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3 Poems On Indian Soldiers in Hindi भारतीय सैनिकों पर कविता Sainik Kavita :

Poems On Indian Soldiers in Hindi – भारतीय सैनिकों पर कविता भारतीय सैनिकों पर कविता - Poems On Indian Soldiers in Hindi

Poems On Indian Soldiers in Hindi

  • “अब रहम नहीं करूँगा मैं”
  • मैं जगा रहूँगा रात-दिन,
    चाहे धूप हो या बरसात हो,
    चाहे तूफान आये या पूस की ठंढी रात हो,
    मैं खड़ा रहूँगा सरहद पर सीना ताने,
    चाहे गोलियों की बौछार हो,
    चाहे न खाने को कुछ भी आहार हो,
    अपने “वतन” की खातिर मैं,
    हर दर्द हँस के सह लूँगा,
    निकले जो खून बदन से मेरे,
    मैं खुश हो लूँगा,
    कभी आँखों में रेत भी चल जाए तो,
    वादा है, मेरी पलकें नहीं झपकेगी,
    लहू भी जम जाए अगर जो सीने में,
    मेरे हाथ बंदूक नीचे नहीं रखेगी,
    दुश्मन के घर मेरे “वतन” के चट्टानों का एक टुकड़ा भी न जा पायेगा,
    जमींदोज कर दूँगा मैं काफ़िर तुमको,
    जो मेरी धरती की तरफ आँख उठाएगा,
    कितना भी दुर्गम रास्ता हो,
    किंचित भी नहीं डरूँगा मैं,
    चप्पे-चप्पे पर रहेगी नजर मेरी,
    देश के गद्दारों पर अब रहम नहीं करूँगा मैं।
    – हिमांशु शर्मा ‘हेमु’
  • सिपाही

    गिनो न मेरी श्वास,
    छुए क्यों मुझे विपुल सम्मान?
    भूलो ऐ इतिहास,
    खरीदे हुए विश्व-ईमान !!
    अरि-मुड़ों का दान,
    रक्त-तर्पण भर का अभिमान,
    लड़ने तक महमान,
    एक पँजी है तीर-कमान!
    मुझे भूलने में सुख पाती,
    जग की काली स्याही,
    दासो दूर, कठिन सौदा है
    मैं हूँ एक सिपाही !
    क्या वीणा की स्वर-लहरी का
    सुनूँ मधुरतर नाद?
    छि:! मेरी प्रत्यंचा भूले
    अपना यह उन्माद!
    झंकारों का कभी सुना है
    भीषण वाद विवाद?
    क्या तुमको है कुस्र्-क्षेत्र
    हलदी-घाटी की याद!
    सिर पर प्रलय, नेत्र में मस्ती,
    मुट्ठी में मन-चाही,
    लक्ष्य मात्र मेरा प्रियतम है,
    मैं हूँ एक सिपाही !
    खीचों राम-राज्य लाने को,
    भू-मंडल पर त्रेता !
    बनने दो आकाश छेदकर
    उसको राष्ट्र-विजेता
    जाने दो, मेरी किस
    बूते कठिन परीक्षा लेता,
    कोटि-कोटि `कंठों’ जय-जय है
    आप कौन हैं, नेता?
    सेना छिन्न, प्रयत्न खिन्न कर,
    लाये न्योत तबाही,
    कैसे पूजूँ गुमराही को
    मैं हूँ एक सिपाही?
    बोल अरे सेनापति मेरे!
    मन की घुंडी खोल,
    जल, थल, नभ, हिल-डुल जाने दे,
    तू किंचित् मत डोल !
    दे हथियार या कि मत दे तू
    पर तू कर हुंकार,
    ज्ञातों को मत, अज्ञातों को,
    तू इस बार पुकार!
    धीरज रोग, प्रतीक्षा चिन्ता,
    सपने बनें तबाही,
    कह `तैयार’! द्वार खुलने दे,
    मैं हूँ एक सिपाही !
    बदलें रोज बदलियाँ, मत कर
    चिन्ता इसकी लेश,
    गर्जन-तर्जन रहे, देख
    अपना हरियाला देश!
    खिलने से पहले टूटेंगी,
    तोड़, बता मत भेद,
    वनमाली, अनुशासन की
    सूजी से अन्तर छेद!
    श्रम-सीकर प्रहार पर जीकर,
    बना लक्ष्य आराध्य
    मैं हूँ एक सिपाही, बलि है
    मेरा अन्तिम साध्य !
    कोई नभ से आग उगलकर
    किये शान्ति का दान,
    कोई माँज रहा हथकड़ियाँ
    छेड़ क्रांन्ति की तान!
    कोई अधिकारों के चरणों
    चढ़ा रहा ईमान,
    `हरी घास शूली के पहले
    की’-तेरा गुण गान!
    आशा मिटी, कामना टूटी,
    बिगुल बज पड़ी यार!
    मैं हूँ एक सिपाही ! पथ दे,
    खुला देख वह द्वार !!
    – माखनलाल चतुर्वेदी

  • सैनिक
    हमारे सैनिक मेहनती बड़े,
    होते हैं गजब के फुर्तीले,
    देश की रक्षा वे करते हैं,
    सीने पर हैं गोली खाते,
    देश की बलिवेदी पर,
    वे शहीद हो जाते हैं,
    देशभक्ति की कथा लिखते हैं,
    वे अपने खून से ,
    हम भी उनको शीश नवाते।
    *****
    – 
    Pragya Gupta

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