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सुभाषचंद्र बोस पर 3 हिंदी कविता Poem on Subhash Chandra Bose in Hindi font

Poem on Subhash Chandra Bose in Hindi – सुभाषचंद्र बोस पर हिंदी कविताPoem on Subhash Chandra Bose in Hindi - सुभाषचंद्र बोस पर हिंदी कविता

Poem on Subhash Chandra Bose in Hindi – 1 सुभाषचंद्र बोस पर हिंदी कविता

  • सुभाष की मृत्यु पर

    दूर देश में किसी विदेशी गगन खंड के नीचे
    सोये होगे तुम किरनों के तीरों की शैय्या पर
    मानवता के तरुण रक्त से लिखा संदेशा पाकर
    मृत्यु देवताओं ने होंगे प्राण तुम्हारे खींचे
    प्राण तुम्हारे धूमकेतु से चीर गगन पट झीना
    जिस दिन पहुंचे होंगे देवलोक की सीमाओं पर
    अमर हो गई होगी आसन से मौत मूर्च्छिता होकर
    और फट गया होगा ईश्वर के मरघट का सीना
    और देवताओं ने ले कर ध्रुव तारों की टेक –
    छिड़के होंगे तुम पर तरुनाई के खूनी फूल
    खुद ईश्वर ने चीर अंगूठा अपनी सत्ता भूल
    उठ कर स्वयं किया होगा विद्रोही का अभिषेक
    किंतु स्वर्ग से असंतुष्ट तुम, यह स्वागत का शोर
    धीमे-धीमे जबकि पड़ गया होगा बिलकुल शांत
    और रह गया होगा जब वह स्वर्ग देश
    खोल कफ़न ताका होगा तुमने भारत का भोर।
    – धर्मवीर भारती

Poem on Subhash Chandra Bose in Hindi – 2

  • नेताजी सुभाषचंद्र बोस

    है समय नदी की बाढ़ कि जिसमें सब बह जाया करते हैं।
    है समय बड़ा तूफ़ान प्रबल पर्वत झुक जाया करते हैं ।।
    अक्सर दुनियाँ के लोग समय में चक्कर खाया करते हैं।
    लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, इतिहास बनाया करते हैं ।।
    यह उसी वीर इतिहास-पुरुष की अनुपम अमर कहानी है।
    जो रक्त कणों से लिखी गई,जिसकी जयहिन्द निशानी है।।
    प्यारा सुभाष, नेता सुभाष, भारत भू का उजियारा था ।
    पैदा होते ही गणिकों ने जिसका भविष्य लिख डाला था।।
    यह वीर चक्रवर्ती होगा , या त्यागी होगा सन्यासी।
    जिसके गौरव को याद रखेंगे, युग-युग तक भारतवासी।।
    सो वही वीर नौकरशाही ने,पकड़ जेल में डाला था ।
    पर क्रुद्ध केहरी कभी नहीं फंदे में टिकने वाला था।।
    बाँधे जाते इंसान,कभी तूफ़ान न बाँधे जाते हैं।
    काया ज़रूर बाँधी जाती,बाँधे न इरादे जाते हैं।।
    वह दृढ़-प्रतिज्ञ सेनानी था,जो मौका पाकर निकल गया।
    वह पारा था अंग्रेज़ों की मुट्ठी में आकर फिसल गया।।
    जिस तरह धूर्त दुर्योधन से,बचकर यदुनन्दन आए थे।
    जिस तरह शिवाजी ने मुग़लों के,पहरेदार छकाए थे ।।
    बस उसी तरह यह तोड़ पींजरा , तोते-सा बेदाग़ गया।
    जनवरी माह सन् इकतालिस,मच गया शोर वह भाग गया।।
    वे कहाँ गए, वे कहाँ रहे,ये धूमिल अभी कहानी है।
    हमने तो उसकी नयी कथा,आज़ाद फ़ौज से जानी है।।
    – गोपाल प्रसाद व्यास

