Shringar Ras ki Kavita || श्रृंगार रस की कविता || prem kavita romantic poems :

Shringar Ras ki Kavita || श्रृंगार रस की कविता
Shringar Ras ki Kavita श्रृंगार रस की कविता hindi prem kavita romantic poems

Shringar Ras ki Kavita hindi prem kavita romantic poems

  • वो सुंदरता की प्रतिमा

  • ना श्वेत श्वेत ना श्याम श्याम
    वो सुंदरता की प्रतिमा सी।
    अपनी मादक आंखों से
    वो मुझमें प्राण जगाती सी।
    अपने सुगन्धित केशों में
    वो कलियों को महकाती सी।
    अनघड़ अनंत सितारों में
    वो ‘चंद्रमुखी’ ‘चंदा’ जैसी।
    रत्नों के भंडारों में
    वो ‘मोती माला’ के जैसी।
    हे रूप कामिनी ह्रदय हिरणी
    तुम उत्साह को जगाती सी।
    ‘वीर बहादुर’ कवियों को
    तुम ‘श्रृंगार’ पाठ पढाती सी।
    हे सुंदर अंतर्मन वाली,
    हे चेतन जड़ करने वाली।
    तुम ‘श्रृंगार रस’ की जननी सी,
    तुम ‘श्रृंगार रस की जननी’ हो।
    -पंकज सिंह ‘विधार्थी’
  • तुम उमड़ती हुई सी

  • तुम उमड़ती हुई सी घटा लग रही
    आओ अपना बादल बना लो मुझे |
    मैं अंधेरों में पलकर बढ़ा हूँ यहाँ
    तुम सूरज बनकर अपनालो मुझे ||
    तेरा चेहरा खिला पूनम का चाँद है
    अपने चेहरे की स्याही बना लो मुझे |
    मैं गमों का बड़ा सा पतवार हूँ
    सुख की नदिया मैं अपनी बहा लो मुझे ||
    तुम तो बादल हो बरस कर गुज़र जाओगे
    हुस्न की झील में तुम डुबा लो मुझे |
    मैं तुम्हारे ही जलवों से घायल हुआ
    प्यार का तुम तो मरहम लगा दो मुझे ||
    ये तो माना कि मैं तेरा अच्छा मित्र हूँ |
    मित्र से अपना हमसफर बना लो मुझे ||
    तुम उमड़ती हुइ सी…………
    सूरज बघेल आयु — 16 वर्ष
  • तुम्हें जाने इतना क्यों चाहने लगा हूँ

  • तुम्हें जाने इतना क्यों चाहने लगा हूँ
    कि चाहत में सब कुछ भुलाने लगा हूँ
    मेरा हाल इससे बुरा अब क्या होगा
    तेरा नाम लिखने मिटाने लगा हूँ
    तुम्हें चाहता हूँ, तुम्हें पूजता हूँ
    तुम्हें राज़ दिल के बताने लगा हूँ
    मेरी इस ख़ता से खुदा भी ख़फा है
    मैं जो तेरे सामने सर झुकाने लगा हूँ
    तुम्हें जाने इतना क्यों चाहने लगा हूँ
    कभी जिंदगी से शिकायत नही थी
    मगर मुझको पल भर की राहत नही थी
    मगर जबसे तुमसे मोहौब्बत हुई है
    मेरी जिंदगी कुछ सवरने लगी है
    कुछ पल सुकूं के मैं भी पाने लगा हूँ
    चाहत में तेरी इस जिंदगी से
    राहत के कुछ पल चुराने लगा हूँ
    तुम्हें जाने इतना क्यों चाहने लगा हूँ
    तेरे प्यार में जो सबक मैंने सीखे
    तो लगने लगे रंग दुनिया के फीके
    हुआ इश्क का कुछ असर मुझ पे ऐसा
    मैं दुनिया जहां को भुलाने लगा हूँ
    तुम्हें जाने इतना क्यों चाहने लगा हूँ
    बहुत उलझनें हैं, बड़ी बेबसी है
    मेरी जान उलफ़त में कैसी फंसी है
    तुमसे मोहब्बत, हैं तुमसे ही सांसे
    तुम्हीं से ही चाहत छुपाने लगा हूँ
    तुम्हें जाने इतना क्यों चाहने लगा हूँ
    कि चाहत में सब कुछ भूलाने लगा हूँ
    – हिमांशु शर्मा

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