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पंचमुखी हनुमान कवच और उसके फायदे Panchmukhi Hanuman Kavach benefits sanskrit

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पंचमुखी हनुमान कवच और उसके फायदे Panchmukhi Hanuman Kavach benefits sanskrit

 

  • Panchmukhi Hanuman Kavach Benefits

  • पंचमुखी हनुमान कवच का पाठ करने वाले वव्यक्ति को बुरी शक्तियां कभी अपना शिकार नहीं बनाती हैं. सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियां ऐसे व्यक्ति से दूर रहती हैं. पंचमुखी हनुमान कवच का पाठ करने से व्यक्ति के ऊपर टोना, टोटका, काले जादू का असर नहीं होता.

 

  • Panchmukhi Hanuman Kavach

  • ॐ श्री पंचवदनायांजनेयाय नमः। ॐ अस्य श्री पंचमुखहनुमत्कवचमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्रीछन्दः,पंचमुखविराट्हनुमान्‌ देवता, ह्रीं बीजं, श्रीं शक्ति, क्रौं कीलकं, क्रूं कवचं, क्रैं अस्राय फट् इति दिग्बन्धः
  • श्री गरुड उवाच:
    अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि श्रृणुसर्वांगसुन्दरि ।
    यत्कृतं देवदेवेन ध्यानं हनुमतः प्रियम्‌ ॥1॥
    पंचवक्त्रं महाभीमं त्रिपंचनयनैर्युतम्‌ ।
    बाहुभिर्दशभिर्युक्तं सर्वकामार्थसिद्धिदम्‌ ॥2॥
    पूर्वंतु वानरं वक्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम्‌ ।
    दंष्ट्राकरालवदनं भृकुटीकुटिलेक्षणम्‌ ॥3॥
    अस्यैव दक्षिणं वक्त्रं नारसिंहं महाद्भुतम्‌ ।
    अत्युग्रतेजोवपुषं भीषणं भयनाशनम्‌ ॥4॥
    पश्चिमं गारुडं वक्त्रं वक्रतुंडं महाबलम्‌॥
    सर्वनागप्रशमनं विषभूतादिकृन्तनम्‌ ॥5॥
    उत्तरं सौकरं वक्त्रं कृष्णं दीप्तं नभोपमम्‌ ।
    पातालसिंहवेतालज्वररोगादिकृन्तनम्‌ ॥6॥
    ऊर्ध्वं हयाननं घोरं दानवांतकरं परम ।
    येन वक्त्रेण विप्रेंद्र तारकाख्यं महासुरम्‌ ॥7॥
    जघान शरणं तत्स्यात्सर्वशत्रुहरं परम्‌ ।
    ध्यात्वा पंचमुखं रुद्रं हनुमन्तं दयानिधिम्‌ ॥8॥
    खंग त्रिशूलं खट्वांगं पाशमंकुशपर्वतम्‌ ।
    मुष्टिं कौमोदकीं वृक्षं धारयन्तं कमण्डलुम्‌ ॥9॥
    भिन्दिपालं ज्ञानमुद्रां दशभिर्मुनिपुंगवम्‌ ।
    एतान्यायुधजालानि धारयन्तं भजाम्यहम्‌ ॥10॥
    प्रेतासनोपविष्टं तं सर्वाभरणभूषितम्‌ ।
    दिव्यमाल्याम्बरघर दिव्यगन्धानुलेपनम्‌ ॥11॥
    सर्वाश्चर्यमय देव हनुमद्विश्वतोमुखम्‌ ।
    पश्चास्यमच्युतम नेकविचित्रवर्णं वक्त्रं
    शशांकशिखरं कपिराजवयम ।
    पीतांबरादिमुकुटैरूपशोभितांग
    पिंगाक्षमाद्यमनिशं मनसा स्मरामि ॥12॥
    मर्कटेशं महोत्साहं सर्वशत्रुहरं परम्‌ ।
    शत्रु संहर मां रक्ष श्रीमन्नापदमुद्धर ॥13॥
    ॐ हरिमर्कट मर्कट मन्त्रमिदं
    परिलिख्यति लिख्यति वामतले ।
    यदि नश्यति नश्यति शत्रुकुलं
    यदि मुश्चति मुश्चति वामलता ॥14॥
    ॐ हरिमर्कटाय स्वाहा ।
    ॐ नमो भगवते पंचवदनाय पूर्वकपिमुखाय सकलशत्रुसंहारणाय स्वाहा ।
    ॐ नमो भगवते पंचवदनाय दक्षिणमुखाय करालवदनाय नरसिंहाय सकलभूतप्रमथनाय स्वाहा ।
    ॐ नमो भगवते पंचवदनाय पश्चिममुखाय गुरुडाननाय सकलविषहराय स्वाहा ।
    ॐ नमो भगवते पंचवदनायोत्तरमुखायादिवराहाय सकलसम्पत्कराय स्वाहा ।
    ऊँ नमो भगवते पंचवदनायोर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय सकलजनवशंकराय स्वाहा ।
    ॐ अस्य श्री पंचमुखहनुमन्मंत्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः अनुष्टुप्‌छन्दः, पंचमुखवीरहनुमान्‌ देवता, हनुमानितिबीजम्‌, वायुपुत्र इति शक्तिः, अंजनीसुत इति कीलकम्‌, श्रीरामदूतहनुमत्प्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोगः। इति ऋष्यादिकं विन्यस्य ।
    ॐ अंजनीसुताय अंगुष्ठाभ्यां नमः ।
    ॐ रुद्रमूर्तये तर्जनीभ्यां नमः ।
    ॐ वायुपुत्राय मध्माभ्यां नमः ।
    ॐ अग्निगर्भाय अनामिकाभ्यां नमः ।
    ॐ रामदूताय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
    ॐ पंचमुखहनुमते करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
    इति करन्यासः ।
    ॐ अंजनीसुताय हृदयाय नमः ।
    ॐ रुद्रमूर्तये शिरसे स्वाहा ।
    ॐ वायुपुत्राय शिखायै वंषट् ।
    ॐ अग्निगर्भाय कवचाय हुं ।
    ॐ रामदूताय नेत्रत्रयाय वौषट् ।
    ॐ पंचमुखहनुमते अस्राय फट् ।
    पंचमुखहनुमते स्वाहा ।
    इति दिग्बन्धः ।
  • अथ ध्यानम्‌:

