प्रकृति पर 3 कविता Paryavaran a Short Poem on Nature in Hindi language पोएम ऑन नेचर Poem :

Paryavaran A Short Poem on Nature in Hindi language – प्रकृति पर कविता पोएम ऑन नेचर Poemप्रकृति पर हिन्दी कविता - A Short Poem On Nature in Hindi Language - प्रकृति सौंदर्य

Poem on Nature in Hindi

  • प्रकृति Poem on Paryavaran in Hindi
  • माँ की तरह हम पर प्यार लुटाती है प्रकृति
    बिना मांगे हमें कितना कुछ देती जाती है प्रकृति…..
    दिन में सूरज की रोशनी देती है प्रकृति
    रात में शीतल चाँदनी लाती है प्रकृति……
    भूमिगत जल से हमारी प्यास बुझाती है प्रकृति
    और बारिश में रिमझिम जल बरसाती है प्रकृति…..
    दिन-रात प्राणदायिनी हवा चलाती है प्रकृति
    मुफ्त में हमें ढेरों साधन उपलब्ध कराती है प्रकृति…..
    कहीं रेगिस्तान तो कहीं बर्फ बिछा रखे हैं इसने
    कहीं पर्वत खड़े किए तो कहीं नदी बहा रखे हैं इसने…….
    .कहीं गहरे खाई खोदे तो कहीं बंजर जमीन बना रखे हैं इसने
    कहीं फूलों की वादियाँ बसाई तो कहीं हरियाली की चादर बिछाई है इसने.
    मानव इसका उपयोग करे इससे, इसे कोई ऐतराज नहीं
    लेकिन मानव इसकी सीमाओं को तोड़े यह इसको मंजूर नहीं……..
    जब-जब मानव उदंडता करता है, तब-तब चेतवानी देती है यह
    जब-जब इसकी चेतावनी नजरअंदाज की जाती है, तब-तब सजा देती है यह….
    विकास की दौड़ में प्रकृति को नजरंदाज करना बुद्धिमानी नहीं है
    क्योंकि सवाल है हमारे भविष्य का, यह कोई खेल-कहानी नहीं है…..
    मानव प्रकृति के अनुसार चले यही मानव के हित में है
    प्रकृति का सम्मान करें सब, यही हमारे हित में है…….
    – अभिषेक मिश्र ( Abhi )
  • प्रकृति – Poem on Nature in Hindi
    प्रकृति ने अच्छा दृश्य रचा
    इसका उपभोग करें मानव।
    प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करके
    हम क्यों बन रहे हैं दानव।
    ऊँचे वृक्ष घने जंगल ये
          सब हैं प्रकृति के वरदान।
    इसे नष्ट करने के लिए
          तत्पर खड़ा है क्यों इंसान।
    इस धरती ने सोना उगला
    उगलें हैं हीरों के खान
    इसे नष्ट करने के लिए
    तत्पर खड़ा है क्यों इंसान।
    धरती हमारी माता है
          हमें कहते हैं वेद पुराण
    इसे नष्ट करने के लिए
          तत्पर खड़ा है क्यों इंसान।
    हमने अपने कर्मों से
    हरियाली को कर डाला शमशान
    इसे नष्ट करने के लिए
    तत्पर खड़ा है क्यों इंसान।
    –  कोमल यादव
    खरसिया, रायगढ़ (छ0 ग0)
  • प्रकृति भी कुछ कहती है
  • देखो,प्रकृति भी कुछ कहती है…
    समेट लेती है सबको खुद में
    कई संदेश देती है
    चिडियों की चहचहाहट से
    नव भोर का स्वागत करती है
    राम राम अभिवादन कर
    आशीष सबको दिलाती है
    सूरज की किरणों से
    नव उमंग सब में
    भर देती है
    देखो,प्रकृति भी कुछ कहती है…
    आतप में स्वेद बहाकर
    परिश्रम करने को कहती है
    शीतल हवा के झोंके से
    ठंडकता भर देती है
    वट वृक्षों की छाया में
    विश्राम करने को कहती है
    देखो,प्रकृति भी कुछ कहती है…
    मयूर नृत्य से रोमांचित कर
    कोयल का गीत सुनाती है
    मधुर फलों का सुस्वाद लेकर
    आत्म तृप्त कर देती है
    सांझ तले गोधूलि बेला में
    घर जाने को कहती है
    देखो,प्रकृति भी कुछ कहती है…
    संध्या आरती करवाकर
    ईश वंदना करवाती है
    छिपते सूरज को नमन कर
    चांद का अातिथ्य करती है
    टिमटिमाते तारों के साथ
    अठखेलियां करने को कहती है
    रजनी के संग विश्राम करने
    चुपके से सो जाती है
    देखो,प्रकृति भी कुछ कहती है …
    – Poem ( Kavita ) by Anju Agrawal
  • सपने देखिये लेकिन – Famous Quotes in Hindi

.