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प्रेम के Exclusive 63 दोहे || Prem Ke Dohe hindi shayari प्रेम मंजरी love quote

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प्रेम के Exclusive 63 दोहे || Exclusive Prem Ke Dohe Hindi Shayari प्रेम मंजरी

प्रेम के Exclusive 63 दोहे || Exclusive Prem Ke Dohe Hindi Shayari प्रेम मंजरी

  • प्रेम संसार का सार तत्व है. प्रेम हीं जगत का आधार भी है. प्रेम के महत्व का वर्णन नहीं किया जा सकता है. दो हृदयों के मिलन का अनन्य हेतु भी प्रेम हीं है. इसी भावसर्वस्व प्रेम पर आधारित प्रस्तुत है प्रेम के कुछ स्वरचित दोहे.
    By – विष्णु दत्त पाण्डेय

 

  • उभय हृदय के मिलन में होता अंतरहेतु।
    खिलता द्रवता उदय पर सुम मणि शशि ग्रह केतु।।
    अर्थ : दो हृदयों के मिलन में एक अदृश्य आंतरिक हेतु होता है. जैसे चंद्रकांत मणि चंद्रमा के उदय एवं कमल सूर्य के उदय पर पिघलता और उदित होता है.
  • प्रेम जगत का सार है प्रेम जगत आधार
    हरि भी होते प्रेम से निराकार साकार।।
  • उभय हृदय अतिशय मिलन को कहते हैं स्नेह

    प्रेम न वह है जो करे सदा अपेक्षा देह।।

  • युग प्रेमी उर निकटता की सीमा अज्ञेय
    प्रेम सुधा निर्माण का है उर को ही श्रेय।।
    शब्दार्थ : युग – दो, अज्ञेय – समझ से परे
  • कपट रहित हो उर सदा गर्व न हो अवशेष
    प्रेम यही बस चाहता अर्पण करो अशेष।।
  • स्नेह चंद्र उगता सदा सहृदय नर उर रात
    इसे शब्द से बांधना बहुत असंभव बात।।
  • मेहंदी छद में जिस तरह रहे लालिमा व्याप्त
    स्नेह भाव भी जगत में उसी तरह है व्याप्त।।
    शब्दार्थ : छद – पत्ता
  • फल का रस बस सार है किंतु न है वह दृश्य
    स्नेह जगत का सार है होते हुए अदृश्य।।
  • नदियाँ जातीं उदधि में मिल जाती सस्नेह
    देती शिक्षा प्रकृति भी करो सभी से स्नेह।।
  • दो अक्षर के शब्द से बंधा हुआ संसार
    जैसे तरु के मूल से सधा विटप विस्तार।।
    शब्दार्थ : विटप – वृक्ष
  • प्रेम शब्द अति गूढ़ है, यह है अव्याख्येय
    विषय लिप्त मस्तिष्क युत नर द्वारा अज्ञेय।।
  • गंगा की धारा अमल सदृश विमल है प्रेम
    सही अर्थ को समझ लो तो हो सकता क्षेम।।
    शब्दार्थ : क्षेम – कल्याण
  • भाव वासना रहित हो एवं परम पवित्र
    तब बनता है ह्रदय में सही प्रेम का चित्र।।
  • सभी मनुज से प्रेम की मांग करो मत भूल
    अंत समय बनता वही क्योंकि हृदय का शूल।।
    शब्दार्थ : कांटा
  • जिस दिन जग हो जाएगा प्रेमाम्बर से हीन
    उस दिन यह हो जाएगा बिना सलिल के मीन।।
    शब्दार्थ :  सलिल – पानी, प्रेमाम्बर –  प्रेम रूपी वस्त्र
  • धारा-कर से घन, धरा से मिलता सविशेष
    पुलक प्रकट भी घास मिस करती धरा विशेष।।
    शब्दार्थ : धारा-कर – जल धारा रूपी हाथ, पुलक – रोमांच, घास मिस – घास के बहाने
  • सत्य प्रीति की बिरह में ही होती अनुभूति
    विरह प्रेम का निकष है, अधिक स्नेह प्रसूति।।
    शब्दार्थ : निकस – कसौटी