  • वन्दे वानरनारसिहखगराट्क्रोडाश्ववक्रान्वितं दिव्यालंकरणं त्रिपश्चनयनं दैदीप्यमानं रुचा । हस्ताब्जैरसिखेटपुस्तकसुधाकुम्भांकुशादि हलं खटांगं फणिभूरुहं दशभुजं सर्वारिवीरापहम्‌ ॥1॥ इति ॥अथ मंत्रः
    ॐ श्रीरामदूतायांजनेयाय वायुपुत्राय महाबलपराक्र्रमाय सीतादुःखनिवारणाय लंकादहनकारणाय महाबलप्रचण्डाय फाल्गुनसखाय कोलाहलसकल ब्रह्माण्डविश्वरूपाय सप्तसमुद्रनिर्लंघनाय पिंगलनयनायामितविक्रमाय सूर्यबिम्बफलसेवनाय दुष्टनिवारणाय दृष्टिनिरालंकृताय संजीविनीसंजीवितांगदलक्ष्मणमहाकपिसैन्यप्राणदाय दशकण्ठविध्वंसनाय रामेष्टाय महाफाल्गुनसखाय सीतासहित रामवरप्रदाय षट्प्रयोगागम पंचमुखवीरहनुमन्मंत्रजपे विनियोगः ।
    ॐ हरिमर्कटमर्कटाय बंबंबंबंबं वौषट् स्वाहा ।
    ॐ हरिमर्कटमर्कटाय फंफंफंफंफं फट् स्वाहा ।
    ॐ हरिमर्कटमर्कटाय खेंखेंखेंखेंखें मारणाय स्वाहा ।
    ॐ हरिमर्कटमर्कटाय लुंलुंलुंलुंलुं आकर्षितसकलसम्पत्कराय स्वाहा ।
    ॐ हरिमर्कटमर्कटाय धंधंधंधंधं शत्रुस्तम्भनाय स्वाहा ।ॐ टंटंटंटंटं कूर्ममूर्तये पंचमुखवीरहनुमते परयन्त्रपरतंत्रोच्चाटनाय स्वाहा ।
    ऊँ कंखंगंघंडं चंछंजंझंञं टंठंडंढंणं तंथंदंधंनं पंफंबंभंमं यंरंलंवं शंषंसंहं ळं क्ष स्वाहा। इति दिग्बंधः ।
    ॐ पूर्वकपिमुखाय पंचमुखहनुमते टंटंटंटंटं सकलशत्रुसंहरणाय स्वाहा ।
    ॐ दक्षिणमुखाय पंचमुखहनुमते करालवदनाय नरसिहाय ।ॐ ह्रां ह्रीं ह्रुं ह्रैं ह्रौं ह्रः सकलभूतप्रेतदमनाय स्वाहा ।
    ऊँ पश्चिममुखाय गरुडाननाय पंचमुखहनुमते मंमंमंमंमं सकलविषहराय स्वाहा ।
    ॐ उत्तरमुखायादिवराहाय लंलंलंलंलं नृसिंहाय नीलकण्ठमूर्तये पंचमुखहनुमतये स्वाहा ।
    ॐ उर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय रुंरुंरुंरुंरुं रुद्रमूर्तये सकलप्रयोजननिर्वाहकाय स्वाहा ।ऊँ अंजनीसुताय वायुपुत्राय महाबलाय सीताशोकनिवारणाय श्रीरामचंद्रकृपापादुकाय
    महावीर्यप्रमथनाय ब्रह्माण्डनाथाय कामदाय पंचमुखवीरहनुमते स्वाहा ।
    भूतप्रेतपिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिन्यन्तरिक्षग्रह परयंत्रपरतंत्रोच्चटनाय स्वाहा ।
    सकलप्रयोजननिर्वाहकाय पंचमुखवीरहनुमते श्रीरामचन्द्रवरप्रसादाय जंजंजंजंजं स्वाहा ।
    इदं कवचं पठित्वा तु महाकवच पठेन्नरः ।
    एकवारं जपेत्स्तोत्रं सर्वशत्रुनिवारणम्‌ ॥15॥
    द्विवारं तु पठेन्नित्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम्‌ ।
    त्रिवारं च पठेन्नित्यं सर्वसम्पतकरं शुभम्‌ ॥16॥
    चतुर्वारं पठेन्नित्यं सर्वरोगनिवारणम्‌ ।
    पंचवारं पठेन्नित्यं सर्वलोकवशंकरम्‌ ॥17॥
    षड्वारं च पठेन्नित्यं सर्वदेववशंकरम्‌ ।
    सप्तवारं पठेन्नित्यं सर्वसौभाग्यदायकम्‌ ॥18॥
    अष्टवारं पठेन्नित्यं मिष्टकामार्थसिद्धिदम्‌ ।
    नववारं पठेन्नित्यं राजभोगमवाप्युनात्‌ ॥19॥
    शवारं पठेन्नित्यं त्रैलोक्यज्ञानदर्शनम्‌ ।
    रुद्रावृत्तिं पठेन्नित्यं सर्वसिद्धिर्भवेद्ध्रुवम्‌ ॥20॥
    कवचस्मतरणेनैव महाबलमवाप्नुयात्‌ ॥21॥
    ॥ सुदर्शनसंहितायां श्रीरामचन्द्रसीताप्रोक्तं श्री पंचमुखहनुमत्कवचं संपूर्ण ॥

 

Kalawa Bandhne Ka Mantra मौली कलावा बांधने का मन्त्र mouli bandhan raksha sutra

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Kalawa Bandhne Ka Mantra मौली कलावा बांधने का मन्त्र mouli bandhan raksha sutra

  • कलावा या मौली बांधना सनातन वैदिक परंपरा का हिस्सा है. पूजा, यज्ञ या कोई अन्य शुभ कार्य करते समय कलाई में कलावा बांधा जाता है. कलावा को मौली भी कहते हैं. मौली को हर हिन्दू बांधता है. इसे मूलत: रक्षा सूत्र कहते हैं. ‘मौली’ का शाब्दिक अर्थ है ‘सबसे ऊपर’. मौली को कलाई में बांधने के कारण इसे कलावा भी कहते हैं. इसका वैदिक नाम उप मणिबंध भी है. मौली कच्चे धागे से बनाई जाती है.

 

  • Kalawa Bandhne Ka Mantra मौली कलावा बांधने का मन्त्र mouli bandhan raksha sutra

  • मौली / कलावा / रक्षा सूत्र बांधने का मंत्र :

    ‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:
    तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल..’

  • मौली को हाथ की कलाई में बांधा जाता है. मन्नत के लिए किसी देव स्थान पर भी बांधा जाता है. इसे घर में लाई गई नई वस्तु को भी बांधा जाता है.
  • मौली बांधने के नियम :
  • शास्त्रों के अनुसार पुरुषों को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए. स्त्रियों को बाएँ हाथ में कलावा बांधना चाहिए.
  • कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों, उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए.
  • मौली बांधते समय मन्त्र जरुर बोलना चाहिए.
  • पर्व-त्योहार में भी आप रक्षा सूत्र बांध सकते हैं और जिस किसी भी दिन कोई शुभ कार्य करें उस दिन भी कलावा बांध सकते हैं. रक्षा सूत्र किसी भी दिन बंधवाया जा सकता है. इसके लिए किसी खास दिन की जरूरत नहीं है.
  • उतारी हुई पुरानी मौली को पीपल के वृक्ष के पास रख दें या किसी बहते हुए जल में बहा दें.
  • मौली धार्मिक आस्था का प्रतीक है.

  • किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते हैं ताकि वह हमारे जीवन में मंगल लाये.
  • हिन्दू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म के पूर्व पुरोहितों द्वारा यजमान के हाथ में मौली बांधी जाती है.
  • मौली को कलाई में बांधने पर कलावा या उप मणिबंध कहते हैं. हाथ के मूल में 3 रेखाएं होती हैं जिनको मणिबंध कहते हैं. इन तीनों रेखाओं में दैहिक, दैविक व भौतिक जैसे त्रिविध तापों को देने व मुक्त करने की शक्ति रहती है.
  • जब हम कलावा का मंत्र रक्षा हेतु पढ़कर कलाई में बांधते हैं तो यह तीन धागों का सूत्र त्रिदेवों व त्रिदेवियों को समर्पित हो जाता है. जिससे रक्षा-सूत्र धारण करने वाले प्राणी की हमेशा रक्षा होती है. इस रक्षा-सूत्र को संकल्पपूर्वक बांधने से व्यक्ति पर मारण, मोहन, विद्वेषण, उच्चाटन, भूत-प्रेत और जादू-टोने का असर नहीं होता.
  • मौली बांधने से त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों- लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है. ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति, विष्णु की कृपा से रक्षा तथा शिव की कृपा से दुर्गुणों का नाश होता है. इसी प्रकार लक्ष्मी से धन, दुर्गा से शक्ति एवं सरस्वती की कृपा से बुद्धि प्राप्त होती है.

