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हिमालय पर 3 बेहतरीन कविता – Poem On Himalaya in Hindi himalya kavita

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हिमालय पर 3 बेहतरीन कविता - Poem On Himalaya in Hindi himalya kavita

 

  • हिमालय पर 3 बेहतरीन कविता – Poem On Himalaya in Hindi himalya kavita

 

  • हिमालय

    चढ़ लूँ उस छोर पर
    जहा से शूरू है अस्तित्व तुम्हारा,
    इंद्रधनुषी रंग देखूँ
    या बर्फ़ो की माला,
    तने हो यूँ,
    अडिग हो, अटल हो
    जीवन के किस पहेली के हल हो ,
    क्या ये सूनापन ही
    तम्हारी एकाग्रता है ?
    इर्द-गिर्द मंडरा रही
    मेघों की छटा है,
    बाहर से निष्क्रिय
    अंदर से क्रियाशील हो,
    शीतल हो या शलील हो ?
    रुक जाऊँ वहां,
    जहाँ तम्हारी नीव हैं,
    पाषाणों से लदे हो,
    नदियों की पहल हो,
    रक्षक हो हिन्द के,
    या क्षत्रिय हो तुम ?
    वनों की शोभा हो,
    पशु-पंछियों की आभा हो,
    यात्रियों का पड़ाव हो,
    नदियों का बहाव है,
    हो वसुधा के श्रृंगार,
    नभ चुंबी हो,
    परिश्रम की कुंजी हो,
    हो तुम मानवता
    के लिए अनंत उपहार,
    फिर भी क्यूँ है
    सूनापन ?
    क्या नभ को छूं
    लेने का घमंड है ?
    या तुम कड़वे किस्सों
    के खंड हो ?
    विशेषताओं से परिपूर्ण,
    पर हर ओर से
    अभी भी शून्य हो तुम,
    ऐ हिमालय!
    पर्वतों के राजा
    क्या मानव ने कर
    दिया तेरा
    यह हश्र हैं ?
    आज बुलंद होकर
    भी इतना
    क्यों तू बेबस हैं ?
    – प्रियंका प्रियंवदा….

 

  • हिमालय

    युग युग से है अपने पथ पर
    देखो कैसा खड़ा हिमालय!
    डिगता कभी न अपने प्रण से
    रहता प्रण पर अड़ा हिमालय!
    जो जो भी बाधायें आईं
    उन सब से ही लड़ा हिमालय,
    इसीलिए तो दुनिया भर में
    हुआ सभी से बड़ा हिमालय!
    अगर न करता काम कभी कुछ
    रहता हरदम पड़ा हिमालय
    तो भारत के शीश चमकता
    नहीं मुकुट–सा जड़ा हिमालय!
    खड़ा हिमालय बता रहा है
    डरो न आँधी पानी में,
    खड़े रहो अपने पथ पर
    सब कठिनाई तूफानी में!
    डिगो न अपने प्रण से तो ––
    सब कुछ पा सकते हो प्यारे!
    तुम भी ऊँचे हो सकते हो
    छू सकते नभ के तारे!!
    अचल रहा जो अपने पथ पर
    लाख मुसीबत आने में,
    मिली सफलता जग में उसको
    जीने में मर जाने में!
    – सोहनलाल द्विवेदी

 

  • गिरिराज

    यह है भारत का शुभ्र मुकुट
    यह है भारत का उच्च भाल,
    सामने अचल जो खड़ा हुआ
    हिमगिरि विशाल, गिरिवर विशाल!
    कितना उज्ज्वल, कितना शीतल
    कितना सुन्दर इसका स्वरूप?
    है चूम रहा गगनांगन को
    इसका उन्नत मस्तक अनूप!
    है मानसरोवर यहीं कहीं
    जिसमें मोती चुगते मराल,
    हैं यहीं कहीं कैलास शिखर
    जिसमें रहते शंकर कृपाल!
    युग युग से यह है अचल खड़ा
    बनकर स्वदेश का शुभ्र छत्र!
    इसके अँचल में बहती हैं
    गंगा सजकर नवफूल पत्र!
    इस जगती में जितने गिरि हैं
    सब झुक करते इसको प्रणाम,
    गिरिराज यही, नगराज यही
    जननी का गौरव गर्व–धाम!
    इस पार हमारा भारत है,
    उस पार चीन–जापान देश
    मध्यस्थ खड़ा है दोनों में
    एशिया खंड का यह नगेश!
    – सोहनलाल द्विवेदी

 

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