सोहनलाल द्विवेदी की कविताएँ – Sohanlal Dwivedi Poems in Hindi Language :

सोहनलाल द्विवेदी की कविताएँ – Sohanlal Dwivedi Poems in Hindi Language
सोहनलाल द्विवेदी की कविताएँ - Sohanlal Dwivedi Poems in Hindi Language

सोहनलाल द्विवेदी की कविताएँ – Sohanlal Dwivedi Poems in Hindi Language

  • कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

  • लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
    कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
    नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
    चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
    मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
    चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
    आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
    कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
    डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
    जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
    मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
    बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
    मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
    कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
    असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
    क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो
    जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
    संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम
    कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती
    कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
    – सोहनलाल द्विवेदी

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  • बढे़ चलो, बढे़ चलो

  • न हाथ एक शस्त्र हो, 
    न हाथ एक अस्त्र हो, 
    न अन्न वीर वस्त्र हो, 
    हटो नहीं, डरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।
    रहे समक्ष हिम-शिखर, 
    तुम्हारा प्रण उठे निखर, 
    भले ही जाए जन बिखर, 
    रुको नहीं, झुको नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।
    घटा घिरी अटूट हो, 
    अधर में कालकूट हो, 
    वही सुधा का घूंट हो, 
    जिये चलो, मरे चलो, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।
    गगन उगलता आग हो, 
    छिड़ा मरण का राग हो,
    लहू का अपने फाग हो, 
    अड़ो वहीं, गड़ो वहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।
    चलो नई मिसाल हो, 
    जलो नई मिसाल हो,
    बढो़ नया कमाल हो,
    झुको नही, रूको नही, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।
    अशेष रक्त तोल दो, 
    स्वतंत्रता का मोल दो, 
    कड़ी युगों की खोल दो, 
    डरो नही, मरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।
    – सोहनलाल द्विवेदी

सोहनलाल द्विवेदी की कविताएँ – Sohanlal Dwivedi Poems in Hindi Language

  • आया वसंत आया वसंत

  • आया वसंत आया वसंत
    छाई जग में शोभा अनंत।
    सरसों खेतों में उठी फूल
    बौरें आमों में उठीं झूल
    बेलों में फूले नये फूल
    पल में पतझड़ का हुआ अंत
    आया वसंत आया वसंत।
    लेकर सुगंध बह रहा पवन
    हरियाली छाई है बन बन,
    सुंदर लगता है घर आँगन
    है आज मधुर सब दिग दिगंत
    आया वसंत आया वसंत।
    भौरे गाते हैं नया गान,
    कोकिला छेड़ती कुहू तान
    हैं सब जीवों के सुखी प्राण,
    इस सुख का हो अब नही अंत
    घर-घर में छाये नित वसंत।
    – सोहनलाल द्विवेदी

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  • प्रकृति संदेश
  • पर्वत कहता शीश उठाकर,
    तुम भी ऊँचे बन जाओ।
    सागर कहता है लहराकर,
    मन में गहराई लाओ।
    समझ रहे हो क्या कहती हैं
    उठ उठ गिर गिर तरल तरंग
    भर लो भर लो अपने दिल में
    मीठी मीठी मृदुल उमंग!
    पृथ्वी कहती धैर्य न छोड़ो
    कितना ही हो सिर पर भार,
    नभ कहता है फैलो इतना
    ढक लो तुम सारा संसार!
    – सोहनलाल द्विवेदी
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