 

  • कलावा मंदिरों में मन्नत के लिए भी बांधी जाती है. जिसे संकल्प करके बांधा जाता है. मन्नत पूरी होने पर मौली बांधकर किए गए संकल्प को पूरा नहीं करना संकट में डाल सकता है.
  • कमर पर बांधी गई मौली से सूक्ष्म शरीर स्थिर रहता है और कोई दूसरी बुरी आत्मा आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती है. बच्चों को अक्सर कमर में मौली बांधी जाती है. यह काला धागा भी हो सकता है
  • प्राचीनकाल से ही कलाई, पैर, कमर और गले में भी मौली बांधे जाने की परंपरा के ‍चिकित्सीय लाभ भी हैं. शरीर विज्ञान के अनुसार इससे त्रिदोष अर्थात वात, पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है. पुराने वैद्य और घर-परिवार के बुजुर्ग लोग हाथ, कमर, गले व पैर के अंगूठे में मौली का उपयोग करते थे, जो शरीर के लिए लाभकारी था.

 

ॐ जय शिव ओंकारा आरती लिरिक्स – Om Jai Shiv Omkara Aarti Lyrics sms font msg text

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ॐ जय शिव ओंकारा आरती लिरिक्स – Om Jai Shiv Omkara Aarti Lyrics sms font msg text

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  • जय शिव ओंकारा, ॐ जय शिव ओंकारा।
    ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
    ॥ जय शिव ओंकारा…॥
    एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
    हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥
    ॥ जय शिव ओंकारा…॥
    दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
    त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥
    ॥ जय शिव ओंकारा…॥
    अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
    चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी॥
    ॥ जय शिव ओंकारा…॥
    श्वेतांबर पीतांबर बाघंबर अंगे।
    सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥
    ॥ जय शिव ओंकारा…॥
    कर के मध्य कमंडल चक्र त्रिशूलधारी।सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥
    ॥ जय शिव ओंकारा…॥
    ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
    प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका॥
    ॥ जय शिव ओंकारा…॥
    त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
    कहत शिवानंद स्वामी सुख संपति पावे॥
    ॥ जय शिव ओंकारा…॥
    —– Addition —-
    लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।
    पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥
    ॥ जय शिव ओंकारा…॥
    पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
    भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥
    ॥ जय शिव ओंकारा…॥
    जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
    शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥
    ॥ जय शिव ओंकारा…॥
    काशी में विराजे विश्वनाथ, नंदी ब्रह्मचारी।
    नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥
    जय शिव ओंकारा, ॐ जय शिव ओंकारा।
    ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

 

  • Shiv Aarti In English

  • Om jai Shiv Omkara, Om jai Shiv Omkara|
    Bhramha, Vishnu, Sdashiva, adaghi dhara|| Om Jai…
    Ekanana, chaturanna, panchana raje|
    hansanan, gharurasna, vrishvahan saje|| Om Jai…
    Do bhuj char chatur bhuj, das bhuj ati sohe|
    teeno rupa nirakhta, trivuban jaan mohe|| Om Jai…
    Akshamala vana-mala, rudra-mala dhari|
    chandan mirga maad sohe, bhole shubh kari|| Om Jai…
    Shwetambar, pitambar, bhagambar ange|
    sankadik, bhramhadik, bhootadik sanghee| Om jai…
    Kar Men Madhya Kamandalu Chakra Trishool dharta|
    Jagkarta Dukha harta, Jag Palankarta|| Om Jai…
    Brahma, Vishnu, Sadashiv, Janat Aviveka|
    Pranvakshar Ke Madhye, Yah Tinon Eka|| Om Jai…
    Trigun Swamiji Ki Aarti Jo Koi Nar Gave|
    Kahat Shivanand Swami, Manvanchhit Phal Pave|| Om Jai…

शिव चालीसा Lyrics – Shiv Chalisa in Hindi – Bhagwan Shiv Ki Chalisa in English Font

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शिव चालीसा Lyrics – Shiv Chalisa in Hindi – Bhagwan Shiv Ki Chalisa in English Font

  • Shiv Chalisa in Hindi Lyrics

 

  • ॥दोहा॥
    जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान। कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
    ॥चौपाई॥
    जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
    भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
    अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥
    वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥
    मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
    कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
    नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
    कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
    देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
    किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
    तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
    आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
    त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
    किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
    दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
    वेद माहि महिमा तुम गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
    प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥
    कीन्ही दया तहं करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
    पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
    सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
    एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
    कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
    जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
    दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥
    त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। येहि अवसर मोहि आन उबारो॥
    लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट ते मोहि आन उबारो॥
    मात-पिता भ्राता सब होई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
    स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी॥
    धन निर्धन को देत सदा हीं। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥
    अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
    शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
    योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥
    नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
    जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शम्भु सहाई॥
    ॠनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
    पुत्र होन कर इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
    पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥
    त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। ताके तन नहीं रहै कलेशा॥
    धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
    जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे॥
    कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥
    ॥दोहा॥
    नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा। तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
    मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान। अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

 

  • Shiva Chalisa in English

    ||Dohaa||
    Jai Ganesh Girija Suvan, Mangal Mul Sujan|
    Kahat Ayodhya Das, Tum Dey Abhaya Varadan||
    ||Choupayi||
    Jai Girija Pati Dinadayala |Sada Karat Santan Pratipala||
    Bhala Chandrama Sohat Nike| Kanan Kundal Nagaphani Ke||
    Anga Gaur Shira Ganga Bahaye| Mundamala Tan Chhara Lagaye||
    Vastra Khala Baghambar Sohain| Chhavi Ko Dekha Naga Muni Mohain||
    Maina Matu Ki Havai Dulari| Vama Anga Sohat Chhavi Nyari||
    Kara Trishul Sohat Chhavi Bhari| Karat Sada Shatrun Chhayakari ||
    Nandi Ganesh Sohain Tahan Kaise| Sagar Madhya Kamal Hain Jaise||
    Kartik Shyam Aur Gana rauo| Ya Chhavi Ko Kahi Jata Na Kauo||
    Devan Jabahi Jaya Pukara| Tabahi Dukha Prabhu Apa Nivara||
    Kiya Upadrav Tarak Bhari| Devan Sab Mili Tumahi Juhari||
    Turata Shadanana Apa Pathayau| Luv nimesh Mahi Mari Girayau ||
    Apa Jalandhara Asura Sanhara| Suyash Tumhara Vidit Sansara||
    Tripurasur Sana Yudha Machai| Sabhi Kripakar Lina Bachai||
    Kiya Tapahin Bhagiratha Bhari| Purahi Pratigya Tasu Purari||
    Darpa chod Ganga thabb Aayee|Sevak Astuti Karat Sadahin||
    Veda Nam Mahima Tav Gai| Akatha Anandi Bhed Nahin Pai||
    Pragati Udadhi Mantan te Jvala| Jarae Sura-Sur Bhaye bihala||
    Mahadev thab Kari Sahayee,| Nilakantha Tab Nam Kahai||
    Pujan Ramchandra Jab Kinha| Jiti Ke Lanka Vibhishan Dinhi||
    Sahas Kamal Men Ho Rahe Dhari| Kinha Pariksha Tabahin Purari||
    Ek Kamal Prabhu Rakheu goyee| Kushal-Nain Pujan Chahain Soi||
    Kathin Bhakti Dekhi Prabhu Shankar| Bhaye Prasanna Diye-Ichchhit Var||
    Jai Jai Jai Anant Avinashi| Karat Kripa Sabake Ghat Vasi||
    Dushta Sakal Nit Mohin Satavai| Bhramat Rahe Man Chain Na Avai||
    Trahi-Trahi Main Nath Pukaro| Yahi Avasar Mohi Ana Ubaro||
    Lai Trishul Shatrun Ko Maro| Sankat Se Mohin Ana Ubaro||
    Mata Pita Bhrata Sab Hoi| Sankat Men Puchhat Nahin Koi||
    Swami Ek Hai Asha Tumhari| Ai Harahu Ab Sankat Bhari||
    Dhan Nirdhan Ko Deta Sadahin| Arat jan ko peer mitaee||
    Astuti Kehi Vidhi Karai Tumhari| Shambhunath ab tek tumhari||
    Dhana Nirdhana Ko Deta Sadaa Hii| Jo Koi Jaanche So Phala Paahiin||
    Astuti Kehi Vidhi Karon Tumhaarii| Kshamahu Naatha Aba Chuuka Hamaarii||
    Shankar Ho Sankat Ke Nashan| Vighna Vinashan Mangal Karan||
    Yogi Yati Muni Dhyan Lagavan| Sharad Narad Shisha Navavain||
    Namo Namo Jai Namah Shivaya| Sura Brahmadik Par Na Paya||
    Jo Yah Patha Karai Man Lai| To kon Hota Hai Shambhu Sahai||
    Riniyan Jo Koi Ho Adhikari| Patha Karai So Pavan Hari||
    Putra-hin Ichchha Kar Koi| Nischaya Shiva Prasad Tehin Hoi||
    Pandit Trayodashi Ko Lavai| Dhyan-Purvak Homa Karavai||
    Trayodashi Vrat Kare Hamesha| Tan Nahin Take Rahe Kalesha||
    Dhuupa Diipa Naivedya Chadhaave| Shankara Sammukha Paatha Sunaave||
    Janma Janma Ke Paapa Nasaave| Anta Dhaama Shivapura Men Paave||
    ||Dohaa||
    Nitya Nema kari Pratahi| Patha karau Chalis||
    Tum Meri Man Kamana| Purna Karahu Jagadisha||
    Magsir Chathi Hemant Riitu| Sanvat Chousadh Jaan||
    Stuti Chalisa Shivhin| Purn keen Kalyaan||