नेताजी का तुलादान – Poem on Subhash Chandra Bose in Hindi – 3

  • देखा पूरब में आज सुबह,
    एक नई रोशनी फूटी थी।
    एक नई किरन, ले नया संदेशा,
    अग्निबान-सी छूटी थी॥
    एक नई हवा ले नया राग,
    कुछ गुन-गुन करती आती थी।
    आज़ाद परिन्दों की टोली,
    एक नई दिशा में जाती थी॥
    एक नई कली चटकी इस दिन,
    रौनक उपवन में आई थी।
    एक नया जोश, एक नई ताज़गी,
    हर चेहरे पर छाई थी॥
    नेताजी का था जन्मदिवस,
    उल्लास न आज समाता था।
    सिंगापुर का कोना-कोना,
    मस्ती में भीगा जाता था।
    हर गली, हाट, चौराहे पर,
    जनता ने द्वार सजाए थे।
    हर घर में मंगलाचार खुशी के,
    बांटे गए बधाए थे॥
    पंजाबी वीर रमणियों ने,
    बदले सलवार पुराने थे।
    थे नए दुपट्टे, नई खुशी में,
    गये नये तराने थे॥
    वे गोल बांधकर बैठ गईं,
    ढोलक-मंजीर बजाती थीं।
    हीर-रांझा को छोड़ आज,
    वे गीत पठानी गाती थीं।
    गुजराती बहनें खड़ी हुईं,
    गरबा की नई तैयारी में।
    मानो वसन्त ही आया हो,
    सिंगापुर की फुलवारी में॥
    महाराष्ट्र-नन्दिनी बहनों ने,
    इकतारा आज बजाया था।
    स्वामी समर्थ के शब्दों को,
    गीतों में गति से गाया था॥
    वे बंगवासिनी, वीर-बहूटी,
    फूली नहीं समाती थीं।
    अंचल गर्दन में डाल,
    इष्ट के सम्मुख शीश झुकाती थीं-
    “प्यारा सुभाष चिरंजीवी हो,
    हो जन्मभूमि, जननी स्वतंत्र!
    मां कात्यायिनि ऐसा वर दो,
    भारत में फैले प्रजातंत्र!!”
    हर कण्ठ-कण्ठ से शब्द यही,
    सर्वत्र सुनाई देते थे।
    सिंगापुर के नर-नारि आज,
    उल्लसित दिखाई देते थे॥
    उस दिन सुभाष सेनापति ने,
    कौमी झण्डा फहराया था।
    उस दिन परेड में सेना ने,
    फौजी सैल्यूट बजाया था॥
    उस दिन सारे सिंगापुर में,
    स्वागत की नई तैयारी थी।
    था तुलादान नेताजी का,
    लोगों में चर्चा भारी थी ॥
    उस रोज तिरंगे फूलों की,
    एक तुला सामने आई थी॥
    उस रोज तुला ने सचमुच ही,
    एक ऐसी शक्ति उठाई थी-
    जो अतुल, नहीं तुल सकती थी,
    दुनिया की किसी तराजू से!
    जो ठोस, सिर्फ बस ठोस,
    जिसे देखो चाहे जिस बाजू से!!
    वह महाशक्ति सीमित होकर,
    पलड़े में आन विराजी थी।
    दूसरी ओर सोना-चांदी,
    रत्नों की लगती बाजी थी॥
    उस मन्त्रपूत मुद मंडप में,
    सुमधुर शंख-ध्वनि छाई थी।
    जब कुन्दन-सी काया सुभाष की,
    पलड़े में मुस्काई थी॥
    एक वृद्धा का धन सर्वप्रथम,
    उस धर्म-तुला पर आया था।
    सोने की ईटों में जिसने,
    अपना सर्वस्व चढ़ाया था॥
    गुजराती मां की पांच ईंट,
    मानो पलड़े में आईं थीं।
    या पंचयज्ञ से हो प्रसन्न,
    कमला ही वहां समाई थीं!!
    फिर क्या था, एक-एक करके,
    आभूषण उतरे आते थे।
    वे आत्मदान के साथ-साथ,
    पलड़े पर चढ़ते जाते थे॥
    मुंदरी आई, छल्ले आए,
    जो पी की प्रेम-निशानी थे।
    कंगन आए, बाजू आए,
    जो रस की स्वयं कहानी थे॥
    आ गया हार, ले जीत स्वयं,
    माला ने बन्धन छोड़ा था।
    ललनाओं ने परवशता की,
    जंजीरों को धर तोड़ा था॥
    आ गईं मूर्तियां मन्दिर की,
    कुछ फूलदान, टिक्के आए।
    तलवारों की मूठें आईं,
    कुछ सोने के सिक्के आए॥
