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अमृता प्रीतम की कविताएँ – Poems of Amrita Pritam in Hindi :-

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अमृता प्रीतम की कविताएँ – Poems of Amrita Pritam in Hindi Kavita Kavitayein
अमृता प्रीतम की कविताएँ - Poems of Amrita Pritam in Hindi Kavita Kavitayein

अमृता प्रीतम की कविताएँ – Poems of Amrita Pritam in Hindi

  • मैं तुझे फिर मिलूँगी

  • मैं तुझे फिर मिलूँगी
    कहाँ कैसे पता नहीं
    शायद तेरे कल्पनाओं
    की प्रेरणा बन
    तेरे केनवास पर उतरुँगी
    या तेरे केनवास पर
    एक रहस्यमयी लकीर बन
    ख़ामोश तुझे देखती रहूँगी
    मैं तुझे फिर मिलूँगी
    कहाँ कैसे पता नहीं
    या सूरज की लौ बन कर
    तेरे रंगो में घुलती रहूँगी
    या रंगो की बाँहों में बैठ कर
    तेरे केनवास पर बिछ जाऊँगी
    पता नहीं कहाँ किस तरह
    पर तुझे ज़रुर मिलूँगी
    या फिर एक चश्मा बनी
    जैसे झरने से पानी उड़ता है
    मैं पानी की बूंदें
    तेरे बदन पर मलूँगी
    और एक शीतल अहसास बन कर
    तेरे सीने से लगूँगी
    मैं और तो कुछ नहीं जानती
    पर इतना जानती हूँ
    कि वक्त जो भी करेगा
    यह जनम मेरे साथ चलेगा
    यह जिस्म ख़त्म होता है
    तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है
    पर यादों के धागे
    कायनात के लम्हें की तरह होते हैं
    मैं उन लम्हों को चुनूँगी
    उन धागों को समेट लूंगी
    मैं तुझे फिर मिलूँगी
    कहाँ कैसे पता नहीं
    मैं तुझे फिर मिलूँगी!!
    – अमृता प्रीतम
    Amrita Pritam Poems

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  • जब मैं तेरा गीत लिखने लगी

  • जब मैं तेरा गीत लिखने लगी
    मेरे शहर ने जब तेरे कदम छुए
    सितारों की मुठियाँ भरकर
    आसमान ने निछावर कर दीं
    दिल के घाट पर मेला जुड़ा ,
    ज्यूँ रातें रेशम की परियां
    पाँत बाँध कर आई……
    जब मैं तेरा गीत लिखने लगी
    काग़ज़ के ऊपर उभर आईं
    केसर की लकीरें
    सूरज ने आज मेहंदी घोली
    हथेलियों पर रंग गई,
    हमारी दोनों की तकदीरें
    – अमृता प्रीतम
    Poetry of Amrita Pritam
  • आत्ममिलन
  • मेरी सेज हाज़िर है
    पर जूते और कमीज़ की तरह
    तू अपना बदन भी उतार दे
    उधर मूढ़े पर रख दे
    कोई खास बात नहीं
    बस अपने अपने देश का रिवाज़ है……
    – अमृता प्रीतम
    Amrita Pritam ki kavita

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  • ऐ मेरे दोस्त! मेरे अजनबी!

  • ऐ मेरे दोस्त! मेरे अजनबी!
    एक बार अचानक – तू आया
    वक़्त बिल्कुल हैरान
    मेरे कमरे में खड़ा रह गया।
    साँझ का सूरज अस्त होने को था,
    पर न हो सका
    और डूबने की क़िस्मत वो भूल-सा गया…
    फिर आदि के नियम ने एक दुहाई दी,
    और वक़्त ने उन खड़े क्षणों को देखा
    और खिड़की के रास्ते बाहर को भागा…
    वह बीते और ठहरे क्षणों की घटना –
    अब तुझे भी बड़ा आश्चर्य होता है
    और मुझे भी बड़ा आश्चर्य होता है
    और शायद वक़्त को भी
    फिर वह ग़लती गवारा नहीं
    अब सूरज रोज वक़्त पर डूब जाता है
    और अँधेरा रोज़ मेरी छाती में उतर आता है…
    पर बीते और ठहरे क्षणों का एक सच है –
    अब तू और मैं मानना चाहें या नहीं
    यह और बात है।
    पर उस दिन वक़्त
    जब खिड़की के रास्ते बाहर को भागा
    और उस दिन जो खून
    उसके घुटनों से रिसा
    वह खून मेरी खिड़की के नीचे
    अभी तक जमा हुआ है…
    – अमृता प्रीतम
    Amrita Pritam Poem

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  • मुकाम
    क़लम ने आज गीतों का क़ाफ़िया तोड़ दिया
    मेरा इश्क़ यह किस मुकाम पर आ गया है
    देख नज़र वाले, तेरे सामने बैठी हूँ
    मेरे हाथ से हिज्र का काँटा निकाल दे
    जिसने अँधेरे के अलावा कभी कुछ नहीं बुना
    वह मुहब्बत आज किरणें बुनकर दे गयी
    उठो, अपने घड़े से पानी का एक कटोरा दो
    राह के हादसे मैं इस पानी से धो लूंगी…
    – अमृता प्रीतम
    Amrita Pritam Poetry
  • अमृता प्रीतम की कविताएँ – Poems of Amrita Pritam in Hindi Kavita Kavitayein

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