 

कृष्ण चालीसा मन्त्र नाम Shri Krishna Chalisa Mantra 108 Names aarti in Hindi

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कृष्ण चालीसा मन्त्र नाम Shri Krishna Chalisa Mantra 108 Names aarti in Hindi

 

 


  • श्री कृष्ण चालीसा
    ( Shri Krishna Chalisa in Hindi )

    ॥दोहा॥
    बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
    अरुण अधर जनु बिम्बफल, नयन कमल अभिराम॥
    पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज।
    जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥
    जय यदुनंदन जय जगवंदन।जय वसुदेव देवकी नन्दन॥
    जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥
    जय नटनागर, नाग नथइया॥ कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥
    पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥
    वंशी मधुर अधर धरि टेरौ। होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥
    आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥
    गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥
    राजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥
    कुंडल श्रवण, पीत पट आछे। कटि किंकिणी काछनी काछे॥
    नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥
    मस्तक तिलक, अलक घुँघराले। आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥
    करि पय पान, पूतनहि तार्यो। अका बका कागासुर मार्यो॥
    मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला। भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥
    सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई। मूसर धार वारि वर्षाई॥
    लगत लगत व्रज चहन बहायो। गोवर्धन नख धारि बचायो॥
    लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥
    दुष्ट कंस अति उधम मचायो॥ कोटि कमल जब फूल मंगायो॥
    नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥
    करि गोपिन संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥
    केतिक महा असुर संहार्यो। कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो॥
    मातपिता की बन्दि छुड़ाई ।उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥
    महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥
    भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहसकुमारी॥
    दै भीमहिं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥
    असुर बकासुर आदिक मार्यो। भक्तन के तब कष्ट निवार्यो॥
    दीन सुदामा के दुःख टार्यो। तंदुल तीन मूंठ मुख डार्यो॥
    प्रेम के साग विदुर घर माँगे।दर्योधन के मेवा त्यागे॥
    लखी प्रेम की महिमा भारी।ऐसे श्याम दीन हितकारी॥
    भारत के पारथ रथ हाँके।लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥
    निज गीता के ज्ञान सुनाए।भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥
    मीरा थी ऐसी मतवाली।विष पी गई बजाकर ताली॥
    राना भेजा साँप पिटारी।शालीग्राम बने बनवारी॥
    निज माया तुम विधिहिं दिखायो।उर ते संशय सकल मिटायो॥
    तब शत निन्दा करि तत्काला।जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥
    जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।दीनानाथ लाज अब जाई॥
    तुरतहि वसन बने नंदलाला।बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥
    अस अनाथ के नाथ कन्हइया। डूबत भंवर बचावइ नइया॥
    सुन्दरदास आ उर धारी।दया दृष्टि कीजै बनवारी॥
    नाथ सकल मम कुमति निवारो।क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥
    खोलो पट अब दर्शन दीजै।बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥
    ॥दोहा॥
    यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
    अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥

 


  • Shri Krishna Mantra in Hindi
    श्री कृष्ण मन्त्र

    भगवान श्री कृष्ण की पूजा के दौरान इस मंत्र को पढ़ते हुए उन्हें नारियल फल समर्पण करना चाहिए.
    इदं फ़लं मया देव स्थापित पुर-तस्तव |
    तेन मे सफ़लानत्ति भरवेजन्मनि जन्मनि ||
    • इस मंत्र को पढ़ते हुए भगवान श्री कृष्ण को पान-बीड़ा समर्पण करना चाहिए.
    ॐ पूंगीफ़लं महादिव्यं नागवल्ली दलैर्युतम् |
    एला-चूर्णादि संयुक्तं ताम्बुलं प्रतिगृहयन्ताम् ||
    • इस मंत्र को पढ़ते हुए बाल गोपाल भगवान श्री कृष्ण को चन्दन अर्पण करना चाहिए.
    ॐ श्रीखण्ड-चन्दनं दिव्यं गंधाढ़्यं सुमनोहरम् |
    विलेपन श्री कृष्ण चन्दनं प्रतिगृहयन्ताम् ||
    • श्री कृष्ण की पूजा करते समय इस मंत्र को पढ़ते हुए उन्हें सुगन्धित धूप अर्पण करना चाहिए.
    वनस्पति रसोद भूतो गन्धाढ़्यो गन्ध उत्तमः |
    आघ्रेयः सर्व देवानां धूपोढ़्यं प्रतिगृहयन्ताम् ||
    • इस मंत्र के द्वारा नंदलाल भगवान श्री कृष्ण को यज्ञोपवीत समर्पण करना चाहिए.
    नव-भिस्तन्तु-भिर्यक्तं त्रिगुणं देवता मयम् |
    उपवीतं मया दत्तं गृहाण परमेश्वरः ||

 


  • भगवान कृष्ण के 108 नाम
    (108 Names of Lord Krishna in Hindi)