 

  • कमल फूल में ही भ्रमर बंधता सायं काल
    यद्यपि सब सुम में स्वरति का फैलाता जाल।।
    शब्दार्थ : सुम – फूल
  • प्रेमोद्देश्य न तुच्छ हो सदा रहे आदर्श

    तब होता है हृदय में उद्गम नर के हर्ष।।

  • हरि से या ईमान से कर सकता क्या प्रेम
    जन्म मनुज का ले न जो करता नर से प्रेम।।
  • यह जग हरि का देह है सकल जीव हरि अंग
    हरि में चाहो प्रीति यदि करो सभी से संग।।
  • जो सबको देता सदा प्रेम बराबर मान
    जग रत्नाकर रत्न वह देव उसी को जान।।
  •  चक्रवाक शशि को सदा अवलोकता अमंद
    पर न ध्यान देता कभी शशि है अति ही मन्द।।
    चक्रवाक – चकवा पक्षी, अमंद – लगातार, मन्द – मूर्ख
  • निजोत्सर्ग करता शलभ दीपक पर सह हर्ष
    जलता निष्ठुर दीप पर बढ़ा अधिक उत्कर्ष।।
    निजोत्सर्ग – अपना बलिदान, शलभ – कीट, परवाना
  • पूर्ण चंद्र छवि देख कर होता उदधि प्रसन्न
    मिलन हेतु वह उछलता हो जाता अवसन्न।।
    शब्दार्थ : उदधि – समुद्र, अवसन्न – शांत,
  • लता विटप का स्नेह ही है वास्तव में स्नेह
    गिरता तरु जब भूमि पर गिरती लता सदेह।।
  • पंक मग्न गज को कभी हथनी तजती है न
    प्रेमी दुख लखकर दुखी प्रेमी नहीं जो हो न।।
    शब्दार्थ : पंक मग्न – कीचड़ में फंसा
  • स्नेह न मरता है कभी वह ना देह की वस्तु
    वह तो अक्षर अनवरत आत्मा की है वस्तु।।
  • अलग-अलग जलबिंदु युग होते हैं तब खिन्न
    मिलते तब अति प्रेम से होते और अभिन्न।।
  • पर्वशर्वरी में न शशि जाए निशि को छोड़
    ऐसा ही हो प्रेम जग युग को सके ना मोड़।।
    शब्दार्थ : पर्व शर्वरी – पूर्णिमा की रात
    जिस प्रकार पूर्णिमा की रात में चंद्रमा रात को छोड़कर एक क्षण के लिए भी छोड़कर नहीं जाता है उसी प्रकार का प्रेम दो व्यक्तियों में भी होना चाहिए. जिसको संसार अपनी ओर न मोड़ सके.
  • किसी शक्ति अज्ञात को रहा विश्व यह खोज
    होता श्रमित भ्रमित वह दिन से निशि तक रोज।।
    शब्दार्थ : किसी अज्ञात शक्ति को यह संसार खोज रहा है, और इसीलिए वह दिन से रात तक श्रमिक होता है और भ्रमित होता है. और उसका कोई उद्देश्य नहीं है.

 

