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Suryakant Tripathi Nirala Poems in Hindi सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की कविताएँ :

Suryakant Tripathi Nirala Poems in Hindi सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की कविताएँ
Suryakant Tripathi Nirala Poems in Hindi सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की कविताएँ

Suryakant Tripathi Nirala Poems in Hindi font language pdf suryakant tripathi nirala ki kavita in hindi

  • भिक्षुक

    वह आता–
    दो टूक कलेजे के करता पछताता
    पथ पर आता।
    पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
    चल रहा लकुटिया टेक,
    मुट्ठी भर दाने को– भूख मिटाने को
    मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता–
    दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।
    साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,
    बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,
    और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाये।
    भूख से सूख ओठ जब जाते
    दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?–
    घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।
    चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
    और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए!
    – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

  • वर दे, वीणावादिनि वर दे !

    प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
    भारत में भर दे !
    काट अंध-उर के बंधन-स्तर
    बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;
    कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
    जगमग जग कर दे !
    नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
    नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;
    नव नभ के नव विहग-वृंद को
    नव पर, नव स्वर दे !
    वर दे, वीणावादिनि वर दे।
    – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

  • suryakant tripathi nirala poems in hindi bharat vandana
  • भारती वंदना

    भारति, जय, विजय करे
    कनक-शस्य-कमल धरे!
    लंका पदतल-शतदल
    गर्जितोर्मि सागर-जल
    धोता शुचि चरण-युगल
    स्तव कर बहु अर्थ भरे!
    तरु-तण वन-लता-वसन
    अंचल में खचित सुमन
    गंगा ज्योतिर्जल-कण
    धवल-धार हार लगे!
    मुकुट शुभ्र हिम-तुषार
    प्राण प्रणव ओंकार
    ध्वनित दिशाएँ उदार
    शतमुख-शतरव-मुखरे!
    – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

  • भर देते हो

    भर देते हो
    बार-बार, प्रिय, करुणा की किरणों से
    क्षुब्ध हृदय को पुलकित कर देते हो ।
    मेरे अन्तर में आते हो, देव, निरन्तर,
    कर जाते हो व्यथा-भार लघु
    बार-बार कर-कंज बढ़ाकर;
    अंधकार में मेरा रोदन
    सिक्त धरा के अंचल को
    करता है क्षण-क्षण-
    कुसुम-कपोलों पर वे लोल शिशिर-कण
    तुम किरणों से अश्रु पोंछ लेते हो,
    नव प्रभात जीवन में भर देते हो ।
    – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

  • स्नेह-निर्झर बह गया है !

    स्नेह-निर्झर बह गया है !
    रेत ज्यों तन रह गया है ।
    आम की यह डाल जो सूखी दिखी,
    कह रही है-“अब यहाँ पिक या शिखी
    नहीं आते; पंक्ति मैं वह हूँ लिखी
    नहीं जिसका अर्थ-
    जीवन दह गया है ।”
    “दिये हैं मैने जगत को फूल-फल,
    किया है अपनी प्रतिभा से चकित-चल;
    पर अनश्वर था सकल पल्लवित पल–
    ठाट जीवन का वही
    जो ढह गया है ।”
    अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा,
    श्याम तृण पर बैठने को निरुपमा ।
    बह रही है हृदय पर केवल अमा;
    मै अलक्षित हूँ; यही
    कवि कह गया है ।
    – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

  • लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो,

    लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो,
    भरा दौंगरा उन्ही पर गिरा।
    उन्ही बीजों को नये पर लगे,
    उन्ही पौधों से नया रस झिरा।
    उन्ही खेतों पर गये हल चले,
    उन्ही माथों पर गये बल पड़े,
    उन्ही पेड़ों पर नये फल फले,
    जवानी फिरी जो पानी फिरा।
    पुरवा हवा की नमी बढ़ी,
    जूही के जहाँ की लड़ी कढ़ी,
    सविता ने क्या कविता पढ़ी,
    बदला है बादलों से सिरा।
    जग के अपावन धुल गये,
    ढेले गड़ने वाले थे घुल गये,
    समता के दृग दोनों तुल गये,
    तपता गगन घन से घिरा।
    – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

  • बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!

    बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!
    पूछेगा सारा गाँव, बंधु!
    यह घाट वही जिस पर हँसकर,
    वह कभी नहाती थी धँसकर,
    आँखें रह जाती थीं फँसकर,
    कँपते थे दोनों पाँव बंधु!
    वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,
    फिर भी अपने में रहती थी,
    सबकी सुनती थी, सहती थी,
    देती थी सबके दाँव, बंधु!
    – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

  • गर्म पकौड़ी-

    ऐ गर्म पकौड़ी,
    तेल की भुनी
    नमक मिर्च की मिली,
    ऐ गर्म पकौड़ी !
    मेरी जीभ जल गयी
    सिसकियां निकल रहीं,
    लार की बूंदें कितनी टपकीं,
    पर दाढ़ तले दबा ही रक्‍खा मैंने
    कंजूस ने ज्‍यों कौड़ी,
    पहले तूने मुझ को खींचा,
    दिल ले कर फिर कपड़े-सा फींचा,
    अरी, तेरे लिए छोड़ी
    बम्‍हन की पकाई
    मैंने घी की कचौड़ी।
    – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

  • मातृ वंदना

    नर जीवन के स्वार्थ सकल
    बलि हों तेरे चरणों पर, माँ
    मेरे श्रम सिंचित सब फल।
    जीवन के रथ पर चढ़कर
    सदा मृत्यु पथ पर बढ़ कर
    महाकाल के खरतर शर सह
    सकूँ, मुझे तू कर दृढ़तर;
    जागे मेरे उर में तेरी
    मूर्ति अश्रु जल धौत विमल
    दृग जल से पा बल बलि कर दूँ
    जननि, जन्म श्रम संचित पल।
    बाधाएँ आएँ तन पर
    देखूँ तुझे नयन मन भर
    मुझे देख तू सजल दृगों से
    अपलक, उर के शतदल पर;
    क्लेद युक्त, अपना तन दूंगा
    मुक्त करूंगा तुझे अटल
    तेरे चरणों पर दे कर बलि
    सकल श्रेय श्रम संचित फल
    – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

  • अभी न होगा मेरा अन्त

    अभी न होगा मेरा अन्त
    अभी-अभी ही तो आया है
    मेरे वन में मृदुल वसन्त-
    अभी न होगा मेरा अन्त
    हरे-हरे ये पात,
    डालियाँ, कलियाँ कोमल गात!
    मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर
    फेरूँगा निद्रित कलियों पर
    जगा एक प्रत्यूष मनोहर
    पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लूँगा मैं,
    अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं,
    द्वार दिखा दूँगा फिर उनको
    है मेरे वे जहाँ अनन्त-
    अभी न होगा मेरा अन्त।
    मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण,
    इसमें कहाँ मृत्यु?
    है जीवन ही जीवन
    अभी पड़ा है आगे सारा यौवन
    स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर बहता रे, बालक-मन,
    मेरे ही अविकसित राग से
    विकसित होगा बन्धु, दिगन्त;
    अभी न होगा मेरा अन्त।
    – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

  • अग्निपथ कविता हिन्दी में – Agnipath Poem in Hindi Language

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One comment

  1. Devi shanker pandey

    I Like a poem

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