    1 अचला : भगवान।
    2 अच्युत : अचूक प्रभु, या जिसने कभी भूल ना की हो।
    3 अद्भुतह : अद्भुत प्रभु।
    4 आदिदेव : देवताओं के स्वामी।
    5 अदित्या : देवी अदिति के पुत्र।
    6 अजंमा : जिनकी शक्ति असीम और अनंत हो।
    7 अजया : जीवन और मृत्यु के विजेता।
    8 अक्षरा : अविनाशी प्रभु।
    9 अम्रुत : अमृत जैसा स्वरूप वाले।
    10 अनादिह : सर्वप्रथम हैं जो।
    11 आनंद सागर : कृपा करने वाले
    12 अनंता : अंतहीन देव
    13 अनंतजित : हमेशा विजयी होने वाले।
    14 अनया : जिनका कोई स्वामी न हो।
    15 अनिरुध्दा : जिनका अवरोध न किया जा सके।
    16 अपराजीत : जिन्हें हराया न जा सके।
    17 अव्युक्ता : माणभ की तरह स्पष्ट।
    18 बालगोपाल : भगवान कृष्ण का बाल रूप।
    19 बलि : सर्व शक्तिमान।
    20 चतुर्भुज : चार भुजाओं वाले प्रभु।
    21 दानवेंद्रो : वरदान देने वाले।
    22 दयालु : करुणा के भंडार।
    23 दयानिधि : सब पर दया करने वाले।
    24 देवाधिदेव : देवों के देव
    25 देवकीनंदन : देवकी के लाल (पुत्र)।
    26 देवेश : ईश्वरों के भी ईश्वर
    27 धर्माध्यक्ष : धर्म के स्वामी
    28 द्वारकाधीश : द्वारका के अधिपति।
    29 गोपाल : ग्वालों के साथ खेलने वाले।
    30 गोपालप्रिया : ग्वालों के प्रिय
    31 गोविंदा : गाय, प्रकृति, भूमि को चाहने वाले।
    32 ज्ञानेश्वर : ज्ञान के भगवान
    33 हरि : प्रकृति के देवता।
    34 हिरंयगर्भा : सबसे शक्तिशाली प्रजापति।
    35 ऋषिकेश : सभी इंद्रियों के दाता।
    36 जगद्गुरु : ब्रह्मांड के गुरु
    37 जगदिशा : सभी के रक्षक
    38 जगन्नाथ : ब्रह्मांड के ईश्वर।
    39 जनार्धना : सभी को वरदान देने वाले।
    40 जयंतह : सभी दुश्मनों को पराजित करने वाले।
    41 ज्योतिरादित्या : जिनमें सूर्य की चमक है।
    42 कमलनाथ : देवी लक्ष्मी की प्रभु
    43 कमलनयन : जिनके कमल के समान नेत्र हैं।
    44 कामसांतक : कंस का वध करने वाले।
    45 कंजलोचन : जिनके कमल के समान नेत्र हैं।
    46 केशव :
    47 कृष्ण : सांवले रंग वाले।
    48 लक्ष्मीकांत : देवी लक्ष्मी की प्रभु।
    49 लोकाध्यक्ष : तीनों लोक के स्वामी।
    50 मदन : प्रेम के प्रतीक।

    51 माधव : ज्ञान के भंडार।

    52 मधुसूदन : मधु- दानवों का वध करने वाले।
    53 महेंद्र : इन्द्र के स्वामी।
    54 मनमोहन : सबका मन मोह लेने वाले।
    55 मनोहर : बहुत ही सुंदर रूप रंग वाले प्रभु।
    56 मयूर : मुकुट पर मोर- पंख धारण करने वाले भगवान।
    57 मोहन : सभी को आकर्षित करने वाले।
    58 मुरली : बांसुरी बजाने वाले प्रभु।
    59 मुरलीधर : मुरली धारण करने वाले।
    60 मुरलीमनोहर : मुरली बजाकर मोहने वाले।
    61 नंद्गोपाल : नंद बाबा के पुत्र।
    62 नारायन : सबको शरण में लेने वाले।
    63 निरंजन : सर्वोत्तम।
    64 निर्गुण : जिनमें कोई अवगुण नहीं।
    65 पद्महस्ता : जिनके कमल की तरह हाथ हैं।
    66 पद्मनाभ : जिनकी कमल के आकार की नाभि हो।
    67 परब्रह्मन : परम सत्य।
    68 परमात्मा : सभी प्राणियों के प्रभु।
    69 परमपुरुष : श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाले।
    70 पार्थसार्थी : अर्जुन के सारथी।
    71 प्रजापती : सभी प्राणियों के नाथ।
    72 पुंण्य : निर्मल व्यक्तित्व।
    73 पुर्शोत्तम : उत्तम पुरुष।
    74 रविलोचन : सूर्य जिनका नेत्र है।
    75 सहस्राकाश : हजार आंख वाले प्रभु।
    76 सहस्रजित : हजारों को जीतने वाले।
    77 सहस्रपात : जिनके हजारों पैर हों।
    78 साक्षी : समस्त देवों के गवाह।
    79 सनातन : जिनका कभी अंत न हो।
    80 सर्वजन : सब- कुछ जानने वाले।
    81 सर्वपालक : सभी का पालन करने वाले।
    82 सर्वेश्वर : समस्त देवों से ऊंचे।
    83 सत्यवचन : सत्य कहने वाले।
    84 सत्यव्त : श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाले देव।
    85 शंतह : शांत भाव वाले।
    86 श्रेष्ट : महान।
    87 श्रीकांत : अद्भुत सौंदर्य के स्वामी।
    88 श्याम : जिनका रंग सांवला हो।
    89 श्यामसुंदर : सांवले रंग में भी सुंदर दिखने वाले।
    90 सुदर्शन : रूपवान।
    91 सुमेध : सर्वज्ञानी।
    92 सुरेशम : सभी जीव- जंतुओं के देव।
    93 स्वर्गपति : स्वर्ग के राजा।
    94 त्रिविक्रमा : तीनों लोकों के विजेता
    95 उपेंद्र : इन्द्र के भाई।
    96 वैकुंठनाथ : स्वर्ग के रहने वाले।
    97 वर्धमानह : जिनका कोई आकार न हो।
    98 वासुदेव : सभी जगह विद्यमान रहने वाले।
    99 विष्णु : भगवान विष्णु के स्वरूप।
    100 विश्वदक्शिनह : निपुण और कुशल।
    101 विश्वकर्मा : ब्रह्मांड के निर्माता
    102 विश्वमूर्ति : पूरे ब्रह्मांड का रूप।
    103 विश्वरुपा : ब्रह्मांड- हित के लिए रूप धारण करने वाले।
    104 विश्वात्मा : ब्रह्मांड की आत्मा।
    105 वृषपर्व : धर्म के भगवान।
    106 यदवेंद्रा : यादव वंश के मुखिया।
    107 योगि : प्रमुख गुरु।
    108 योगिनाम्पति : योगियों के स्वामी।

 


  • Shri Krishna Aarti in Hindi
    श्री कृष्ण जी की आरती

    आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
    आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
    गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।
    श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।
    गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
    लतन में ठाढ़े बनमाली
    भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक
    ललित छवि श्यामा प्यारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
    ॥ आरती कुंजबिहारी की…॥
    कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।
    गगन सों सुमन रासि बरसै।
    बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग
    अतुल रति गोप कुमारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
    ॥ आरती कुंजबिहारी की…॥

 

सीता हरण की वास्तविक कहानी जानते हैं आप ! ramayan Sita Haran story in hindi

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  • रामायण में सीता हरण का प्रसंग आता है. इस लेख में हम जानेंगे कि सीता हरण की जो कहानी लोगों के बीच फैली हुई है. उस कथा में और वास्तविकता में क्या अंतर है.

 

