसंती हवा हूँ।
    चढ़ी पेड़ महुआ,
    थपाथप मचाया;
    गिरी धम्म से फिर,
    चढ़ी आम ऊपर,
    उसे भी झकोरा,
    किया कान में ‘कू’,
    उतरकर भगी मैं,
    हरे खेत पहुँची –
    वहाँ, गेंहुँओं में
    लहर खूब मारी।
    पहर दो पहर क्या,
    अनेकों पहर तक
    इसी में रही मैं!
    खड़ी देख अलसी
    लिए शीश कलसी,
    मुझे खूब सूझी –
    हिलाया-झुलाया
    गिरी पर न कलसी!
    इसी हार को पा,
    हिलाई न सरसों,
    झुलाई न सरसों,
    हवा हूँ, हवा मैं
    बसंती हवा हूँ!
    मुझे देखते ही
    अरहरी लजाई,
    मनाया-बनाया,
    न मानी, न मानी;
    उसे भी न छोड़ा –
    पथिक आ रहा था,
    उसी पर ढकेला;
    हँसी ज़ोर से मैं,
    हँसी सब दिशाएँ,
    हँसे लहलहाते
    हरे खेत सारे,
    हँसी चमचमाती
    भरी धूप प्यारी;
    बसंती हवा में
    हँसी सृष्टि सारी!
    हवा हूँ, हवा मैं
    बसंती हवा हूँ!
    – केदारनाथ अग्रवाल

  • Essay on Pollution in Hindi प्रदूषण पर निबन्ध | paryavaran
  • आपको हमारी मौलिक कविता ( Poem on Air Pollution in Hindi ) प्रस्तुत की गई कविता ( हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा kavita ) कैसी लगी हमें जरुर बताएँ.

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