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शिक्षक के लिए 20 टिप्स Skill development tips for teacher in hindi teaching competition

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शिक्षक के लिए 20 टिप्स Skill development tips for teacher in hindi for teaching

 

  • गुणात्मक शिक्षा हेतु अध्यापक में कौशल विकास
  • गुणात्मक शिक्षा का अर्थ है छात्र का चहुंमुखी विकास। कौशल विकास का अर्थ है शिक्षक द्वारा विद्यालय में ऐसा वातावरण तैयार करना, जिसमें बच्चे अपने अनुभवों के आधार पर शिक्षक के सहयोग से ज्ञान का सृजन कर सकें।
  • शिक्षक अपने अध्यापन कौशल के माध्यम से बालकों के सीखने की क्षमता में अपेक्षित संवर्द्धन कर कक्षा-कक्ष में आनन्ददायी शैक्षिक वातावरण तैयार कर सकता है।
  • वर्तमान समय में केन्द्र सरकार व राज्य सरकार ने विद्यालयों में शैक्षिक वातावरण सुधार हेतु बाल केन्द्रित शिक्षण विद्या एवं शैक्षणिक उपलब्धियों में समतुल्यता के सरोकारों के आधार पर गुणात्मक बदलाव की रूप रेखा तैयार की है इस योजना के विकल्पों को शिक्षक ही अपने अध्यापन कौशल से जमीनी स्तर पर मूर्त रूप प्रदान कर, लक्ष्यों के अनुरूप गुणवत्ता को सही मायनों में स्थापित कर सकता है। वर्तमान समय में शिक्षा में जिस स्तर पर बदलाव अपेक्षित है इसकी नींव विकेन्द्रित रूप से क्षमताओं के विकास और शिक्षक कौशल विकास के द्वारा ही रखी जा सकती है।
  • गुणात्मक शिक्षा चिंतन और सीखने से संबंधित प्रक्रिया के सिद्धांतों पर आधारित है। शिक्षक अध्यापन कौशल से कक्षा-कक्ष में आनन्ददायी वातावरण बनाकर बच्चों के साथ आत्मियता व मित्रता पूर्ण व्यवहार अपनाकर भयमुक्त वातावरण बनाकर खेल विधि व गतिविधि आधारित शिक्षण करवाकर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। एक आदर्श शिक्षक का कौशल छात्र के स्वयं करके सीखने की प्रक्रिया में सहयोग करता है।
  • अध्यापन कौशल वह विशिष्ट अनुदेशन प्रक्रिया है जिसे अध्यापक कक्षा-शिक्षण क्रम की विभिन क्रियाओं से संबंधित उपयोग करता है।

 

  • शिक्षक गुणात्मक शिक्षा में अपनी अहंम भूमिका अदा कर सके इसके लिए उसके शिक्षण कार्य में निम्न कौशलों का होना अत्यआवश्यक है।
  1. उद्दीपन भिन्नता कौशल-शिक्षक को अपनी अध्यापन क्रियाओं को समय≤ पर बदलकर विद्यार्थियों का ध्यान पाठ्य-वस्तु में केन्द्रित कराने का प्रयास करना चाहिये जिससे विद्यार्थियों का ध्यान विषय वस्तु पर आकर्षित हो सके।
  2. विन्यास प्रेरणा कौशल-शिक्षक को पाठ की प्रकृति के आधार पर अभिविन्यास कौशल का विकास कर बच्चों का ध्यान पाठ्य-वस्तु की तरफ केन्द्रित करना चाहिये।
  3. समीपता कौशल-शिक्षक को पाठ्य-वस्तु का संक्षेपीकरण करके विद्यार्थियों का ध्यान विषय वस्तु की ओर आकर्षित कर स्वःअध्ययन के प्रति प्रेरित करना चाहिये।
  4. मौन व अशाब्दिक अन्तः प्रक्रिया कौशल-कक्षा-कक्ष में शिक्षक को शाब्दिक क्रिया के साथ-साथ अशाब्दिक अन्तःप्रक्रिया-संकेत व हाव-भाव का प्रयोग कर विद्यार्थियों को शिक्षण कार्य के प्रति प्रोत्साहित करना चाहिये।
  5. पुनर्बलन-कौशल-शिक्षक को शिक्षण कार्य को आनन्ददायी बनाने के लिऐ बच्चों के सकारात्मक व्यवहारों की प्रशंसा कर उनकी अनुक्रियाओं को स्वीकार कर व मान्यता देकर उनके पुनर्बलन को बढ़ाना चाहिये।
  6. प्रश्नों की प्रवाहशीलता कौशल- कक्षा-कक्ष में छात्र-शिक्षक में प्रश्नोत्तर के संवाद में प्रवाहशीलता व शिक्षण की प्रभावशीलता होनी चाहिये।
  7. खोजपूर्ण प्रश्न कौशल-कक्षा शिक्षण में कई बार शिक्षक के द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर विद्यार्थी नहीं दे पाते हैं उस समय शिक्षक को उस प्रश्न के सहायक प्रश्नोत्तर करने चाहिये जिससे विद्यार्थी को उन से मूल प्रश्न का उत्तर खोजने में सहायता मिल सके।
  8. विद्यार्थी व्यवहार का अभिज्ञान कौशल- एक प्रभावशाली शिक्षक को अधिक संवेदनशील होना चाहिये।
    शिक्षक को विद्यार्थियों की रूचिकर क्रियाओं के प्रति व्यवहार को पहचानकर शिक्षण कार्य करवाना चाहिये।
  9. दृष्टांत देना व उदाहरणों का प्रयोग कौशल- शिक्षण कार्य को प्रभावशाली बनाने के लिए शिक्षक को गतिविधि आधारित शिक्षण करवाते हुए दृष्टांत व उदाहरणों का प्रयोग करना चाहिये ताकि विद्यार्थियों को सीखने में सुगमता प्राप्त हो सके।
  10. व्याख्या कौशल- शिक्षक को शिक्षण कार्य करवाते हुए तथ्यों में बोधगम्यता का ध्यान रखते हुए नियम व सिद्धांतों के आधार पर सरलात्मक शब्दों में व्याख्या करनी चाहिये।
  11. विद्यार्थियों की सहभागिता कौशल- शिक्षक को शिक्षण कार्य में बच्चों की अनुशासनात्मक व सकारात्मक सहभागिता को बनाये रखने के लिए सरल प्रश्नोत्तर करना, स्वयं करके सीखने में उनकी मदद करना, नयेपन के लिए प्रोत्साहित करना, उनकी जिज्ञासा को शांत करना तथा उनके व्यवहार को स्वीकार करना व उनके अनुभवों को शिक्षण में शामिल करना चाहिये।
  12. अनुदेशन- उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप में मिलने का कौशल- शिक्षक के अध्यापन करवाते समय पाठ्य वस्तु के उद्देश्यों का चयन कर, विषय वस्तु का विश्लेषण कर निर्धारित लक्ष्य का व्यावहारिक रूप प्रदान करना चाहिये।
  13. श्याम-पटृ का प्रयोग कौशल- श्याम पटृ शिक्षक का दाहिनां हाथ कहलाता है। यह अध्यापन में दृश्य साधन के रूप में सर्वाधिक प्रयोग में आता है। अध्यापन कार्य में इसका उचित, सही व विधिपूर्वक प्रयोग कर पाठ्य वस्तु को प्रभावशाली बनाने में शिक्षक को निपुण होना चाहिये।
  14. कक्षा व्यवस्था का कौशल- शिक्षक को स्थानीय स्तरानुसार भौतिक, सामाजिक और शैक्षिक क्रियाओं व संसाधनों की समुचित व्यवस्था कर शिक्षण अधिगम के लिए उपयुक्त वातावरण बनाना चाहिये।