  • लोगों के बीच यह कहानी फैली हुई है कि जब राम सीता और लक्ष्मण वनवास काट रहे थे. वे कुटिया बनाकर रहते थे.
    एक दिन रावण ने सीता हरण के उद्देश्य से मारीच को सोने का मृग बनकर सीता की नजरों के सामने जाने के लिए बोला.
    मारीच भगवान राम से छल नहीं करना चाहता था, उसने कहा, वह राम-सीता से छल नहीं करेगा. तो रावण ने मारीच को धमकी दी कि यदि वह सोने का मृग बनकर सीता के सामने नहीं जायेगा. तो रावण खुद उसका वध कर देगा. तब मारीच ने सोचा, रावण के हाथों मरकर उसे मुक्ति भी नहीं मिलेगी… जबकि राम के हाथों अगर उसे मृत्यु आई भी तो वह मोक्ष पा लेगा.
    मारीच सोने का हिरण बनकर माता सीता के सामने आया और जैसे हीं उसने देखा कि माता सीता ने उसे देख लिया है.
    मारीच घने वन की ओर भाग चला. माता सीता ने भगवान राम से कहा, मैंने सोने का मृग देखा है… मुझे वह सोने का मृग चाहिए. भगवान राम ने माता सीता से कहा, सोने का मृग नहीं होता है. यह कोई भ्रम होगा. पर माता सीता ने भगवान राम की बात नहीं मानी और राम से सोने के मृग को लाने की जिद करने लगी. राम लक्ष्मण को सीता की सुरक्षा करने को बोलकर सोने के मृग के पीछे चल दिए. आगे-आगे मृग दौड़ा जा रहा था और पीछे-पीछे राम दौड़ रहे थे. बहुत देर हो गई, राम मृग को लेकर नहीं आये.
    तभी सीता ने राम की आवाज सुनी, “ लक्ष्मण मुझे बचाओ “. सीता ने वही आवाज़ कई बार सुनी. तो सीता ने लक्ष्मण से कहा, आप अपने भ्राता की मदद के लिए जाइये. लक्ष्मण ने कहा, भैया राम को कोई कुछ नहीं कर सकता है, यह जरुर किसी की माया होगी. लेकिन लक्ष्मण के वन की ओर भगवान राम की मदद के लिए जाने के लिए सीता जिद करने लगी. लक्ष्मण ने कुटिया से निकलते समय कुटिया के द्वार के बाहर एक रेखा खींच दी, जिसे पार करके कोई भी जीव कुटिया के भीतर प्रवेश नहीं कर सकता था.
    इसी रेखा को लक्ष्मण रेखा कहते हैं. लक्ष्मण के जाने के कुछ देर के बाद रावण ऋषि का वेश बनाकर आया.
    और माता सीता से भिक्षा मांगने लगा. माता सीता उसे भिक्षा देने लगी, तो उसने लक्ष्मण रेखा को देखा….
    जिसे पार करके वह सीता हरण नहीं कर पायेगा. तो रावण क्रोधित होने का ढोंग करने लगा. रावण बोला,
    अगर तुम बंधन में रहकर भिक्षा दोगी, तो मैं तुम्हारी भिक्षा ग्रहण नहीं करूंगा. माता सीता उससे लक्ष्मण रेखा में रहकर हीं, भिक्षा लेने की विनती करने लगी. लेकिन रावण अपनी जिद पर अड़ा रहा. अंत में सीता लक्ष्मण रेखा को पार कर भिक्षा देने, रेखा से बाहर आई. सीता के रेखा पार करते हीं रावण अपने वास्तविक रूप में आ गया. और सीता का हाथ पकड़कर पुष्पक विमान में बैठाकर लंका ले गया. इस तरह से सीता हरण हुआ.
    लोग सोचते हैं, रावण ने वास्तविक सीता का हरण किया. लेकिन सच्चाई यह है कि राम को रावण के सीता हरण की योजना की जानकारी पहले हीं मिल गई थी. राम ने अग्नि देवता का आवाहन कर उन्हें बुलाया था. राम ने अग्नि देव से कहा, अग्नि देव आप अपनी पुत्री सीता को अपने पास सुरक्षित रखिये. भूलोक में कुछ लीला करनी है, उसके पश्चात मैं सीता को आपके पास से ले लूँगा. उसके बाद से छाया सीता हीं राम के साथ रह रही थी. आप छाया सीता को आधुनिक शब्दों में क्लोन सीता भी कह सकते हैं. अर्थात छाया सीता का हीं रावण ने अपहरण किया था. क्योंकि सीता पतिव्रता स्त्री थी, इसलिए अगर रावण वास्तविक सीता को छू भी लेता, तो उसी क्षण वह भस्म हो जाता.
    यह रही सीता के हरण की वास्तविकता. इस सच्चाई को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं. ताकि सीता हरण की सच्चाई सभी तक पहुंचे.

 

Rashtriya Geet Vande Mataram word meaning in hindi – वन्दे मातरम् का अर्थ

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Rashtriya Geet Vande Mataram word meaning in hindi - वन्दे मातरम् का अर्थ

 

  • वंदेमातरम् ऐसा गीत है, जो राष्ट्र भक्ति की भावना लोगों में भर देता है. वंदेमातरम् ने आजादी से पहले लोगों को जागरूक और एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई थी. हम सभी भारतीयों को पूरा वंदेमातरम् पता होना चाहिए और इसका अर्थ भी. तभी हम जान पाएंगे कि यह गीत इतना महत्वपूर्ण क्यों रहा है.

 

·         Rashtriya Geet Vande Mataram word meaning in hindi

  • वन्दे मातरम्
    सुजलाम् सुफलाम् मलयज शीतलाम्
    शस्य-श्यामलाम् मातरम्॥ वन्दे मातरम्॥ १॥
    शुभ्र-ज्योत्सनां पुलकित यामिनीम्
    फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्
    सुहासिनीम् सुमधुर-भाषिणीम्।
    सुखदाम् वरदाम् मातरम्॥ वन्दे मातरम्॥ २॥
    कोटि-कोटि कंठ कल-कल निनाद कराले
    कोटि-कोटि भुजैर्धृत खरकरवाले,
    के बोले माँ तुमी अबले
    बहुबल धारिणीम् नमामि तारिणीम्
    रिपुदलवारिणीम् मातरम्॥ वन्दे मातरम्॥ ३॥
    तुमि विद्या तुमि धर्म
    तुमि हृदि तुमि मर्म
    त्वं हि प्राणा: शरीरे
    बाहु ते तुमि मां शक्ति
    हृदये तुमि मां भक्ति
    तोमारइ प्रतिमा गङि मंदिरे मंदिरे॥ वन्दे मातरम्॥ ४॥
    त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणीम्
    कमला कमलदल विहारिणी
    वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वां, नमामि कमलाम्।
    अमलाम्, अतुलाम्, सुजलाम्, सुफलाम्, मातरम्॥ ५॥
    श्यामलाम्, सरलाम्, सुस्मिताम्, भूषिताम्
    धरणीम्, भरणीम्, मातरम्॥ वन्दे मातरम्॥ ६॥
  • वन्दे मातरम्
    सुजलाम् सुफलाम् मलयज शीतलाम्
    शस्य-श्यामलाम् मातरम्॥ वन्दे मातरम्॥ १॥
    अर्थ – हे माँ मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ. माँ तुम पानी से भरी हुई हो, फलों से भरी हुई हो. हे माँ तुम्हें मलय से आती हुई हवा शीतलता प्रदान करती है. हे माँ तुम फसल से ढकी रहती हो. हे माँ मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ.
  • वन्दे मातरम् = हे माँ मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ. सुजलाम = पानी से भरी हुई, सुफलाम् = फलों से भरी हुई, मलयज = मलय जो केरल का एक तट, शीतलाम = शीतलता प्रदान करती है. मलयज शीतलाम = हे माँ तुम्हें मलय से आती हुई हवा शीतलता प्रदान करती है,शस्य-श्यामलाम् = हे माँ तुम जो फसल से ढकी रहती हो. शस्य = फसल / उपज / खेती श्यामला = गहरा रंग

 

·         Rashtriya Geet Vande Mataram word meaning in hindi

  • शुभ्र-ज्योत्सनां पुलकित यामिनीम्
    फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्
    सुहासिनीम् सुमधुर-भाषिणीम्।
    सुखदाम् वरदाम् मातरम्॥ वन्दे मातरम्॥ २॥
    अर्थ – वो जिसकी रात्रि को चाँद की रौशनी शोभायमान करती है. वो जिसकी भूमि खिले हुए फूलों से सुसज्जित पेड़ों से ढकी हुई है.
    सदैव हंसने वाली, मधुर भाषा बोलने वाली. सुख देने वाली, वरदान देने वाली माँ. मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ.
  • शुभ्रज्योत्‍स्‍नापुलकितयामिनींवो जिसकी रात्रि को चाँद की रौशनी शोभायमान करती है. शुभ्र = चमकदार, ज्योत्सना = चन्द्रमा की रोशनी, पुलकित = अत्यधिक खुश / रोमांचित, यामिनी = रात्रि, फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीं  = वो जिसकी भूमि खिले हुए फूलों से सुसज्जित पेड़ों से ढकी हुई है. फ़ुल्ल = खिले हुए, कुसुमित = फूल, द्रुम = वृक्ष, दल = समूह, शोभिनीं = शोभा बढ़ाते हैं.
    सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीं सुहासिनीं = सदैव हंसने वाली, सुमधुर भाषिनी = मधुर भाषा बोलने वाली सुखदां वरदां मातरम्‌ =
    सुखदां = सुख देने वाली, वरदां = वरदान देने वाली.