    कुछ तुलादान के लिए,
    युवतियों ने आभूषण छोड़े थे।
    जर्जर वृद्धाओं ने भेजे,
    अपने सोने के तोड़े थे॥
    छोटी-छोटी कन्याओं ने भी,
    करणफूल दे डाले थे।
    ताबीज गले से उतरे थे,
    कानों से उतरे बाले थे॥
    प्रति आभूषण के साथ-साथ,
    एक नई कहानी आती थी।
    रोमांच नया, उदगार नया,
    पलड़े में भरती जाती थी॥
    नस-नस में हिन्दुस्तानी की,
    बलिदान आज बल खाता था।
    सोना-चांदी, हीरा-पन्ना,
    सब उसको तुच्छ दिखाता था॥
    अब चीर गुलामी का कोहरा,
    एक नई किरण जो आई थी।
    उसने भारत की युग-युग से,
    यह सोई जाति जगाई थी॥
    लोगों ने अपना धन-सरबस,
    पलड़े पर आज चढ़ाया था।
    पर वजन अभी पूरा नहीं हुआ,
    कांटा न बीच में आया था॥
    तो पास खड़ी सुन्दरियों ने,
    कानों के कुण्डल खोल दिए।
    हाथों के कंगन खोल दिए,
    जूड़ों के पिन अनमोल दिए॥
    एक सुन्दर सुघड़ कलाई की,
    खुल ‘रिस्टवाच’ भी आई थी।
    पर नहीं तराजू की डण्डी,
    कांटे को सम पर लाई थी॥
    कोने में तभी सिसकियों की,
    देखा आवाज़ सुनाई दी।
    कप्तान लक्ष्मी लिए एक,
    तरुणी को साथ दिखाई दी॥
    उसका जूड़ा था खुला हुआ,
    आंखें सूजी थीं लाल-लाल!
    इसके पति को युद्ध-स्थल में,
    कल निगल गया था कठिन काल!!
    नेताजी ने टोपी उतार,
    उस महिला का सम्मान किया।
    जिसने अपने प्यारे पति को,
    आज़ादी पर कुर्बान किया॥
    महिला के कम्पित हाथों से,
    पलड़े में शीशफूल आया!
    सौभाग्य चिह्‌न के आते ही,
    कांटा सहमा, कुछ थर्राया!
    दर्शक जनता की आंखों में,
    आंसू छल-छल कर आए थे।
    बाबू सुभाष ने रुद्ध कण्ठ से,
    यूं कुछ बोल सुनाए थे-
    “हे बहन, देवता तरसेंगे,
    तेरे पुनीत पद-वन्दन को।
    हम भारतवासी याद रखेंगे,
    तेरे करुणा-क्रन्दन को!!
    पर पलड़ा अभी अधूरा था,
    सौभाग्य-चिह्‌न को पाकर भी।
    थी स्वर्ण-राशि में अभी कमी,
    इतना बेहद ग़म खाकर भी॥
    पर, वृद्धा एक तभी आई,
    जर्जर तन में अकुलाती-सी।
    अपनी छाती से लगा एक,
    सुन्दर-चित्र छिपाती-सी॥
    बोली, “अपने इकलौते का,
    मैं चित्र साथ में लाई हूं।
    नेताजी, लो सर्वस्व मेरा,
    मैं बहुत दूर से आई हूं॥ “
    वृद्धा ने दी तस्वीर पटक,
    शीशा चरमर कर चूर हुआ!
    वह स्वर्ण-चौखटा निकल आप,
    उसमें से खुद ही दूर हुआ!!
    वह क्रुद्ध सिंहनी-सी बोली,
    “बेटे ने फांसी खाई थी!
    उसने माता के दूध-कोख को,
    कालिख नहीं लगाई थी!!
    हां, इतना गम है, अगर कहीं,
    यदि एक पुत्र भी पाती मैं!
    तो उसको भी अपनी भारत-
    माता की भेंट चढ़ाती मैं!!”
    इन शब्दों के ही साथ-साथ,
    चौखटा तुला पर आया था!
    हो गई तुला समतल, कांटा,
    झुक गया, नहीं टिक पाया था!!
    बाबू सुभाष उठ खड़े हुए,
    वृद्धा के चरणों को छूते!
    बोले, “मां, मैं कृतकृत्य हुआ,
    तुझ-सी माताओं के बूते!!
    है कौन आज जो कहता है,
    दुश्मन बरबाद नहीं होगा!
    है कौन आज जो कहता है,
    भारत आज़ाद नहीं होगा!!”
    – गोपाल प्रसाद व्यास
  • बसंत ऋतु पर निबन्ध – Essay On Basant Ritu in Hindi Nibandh

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