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Poem On Birds in Hindi पंछी पर हिन्दी कविता chidiya chidiyon panchi paar pe kavita

Poem On Birds in Hindi Language – पंछी पर हिन्दी कविता 
पंछी पर हिन्दी कविता - Poem On Birds in Hindi Language

पंछी हैं वो – Hindi Poem on Birds in Hindi

  • हवाओ में पंख फैलाए
    नीले नभ से तय करते हैं
    जो अपनी दिशाएँ
    हाँ पंछी हैं वो!!
    चँचलता जिनकी नजरों से छलके
    इस पल यहाँ तो अगले पल
    वहाँ जो चहके
    हाँ पंछी हैं वो!!
    सुबह सूरज के किरणों के धरती को
    छुने से पहले जो जग जाएँ
    हाँ पंछी हैं वो!!
    दायरो में जो नहीं बँधते
    पिंजरो में जो नहीं रहते
    अपनी सीमा जो स्वयं
    तय हैं करते
    हाँ पंछी हैं वो!!
    लक्ष्य जिनका अटल है रहता
    सारा जग जिन्हे अपना है लगता
    कहीं कोई फर्क नहीं है दिखता
    हाँ पंछी हैं वो!!
    सीमाएँ जिनके लिए नहीं बनी
    जिन्हे कहीं आने-जाने के लिए
    कोई वीजा नहीं लगता
    हाँ पंछी हैं वो!!
    चहचहाहट से जिनके संगीत सा
    कानो में है बजता
    फिजा सुरमई सी है लगती
    हाँ पंछी हैं वो!!
    धरा-गगन दोनो से है
    इनका गहरा नाता उँचाई पर
    ही अपना आशियाना इन्हे लुभाता
    हाँ पंछी हैं वो!!
    मौसमों से छेडखानी करते
    तिनके चुन-चुन अपना घोंसला संजोते
    दिशाएँ घूम-घूम दाने चुनते
    हैं जो दिखते
    हाँ पंछी हैं वो!!
    हर रोज जैसे कोई नया अभियान हो
    सुबह पूरा करने जो निकलते
    शाम ढलने पर ही अपने घोसलों पर लौटते
    हाँ पंछी हैं वो!!
    प्यारे-प्यारे रंग-रूपों से सजे
    जिनकी शोभा उनके पंखों से ही बढे़
    हाँ पंछी हैं वो!!
    उम्मीद और हौसले की
    पहचान हैं जो
    हाँ पंछी हैं वो!!!!!
    – ज्योति सिंहदेव

 

  • Pankshi – Poem on Sparrow Bird in Hindi

  • गौरैया कहाँ खो गई
    न जाने गौरैया कहाँ खो गई
    रोज सुबह नींदों से जगाया करती
    पौ फटते ही झुरमुटों से
    चीं-चीं कर गीत सुनाया करती
    फुदक-फुदक कर घर आँगन में
    चीं-चीं कर दाना चुग जाती
    मिट्टी के बर्तन का पानी पी जाती
    अब देखने को आँखे तरस गई
    न जाने गौरैया कहाँ खो गई
    एक-एक तिनका चुनकर सहेजती
    घर के रौशदानो में घोंसला बनाती
    कहीं खजूर की डल्लियों से लटकती
    सुन्दर-सुन्दर घोंसले सजाती
    इन्तजार होता था अण्डे देने की
    घोंसले से नवजात की चीं-चीं सुनने की
    अब न तो रौशनदान रहा न खजूर का पेड़
    सब कुछ देखने को आँखे तरस गई
    न जाने गौरैया कहाँ खो गई
    अब तो विलुप्त हो रही गौरैया
    पुरानी बातें यादें बनकर रह गई
    किताब के पन्नों पर लिखी
    नानी दादी की कहानी रह गई
    इस प्रजाति को बचाना होगा”सुमन”
    तरसती आंखें नम होकर रह गई
    न जाने गौरैया कहाँ खो गई
    कृष्ण बल्लभ लाल “सुमन”
    दानापुर कैंट, पटना

.

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