 

  • कोटि-कोटि कंठ कल-कल निनाद कराले
    कोटि-कोटि भुजैर्धृत खरकरवाले,
    के बोले माँ तुमी अबले
    बहुबल धारिणीम् नमामि तारिणीम्
    रिपुदलवारिणीम् मातरम्॥ वन्दे मातरम्॥ ३॥
    अर्थ – करोड़ों कंठ मधुर वाणी में तुम्हारी प्रशंसा कर रहे हैं. करोड़ों हाथों में तेरी रक्षा के लिए धारदार तलवारें निकली हुई हैं. माँ कौन कहता है कि तुम अबला हो. तुम बल धारण की हुई हो. तुम तारने वाली हो, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ. माँ तुम शत्रुओं को समाप्त करने वाली हो. माँ मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ.
  • कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले = करोड़ों कंठ मधुर वाणी में तुम्हारी प्रशंसा कर रहे हैं. कोटि = करोड़, कंठ = गला, कल-कल = बहती हुई जलधारा की मधुर ध्वनि. निनाद = गुनगुनाहट, कराले = आवाज़.
    कोटि-कोटि-भुजैधृत-खरकरवालेकरोड़ों हाथों में तेरी रक्षा के लिए धारदार तलवारें निकली हुई हैं. भुजै धृत = भुजाओं में निकली हुई, खर = धारदार, करवाल = तलवार. के बोले माँ तुमी अबले = माँ कौन कहता है कि तुम अबला हो.
    बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं  – तुम बल धारण की हुई हो. तुम तारने वाली हो, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ. बहुबलधारिणीं = बहुत बल धारण किये हुए / बहुत शक्तिशाली, नमामि = में प्रणाम करता हूँ, तारिणीं = तारण करने वाली / बचाने वाली. रिपुदलवारिणीं मातरम्‌ – माँ तुम शत्रुओं को समाप्त करने वाली हो. रिपुदल = शत्रुओं का दल, वारिणी = रोकने वंदे मातरम्‌ । 
  • तुमि विद्या तुमि धर्म
    तुमि हृदि तुमि मर्म
    त्वं हि प्राणा: शरीरे
    बाहु ते तुमि मां शक्ति
    हृदये तुमि मां भक्ति
    तोमारइ प्रतिमा गङि मंदिरे मंदिरे॥ वन्दे मातरम्॥ ४॥
    अर्थ – तुम हीं विद्या हो, तुम हीं धर्म हो. तुम हीं हृदय, तुम हीं तत्व हो. तुम हीं शरीर में स्थित प्राण हो. हमारी बाँहों में जो शक्ति है वो तुम ही हो. हृदय में जो भक्ति है वो तुम ही हो. तुम्हारी हीं प्रतिमा हर मन्दिर में गड़ी हुई है. माँ मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ.
  • तुमि विद्या, तुमि धर्म– तुम हीं विद्या हो , तुम हीं धर्म हो.
    तुमि हृदि, तुमि मर्म – तुम हीं हृदय, तुम हीं तत्व हो.
    त्वं हि प्राणाः शरीरे – तुम हीं शरीर में स्थित प्राण हो.
    बाहुते तुमि मा शक्ति – हमारी बाँहों में जो शक्ति है वो तुम ही हो.
    हृदये तुमि मा भक्ति – हृदय में जो भक्ति है वो तुम ही हो.
    तोमारई प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे मातरम्‌ – तुम्हारी हीं प्रतिमा हर मन्दिर में गड़ी हुई है. वंदे मातरम्‌ ।
  • त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणीम्
    कमला कमलदल विहारिणी
    वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वां, नमामि कमलाम्।
    अमलाम्, अतुलाम्, सुजलाम्, सुफलाम्, मातरम्॥ ५॥
    अर्थ – तुम ही दस अस्त्र धारण की हुई दुर्गा हो. तुम ही कमल पर आसीन लक्ष्मी हो. तुम वाणी एवं विद्या देने वाली ( सरस्वती ) हो , तुम्हें प्रणाम.  तुम धन देने वाली हो, तुम अति पवित्र हो, तम्हारी कोई तुलना नहीं हो सकती है, तुम जल देने वाली हो, तुम फल देने वाली हो माँ हो.
  • त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी– तुम ही दस अस्त्र धारण की हुई दुर्गा हो. कमला = लक्ष्मी जी कमलदलविहारिणी = तुम ही कमल पर आसीन लक्ष्मी हो. वाणी विद्यादायिनी, नामामि त्वाम्‌  = तुम वाणी एवं विद्या देने वाली ( सरस्वती ) हो , तुम्हें प्रणाम.
    कमलां अमलां अतुलां सुजलां सुफलां मातरम्‌ ॥  कमलां = धन देने वाली देवी / लक्ष्मी, अमलां = अति पवित्र, अतुलां = जिसकी कोई तुलना न हो, सुजलां = जल देने वाली , सुफलां = फल देने वाली. वंदे मातरम्‌ । 

·         Rashtriya Geet Vande Mataram word meaning in hindi

  • श्यामलाम्, सरलाम्, सुस्मिताम्, भूषिताम्
    धरणीम्, भरणीम्, मातरम्॥ वन्दे मातरम्॥ ६॥
    अर्थ श्यामवर्ण वाली, अति सरल, सदैव हँसने वाली, भूषित, धारण करने वाली, पालन-पोषण करने वाली माँ हो तुम. माँ मैं तुम्हारी वन्दना करता हूँ.
  • श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषितां= श्यामलां = श्याम वर्ण की, सरलां = अति सरल (कपट रहित ), सुस्मितां = सदैव मधुर हंसती हुई, भूषितां = भूषित.
    धरणीं भरणीं मातरम्‌ ॥ 
    धारणी = धारण करने वाली / रखने वाली, भरणीं = भरण ( पालन पोषण करने वाली ) ] वंदे मातरम्‌ ।

 

Ganesh Aarti Lyrics in Hindi Ganesh Ji Ki Aarti in Hindi गणेश जी की आरती

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  • गणेश जी की आरती – Ganesh Ji Ki Aarti in Hindi – ganesh aarti lyrics in hindi

 

  • जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा – jai ganesh jai ganesh deva

  • जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा
    माता जाकी पार्वती पिता महादेवा ॥ जय…
    एक दंत दयावंत चार भुजा धारी।
    माथे सिंदूर सोहे मूसे की सवारी ॥ जय…
    अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।
    बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ॥ जय…
    पान चढ़े फल चढ़े और चढ़े मेवा।
    लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा ॥ जय…
    ‘सूर’ श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा
    जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ॥
  • Jay Ganesh, Jay Ganesh, Jay Ganesh Deva |
    Maata Jaki Parvati, Pita Mahadeva ||
    Ek Dant Dayavant, Char Bhujadharii |
    Mathe Par Tilak Sohe, Muse Ki Savari ||
    Pan Cadhe, Phul Caddhe Aur Caddhe Mewa |
    Ladduan Ka Bhog Lage, Sant Kare Seva ||
    Andhan Ko Aankh Det, Kodhin Ko Kaya |
    Banjhan Ko Putra Det, Nirdhan Ko Maya ||
    Surashyam Sharan Aaye Safal Kije Seva |
    Mata Jakii Parvatii, Pita Mahadeva ||
    Jay Ganesh, Jay Ganesh, Jay Ganesh Deva ||
  • गणेश जी को लड्डू और दूब की घास जरुर चढ़ानी चाहिए. हर बुद्धवार को गणेश जी की पूजा जरुर करनी चाहिए. अगर आपकी शादी होने में दिक्कत हो रही हो, तो हर बुद्धवार को आपको गणेश जी की पूजा जरुर करनी चाहिए. उन्हें हल्दी, लड्डू और दूब की घास ( दूर्वा ) जरुर चढ़ानी चाहिए. और आपको उस दिन के मीठा भोजन हीं ग्रहण करना चाहिए. सामान्य पूजा की तरह बाकि चीजें करनी चाहिए और अंत में उनकी आरती जरुर करनी चाहिए.