  • झरना झर झर शब्द कर झरती करती शोर
    किसके सम्मुख जा रही है एवं किस ओर।।
    अर्थ : झरना शोर करती हुई निरंतर झरती है और आगे बढ़ती है.  परंतु वह कहां जा रही है उसे पता नहीं रहता है.
  • देख जगत कमनीयता सफल करो निज नेत्र
    द्रोह त्याग सबसे बना उर को प्रेम क्षेत्र।।
    अर्थ : इस संसार की सुंदरता को देख कर तुम अपने नेत्र को सफल कर लो. और द्रोह का ईर्ष्या-द्वेष का परित्याग करके अपने ह्रदय को प्रेम का क्षेत्र बना लो.
  • मृदु भाषण से जगत में बहती अमृतधार
    हटती उर से शत्रुता होता सबसे प्यार।।
  • शशि के धवल प्रकाश से खिलता कुमुद समूह
    प्रेमी हृदय प्रभाव से खिलता मनुज समूह।।
    अर्थ : जिस प्रकार चंद्रमा के उज्जवल प्रकाश से  कुमुद पुष्प का समूह विकसित होता है, उसी प्रकार प्रेमी हृदय के प्रभाव से मनुष्यों का समूह भी प्रसन्न होता है.
  • प्रेम छोड़ता मनुज पर निज अव्यक्त प्रभाव
    कभी कभी पर हृदय में करता गहरा घाव।।
    अर्थ :  प्रेम मनुष्य पर अपना अदृश्य प्रभाव छोड़ता है,  परंतु  वही प्रेम जब विरह से युक्त हो जाता है तो ह्रदय पर गहरा घाव भी छोड़ता है.
  • उभय प्रेमी नम्रता की करता है चाह
    प्रेम तभी बनती ह्रदय में सुप्रेम की राह।।
    अर्थ : प्रेम दोनों प्रेमियों के बीच नम्रता की चाह रखता है, तभी ह्रदय में अच्छे प्रेम की राह बनती है. उभय – दोनों
  • प्रेमी को रहती सदा निज प्रेमी की चाह
    बिछुड़ गए तो युगल के उर में होता दाह।।
    अर्थ : प्रेमी को अपने प्रेमी की चाह हमेशा रहती है और अगर दोनों एक दूसरे से बिछड़ गए तो उन दोनों के ह्रदय में तकलीफ पीड़ा रहती है. उर – दिल,

 

  • सच्चा प्रेमी है न जग की करता परवाह

    तजता प्रेमी को न वह में भी नदी प्रवाह।।

  • समझ बूझ कर ही सदा करो प्रेम लो मान
    सब न सरल तव  सदृश ही होते हैं यह जान।।
    तव – तुम्हारे
  • प्रेम अश्म को भी बना देता है भगवान
    परुष हृदय को भी त्वरित करता मोम समान।।
    अश्म – पत्थर, परुष – कठोर
  • कोई किसी मनुष्य का है न जगत में सोच
    बनते निज बस प्रेम से ला निज मन में लोच।।
    अर्थ : सभी व्यक्ति प्रेम से ही अपने बनते हैं इस भाव को समझकर खुद में नम्रता लाने की जरूरत है, वरना इस दुनिया में कोई किसी का अपना नहीं है.
  • हर हर नदी प्रवाह में सुन पड़ता नवराग
    स्नेहा काल में बिरह में होता किंतु विराग।।
    अर्थ : जब मनुष्य के मन में प्रेम का भाव रहता है, तू नदी का हर-हर प्रवाह नए राग की तरह उसे सुनाई देता है. लेकिन जब ह्रदय दुखित होता है तो वहीं नदी की ध्वनि अच्छी नहीं लगती.
  • उदयाचल पर उदित नित होते सूर्य विदेह
    तथा स्वकर से वनज बन सहलाते सस्नेह।।
    अर्थ : वनज : कमल, स्वकर : अपने किरणों से.
  • सही प्रीति में वासना का होता न स्थान
    इसकी करना कल्पना है न बहुत आसान।।

 

  • प्रेमी हित सहता सदा प्रेमी कष्ट अनेक
    किंतु न है वह त्यागता निज स्नेह का टेक।।
    अर्थ : टेक – प्रण
  • प्रेमी हित में मानता प्रेमी अपना स्वार्थ
    करता है न प्रयत्न वह कभी हेतु निज स्वार्थ।।
  • सही प्रेम कह स्वार्थ हित करता जो नर प्रेम

