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बारिश या बरखा पर कविता Short Poem on Rain in Hindi Barkha Par Kavita Barish liner :

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बारिश या बरखा पर कविता Short Poem on Rain in Hindi Barkha Par Kavita Barish liner

  • बारिश या बरखा पर कविता

  • ‘सूखा जंगल’

    जीवन के पुलकित क्षण का इंतेज़ार करता है
    वो सूखा जंगल बरखा का इंतेज़ार करता है
    उसकी मिट्टी जो पड़ी है बेजान सी,
    हवाएं जो चली हैं सुनसान सी,
    उसको उम्मीद है जीवन के गुंजित स्वर की,
    पक्षियों के कलरव की, वर्षा के झरझर की,
    फिर उन टहनियों में घोसलों का बसेरा हो,
    फिर बदलियों के गर्जन का इंतेजार करता है,
    वो सूखा जंगल बरखा का इंतेजार करता है।
    सूखी नदियां हैं वहां, पेड़ पौधे सब बेरंग हैं,
    ना जीवों का डेरा है, ना जीवन का मृदंग है
    अकाल के काल का तांडव है शीर्ष पर,
    सूर्य का तेज वहां प्रलय सा प्रचण्ड है ।
    वो हर बार मानव के स्वार्थ का आहार बनता है,
    वो सूखा जंगल बरखा का इंतेजार करता है ।
    रे जंगल! सुन, वो काले मेघ खो गए हैं
    शहरों की भीड़ में सो गए हैं
    बिजलियाँ नहीं चमकेंगी रातों में अब,
    वो बादल अब विषैले से हो गए हैं
    कैसा ये मनुष्य जीव है, जो जीवन मे प्रहार करता है,
    वो सूखा जंगल बरखा का इंतेज़ार करता है
    – Jaya Pandey

  • ऐ बारिश

    ऐ बारिश, थोड़ा रहम कर
    ये है किसी गरीब का घर
    छत यहां टपकती है हर जगह
    बारिश यहीं रोज़ रोती है बेवजह
    बच्चों को भी भूखे सोने की आदत सी है
    उम्मीद लेके फिर भी होती है हर सुबह
    यहाँ है बेबसी और लाचारी
    यहां है बदकिस्मती का असर,
    ये है किसी गरीब का घर…
    इनकी कोई सुनता नहीं,
    ना शोर में, ना सन्नाटों में,
    इनके आखों से कम पानी है,
    मानसून की इन बरसातों में,
    फिर भी यहाँ खुशियों के दाम कम हैं
    यहाँ है सन्तुष्टि की नज़र,
    ये है किसी गरीब का घर।
    – Jaya Pandey

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