सामाजिक बुराइयों पर कविता Poem on Social Issues in Hindi samajik muddon par kavita :

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Poem on Social Issues in Hindi samajik muddon par kavita

सामाजिक बुराइयों पर कविता Poem on Social Issues in Hindi samajik muddon par kavita

  • लौट जाओ – Samajik Burai Par Kavita

    सूरज डूबने में वक़्त है अभी, लौट जाओ
    कहाँ घूमोगे वीराने में, लौट जाओ।
    दीवाने हो क्या, क्यों पागलों सी बातें करते हो,
    गुनाहों के शहर में इंसाफ नही मिलता, लौट जाओ।
    कोई नहीं रोकेगा गर होंगे जुल्म भी कभी,
    बुतों का शहर है ये , तुम लौट जाओ।
    कोई नही देगा गवाही नाइंसाफ़ी की यहाँ
    गूंगे हैं सभी बाशिंदे, तुम लौट जाओ।
    -अंशु प्रिया (anshu priya)
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  • एक नज़र फैलाओ – Poem On Social Issues in Hindi

    एक नज़र फैलाओ चारों ओर
    देखो क्या हो रहा है।
    लाखों फरियादी चिल्लाते हैं
    और अंधा कानून सो रहा है।
    बहरे हैं सभी इस शहर में
    किसी को चीखें सुनाई नहीं देती।
    बहरे भी हैं सब शायद,
    मानवता रोती नहीं दिखाई देती
    गंगा भी मैली हो गयी अब
    इंसान इतने पाप धो रहा है।
    लाखों फरियादी चिल्लाते हैं
    और अंधा कानून सो रहा है।
    हर दिन छलनी होती मर्यादा,
    रोज़ द्रौपदी का चीर हरा जाता है।
    पर अब उसे बचाने को,
    कोई कृष्ण नहीं आता है।
    हर दिन लगता देश दांव पर
    हर दिन द्यूत हो रहा है।
    लाखों फरियादी चिल्लाते हैं
    और अंधा कानून सो रहा है।
    – अंशु प्रिया ( anshu priya)

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