 

  • आरती गजवदन विनायक की aarti gajvadan vinayak ki

  • आरती गजवदन विनायक की।
    सुर मुनि-पूजित गणनायक की॥ आरती….
    एकदंत, शशिभाल, गजानन,
    विघ्नविनाशक, शुभगुण कानन
    शिवसुत, वन्द्यमान-चतुरानन,
    दु:खविनाशक, सुखदायक की॥ आरती…
    ऋद्धि-सिद्धि स्वामी समर्थ अति,
    विमल बुद्धि दाता सुविमल-मति,
    अघ-वन-दहन, अमल अविगत गति,
    विद्या, विनय-विभव दायक की॥आरती….
    पिंगलनयन, विशाल शुंडधर,
    धूम्रवर्ण, शुचि वज्रांकुश-कर,
    लम्बोदर, बाधा-विपत्ति-हर,
    सुर-वन्दित सब विधि लायक की॥आरती….

 

  • गणपति की सेवा मंगल मेवा – ganpati ki seva mangal meva

  • गणपति की सेवा मंगल मेवा, सेवा से सब विध्न टरै।
    तीन लोक तैंतीस देवता, द्वार खड़े सब अर्ज करें॥
    ऋद्धि-सिद्धि दक्षिण वाम विराजे, अरु आनन्द सों चमर करें।
    धूप दीप और लिए आरती, भक्त खड़े जयकार करें॥
    गुड़ के मोदक भोग लगत हैं, मूषक वाहन चढ़ा सरें।
    सौम्यरुप सेवा गणपति की, विध्न भागजा दूर परें॥
    भादों मास और शुक्ल चतुर्थी, दिन दोपारा पूर परें ।
    लियो जन्म गणपति प्रभुजी सुनी दुर्गा मन आनन्द भरें॥
    अद्भुत बाजा बज्या इन्द्र का, देव वधू जहँ गान करें।
    श्री शंकर के आनन्द उपज्यो, नाम सुन्या सब विघ्न टरें॥
    आन विधाता बैठे आसन, इन्द्र अप्सरा नृत्य करें।
    देख वेद ब्रह्माजी जाको, विघ्नविनाशक नाम धरें॥
    एकदन्त गजवदन विनायक, त्रिनयन रूप अनूप धरें।
    पगथंभा सा उदर पुष्ट है, देख चन्द्रमा हास्य करें॥
    दे श्राप श्री चंद्रदेव को, कलाहीन तत्काल करें।
    चौदह लोक मे फिरे गणपति, तीन भुवन में राज्य करें॥
    उठ प्रभात जब करे ध्यान कोई ताके कारज सर्व सरें|
    पूजा काले गाव आरती ताके शिर यश छत्र फिरें||
    गणपति की पूजा पहले करनी, काम सभी निर्विघ्न सरें।
    श्री प्रताप गणपतीजी को, हाथ जोड स्तुति करें॥
    गणपति की सेवा मंगल मेवा, सेवा से सब विध्न टरें||

 

  • श्री गणपति भज प्रगट पार्वती

  • श्री गणपति भज प्रगट पार्वती,
    अंक विराजत अविनासी।
    ब्रह्मा विष्णु सिवादि सकल सुर,
    करत आरती उल्लासी॥
    त्रिशूल धर को भाग्य मानिकै,
    सब जुरि आये कैलासी।
    करत ध्यान, गन्धर्व गान-रत,
    पुष्पन की हो वर्षा-सी॥
    धनि भवानी व्रत साधि लह्यो जिन,
    पुत्र परम गोलोकासी।
    अचल अनादि अखंड परात्पर,
    भक्तहेतु भव परकासी॥
    विद्या बुद्धि निधान गुनाकर,
    विघ्नविनासन दुखनासी।
    तुष्टि पुष्टि सुभ लाभ लक्ष्मी संग,
    रिद्धि सिद्धि सी हैं दासी॥
    सब कारज जग होत सिद्ध सुभ,
    द्वादस नाम कहे छासी।
    कामधेनु चिंतामनि सुरतरु,
    चार पदारथ देतासी॥
    गज आनन सुभ सदन रदन इक,
    सुंढि ढूंढि पुर पूजा सी।
    चार भुजा मोदक करतल सजि,
    अंकुस धारत फरसा सी॥
    ब्याल सूत्र त्रयनेत्र भाल ससि,
    उदरवाहन सुखरासी।
    जिनके सुमिरन सेवन करते,
    टूट जात जम की फांसी॥
    कृष्णपाल धरि ध्यान निरन्तर,
    मन लगाये जो कोई गासी।
    दूर करैं भव की बाधा प्रभु,
    मुक्ति जन्म निजपद पासी॥

 

  • Jai Dev Jai Mangal Murti

  • जय देव, जय देव, जय मंगलमूर्ती
    दर्शनमात्रे मन कामनापूर्ति
    सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची।
    नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची॥
    सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची।
    कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥ जय देव, जय देव
    रत्नखचित फरा तूज गौरीकुमरा।
    चंदनाची उटी कुंकुम केशरा।
    हिरेजड़ित मुकुट शोभतो बरा।
    रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया॥ जय देव, जय देव
    लंबोदर पीतांबर फणीवर बंधना।
    सरळ सोंड वक्रतुण्ड त्रिनयना।
    दास रामाचा वाट पाहे सदना।
    संकटी पावावें, निर्वाणी रक्षावे, सुरवरवंदना॥

 

  • jai jai ji ganraj vidya sukh data lyrics

  • जय जय जी गणराज विद्या सुखदाता।
    धन्य तुम्हारा दर्शन मेरा मन रमता
    शेंदुर लाल चढ़ायो अच्छा गजमुखको।
    दोंदिल लाल बिराजे सुत गौरि-हर को।
    हाथ लिए गुड-लड्डू सांई सुरवर को।
    महिमा कहे न जाय लागत हूँ पद को|| जय देव, जय देव
    अष्टौ सिद्धि दासी संकट को बैरि।
    विघ्न विनाशन मंगल मूरत अधिकारी।
    कोटी सूरज प्रकाश ऐसी छबि तेरी।
    गंडस्थल मदमस्तक झूले शशि-बहारि || जय देव, जय देव
    भाव-भगति से कोई शरणागत आवे।
    संतत संपत सब ही भरपूर पावे।
    ऐसे तुम महाराज मोको अति भावे।
    गोसावीनंदन निशि-दिन गुन गावे॥ जय देव, जय देव

 

  • गणेश जी के कुछ मंत्र Ganesh ji Manta in Hindi

  • वक्रतुण्ड़ महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ।
    निर्विघ्नं कुरू मे देव, सर्व कार्येषु सर्वदा
  • श्री गणेश बीज मंत्र – ऊँ गं गणपतये नमः ।।
  • एकदंताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।।
    महाकर्णाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।।
    गजाननाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।।
  • गणपतिर्विघ्नराजो लम्बतुण्डो गजाननः।
    द्वैमातुरश्च हेरम्ब एकदन्तो गणाधिपः॥
    विनायकश्चारुकर्णः पशुपालो भवात्मजः।
    द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्‌॥
    विश्वं तस्य भवेद्वश्यं न च विघ्नं भवेत्‌ क्वचित्‌।
  • माँ दुर्गा जी की आरती – Maa Durga Ji Ki Aarti in Hindi Text

 

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