    उस नर धोखेबाज का होता है नहीं क्षेम।।

    अर्थ :- क्षेम – कल्याण

  • जब होता है युगल में सकल समर्पण भाव
    तब चलती उर जलधि में सही प्रेम की नाव।।
    अर्थ : जब दोनों प्रेमियों में संपूर्ण समर्पण का भाव रहता है तभी हृदय रूपी समुद्र में सही प्रेम की नाव चलती है.
  • करता है यदि एक नर पर नर से अति प्रीति
    कुछ ना झुके पर मान्य तो वह पागलपन रीति।।
    अर्थ : एक व्यक्ति यदि दूसरे व्यक्ति से अत्यंत प्रेम करता है दूसरा व्यक्ति तनिक भी नहीं झुकता है, तो इसे पागलपन की रीति कहते हैं.
  • जगत जलज की बाह्य छवि है सांसारिक भूति
    पर परिमल है सकल नर की आपस की प्रीति।।
    अर्थ : जगत एक कमल है और उसकी बाहरी सुंदरता सांसारिक चमक दमक है, परंतु उसके भीतर का जो सुगंध है वह सभी प्रेमियों की आपस की प्रीति ही है.
  • नदियां इच्छारहित भी मिलती जा जलनाथ
    पर नर से खिंच मनुज बस विधिवस करता साथ।।
    अर्थ : नदिया इच्छा ना होते हुए भी जाकर समुद्र से मिलती हैं  यह विधि का विधान है.  उसी प्रकार एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से  विधि के विधान के कारण ही प्रेम करता है.

 

  • प्रेम मूल विरहित न जग विटप टिके क्षण एक
    भूति-सुसिंचन आदि हो भले उपाय अनेक।।
    अर्थ : प्रेम रूपी जड़ से रहित होकर के संसार रूपी वृक्ष नहीं एक क्षण भी नहीं टिक सकता.  भले ही धन संपत्ति आदि चीजों से इसे कितना हीं सींचा जाए.
  • परुष हृदय के मनुज कुछ होते में संसार
    उनको रस इस प्रेम का लगे नितांत असार।।
    अर्थ : कठोर हृदय के कुछ मनुष्य इस संसार में होते हैं,  उनको इस प्रेम का रस बहुत ही अ सार लगता है.
  • प्रणय ह्रदय का विषय है एवं अनुभव गम्य
    अर्थ साम्य है ब्रम्ह से अतः बहुत है रम्य।।
    अर्थ : प्रेम हृदय का विषय है और इसे अनुभव के द्वारा समझा जा सकता है. प्रेम का अर्थ ईश्वर के बराबर है इसलिए यह बहुत ही सुंदर है.
  • सूक्ष्म अर्थ इस प्रेम का सके न कोई जान
    स्थूल अर्थ इस हेतु सब लेते बरबस मान।।
  • भक्ति स्वार्थ आसक्ति रति आदि प्रेम के भेद
    धारा लहर तरंग सब जैसे जल के भेद।।
  • स्नेह रहित शुभ वस्तु भी लगती गरल समान
    अशुभ वस्तु भी स्नेहयुत लगती अमिय समान।।
    गरल – विष, अमिय – अमृत

 

  • प्रेम सदृश गुरु भावयुत भाव न है संसार

    स्नेह रूप है ब्रह्म भी स्नेह जगत का सार।।

  • स्वार्थ रहित होना प्रणय बहुत बड़ी है बात
    अतः स्वार्थ का प्रेम पर करते नर आघात।।
  • Prem Ke Dohe
    तू रह जाता प्रेम में मैं भग जाता दूर
    घायल होता शीघ्र ही प्रेम शस्त्र से सूर।।
  • चातक घन का स्वाति जल पीता अन्य न नीर
    अन्य समय बादल भले बरसावे शुभ क्षीर।।
    अर्थ : चातक एक ऐसा पक्षी है जो स्वाति नक्षत्र का ही जल पीता है. दूसरे नक्षत्र का जलवा नहीं पीता है क्योंकि स्वाति नक्षत्र से उसकी विशेष प्रीति होती है. भले ही दूसरे समय में बादल दूध के समान जल क्यों ना बरसाते हों, क्योंकि जिससे जिसकी प्रीति होती है, उसी से उसका लगाव होता है.
  • मिलना अत्यन्ति ही सही है बस प्रणायाधार
    मिलनोत्कण्ठा किन्तु है पहला मुख्य विचार।।
    अर्थ :  पूरी तरह से मिलन ही प्रेम का आधार है, परंतु मिलने की जो उत्कंठा है वही पहला मुख्य विचार है.

 

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