  15. दृश्य-श्रव्य सहायक सामग्री का उपयोग कौशल- शिक्षण को प्रभावशाली बनाने व पाठ्य वस्तु को बोधगम्य बनाने के लिए सहायक सामग्री का उपयोग करना चाहिये जिससे पाठ्य वस्तु रूचिकर बनती है और उद्देश्यों की प्राप्ति में मदद मिलती है।
  16. गृह कार्य देने का कौशल- शिक्षक को पर्यवेक्षण अध्यापन को प्रोत्साहित करते हुए विद्यार्थियों को पाठ्य वस्तु की व्यवस्था व परिपाक के आधार पर गृह कार्य देना चाहिये जिससे छात्रों में शिक्षण के प्रति रूचि बढ़े और लेखन कार्य में त्रुटि सुधार कार्य पूर्ण हो।
  17. विद्यार्थियों को साथ लेकर चलने का कौशल- कक्षा-शिक्षण में विद्यार्थियों की व्यक्तिगत भिन्नताओं को ध्यान में रखकर सामूहिक शिक्षण कार्य करवाना चाहिये।
  18. उच्च स्तरीय व विकेन्द्र प्रश्नों का प्रयोग कौशल- शिक्षक को कक्षा शिक्षण में विद्यार्थियों से नियमों, प्रत्ययों व सिद्धांतों के अनुरूप प्रश्नोत्तर करने चाहिये जिससे छात्रों में सामान्यीकरण व सजृनात्मक चिन्तन का विकास हो सके।
  19. व्याख्यान-संप्रेषण की पूर्णता का कौशल- शिक्षक को शिक्षण की समुचित प्रविधियों व युक्तियों का प्रयोग करते हुए पाठ्यवस्तु का प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण करना चाहिये तथा उसे शुद्ध रूप में विद्यार्थियों तक पहुंचाने का प्रयास करना चाहिये।
  20. नियोजित पुनरावृति कौशल- शिक्षक को शिक्षण कार्य के अन्त में खास बिन्दुओं की नियोजित रूप से पुनरावृति करनी चाहिये।

 

  • इस प्रकार गुणात्मक शिक्षण कार्य में शिक्षक अपने अध्यापन की क्रिया में बच्चों से प्रश्न पूछता है, व्याख्या करता है, समझाता है व सहायक सामग्री को बच्चों के सम्मुख प्रदर्शित करता है। वह छात्रों को शिक्षण कार्य में भाग लेने व प्रश्नोत्तर करने के लिए प्रेरित करता है। छात्रों में ज्ञान प्राप्त करने व स्वयं करके सीखने की आकांक्षा उत्पन्न करता है। छात्रों की भावनाओं और दृष्टिकोणों को पहचानता है। छात्रों की क्रियाओं व उपलब्धियों का मूल्यांकन व आंकलन करता है। एक आदर्श शिक्षक अपने अध्यापन कौशलों का उचित समय पर उचित प्रयोग करते हुए छात्र के चहुंमुखी विकास में शिक्षण कार्य का योगदान दे सकता है।
  • रामचन्द्र स्वामी (अध्यापक)
    रा.उ.मा.वि., नत्थूसर गेट, बीकानेर।
    मो. 9414510329

 

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